भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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६८६* संक्षिप्त शिवपुराण *

आपकी जय हो। मनोवांछित वस्तु देनेवाली देवि! आपकी जय हो। भगवन्! देव! कहाँ तो आपका उत्कृष्ट धाम और कहाँ मेरी तुच्छ वाणी, तथापि भक्तिभावसे प्रलाप करते हुए मुझ सेवकके अपराधको आप क्षमा कर दें।*

इस प्रकार सुन्दर उक्तियोंद्वारा भगवान् रुद्र और देवीका एक साथ गुणगान करके चतुर्मुख ब्रह्माने रुद्र एवं रुद्राणीको बारंबार नमस्कार किया। ब्रह्माजीके द्वारा पठित यह पवित्र एवं उत्तम अर्द्धनारीश्वर-स्तोत्र शिव तथा पार्वतीके हर्षको बढ़ानेवाला है। जो भक्तिपूर्वक जिस किसी भी गुरुकी शिक्षासे इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह शिव और पार्वतीको प्रसन्न करनेके कारण अपने अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है। जो समस्त भुवनोंके प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, जिनके विग्रह जन्म और मृत्युसे रहित हैं तथा जो श्रेष्ठ नर और सुन्दरी नारीके रूपमें एक ही शरीर धारण करके स्थित हैं, उन कल्याणकारी भगवान् शिव और शिवाको मैं प्रणाम करता हूँ। (अध्याय १५)


* ब्रह्मोवाच—
जय देव महादेव जयेश्वर महेश्वर। जय सर्वगुणश्रेष्ठ जय सर्वसुराधिप॥
जय प्रकृतिकल्याणि जय प्रकृतिनायिके। जय प्रकृतिदूरे त्वं जय प्रकृतिसुन्दरि॥
जयामोघमहामाय जयामोघमनोरथ। जयामोघमहालील जयामोघमहाबल॥
जय विश्वजगन्मातर्जय विश्वजगन्मयि। जय विश्वजगद्धात्रि जय विश्वजगत्सखि॥
जय शाश्वतिकैश्वर्य जय शाश्वतिकालय। जय शाश्वतिकाकार जय शाश्वतिकानुग॥
जयात्मत्रयनिर्मात्रि जयात्मत्रयपालिनि। जयात्मत्रयसंहर्त्रि जयात्मत्रयनायिके॥
जयावलोकनायत्तजगत्कारणबृंहण। जयापेक्षाकटाक्षोत्थहुतभुग्भुक्तभौतिक॥
जय देवाद्यविज्ञेये स्वात्मसूक्ष्मदृशोज्ज्वले। जय स्थूलात्मशक्यत्येशे जय व्याप्तचराचरे॥
जय नानैकविन्यस्तविश्वतत्त्वसमुच्चय। जयासुरशिरोनिष्ठश्रेष्ठांगुगकदम्बक॥
जयोपाश्रितसंरक्षासंविधानपटीयसि। जयोन्मूलितसंसारविषवृक्षाङ्कुरोद्गमे॥
जय प्रादेशिकैश्वर्यवीर्यशौर्यविजृम्भण। जय विश्ववहद्भूत निरस्तपरवैभव॥
जय प्रणीतपञ्चार्थप्रयोगपरमामृत। जय पञ्चार्थविज्ञानसुधास्तोत्रस्वरूपिणि॥
जयातिघोरसंसारमहारोगभिषग्वर। जयानादिमलाज्ञानतमःपटलचन्द्रिके॥
जय त्रिपुरकालाग्ने जय त्रिपुरभैरवि। जय त्रिगुणनिर्मुक्त जय त्रिगुणमर्दिनि॥
जय प्रथमसर्वज्ञ जय सर्वप्रबोधिके। जय प्रचुरदिव्याङ्ग जय प्रार्थितदायिनि॥
क्व देव ते परं धाम क्व च तुच्छं हि नो वचः। तथापि भगवन् भक्त्या प्रलपन्तं क्षमस्व माम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड १५। १६–३१)

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