शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* वायवीयसंहिता * ७०५
ज्ञान भी अपरोक्ष ज्ञान होकर मोक्षदायक होता है। वैदिक धर्म दो प्रकारके बताये गये हैं—परम और अपरम। धर्म-शब्दसे प्रतिपाद्य अर्थमें हमारे लिये श्रुति ही प्रमाण है। योगपर्यन्त जो परम धर्म है, वह श्रुतियोंके शिरोभूत उपनिषद्में वर्णित है और जो अपरम धर्म है, वह उसकी अपेक्षा नीचे श्रुतिके मुख-भागसे अर्थात् संहिता-मन्त्रोंद्वारा प्रतिपादित हुआ है। जिसमें पशु (बद्ध) जीवोंका अधिकार नहीं है, वह वेदान्तवर्णित धर्म 'परम धर्म' माना गया है। उससे भिन्न जो यज्ञ-यागादि हैं, उसमें सबका अधिकार होनेसे वह साधारण या 'अपरम धर्म' कहलाता है। जो अपरम धर्म है, वही परम धर्मका साधन है। धर्म-शास्त्र आदिके द्वारा उसका सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक सांगोपांग निरूपण हुआ है। भगवान् शिवके द्वारा प्रतिपादित जो परम धर्म है, उसीका नाम श्रेष्ठ अनुष्ठान है। इतिहास और पुराणोंद्वारा उसका किसी प्रकार विस्तार हुआ है, परंतु शैव-शास्त्रोंद्वारा उसके विस्तारका सांगोपांग निरूपण किया गया है। वहीं उसके स्वरूपका सम्यक् रूपसे प्रतिपादन हुआ है। साथ ही उसके संस्कार और अधिकार भी सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक बताये गये हैं। शैव-आगमके दो भेद हैं—श्रौत और अश्रौत। जो श्रुतिके सार तत्त्वसे सम्पन्न है वह श्रौत है; और जो स्वतन्त्र है, वह अश्रौत माना गया है। स्वतन्त्र शैवागम पहले दस प्रकारका था, फिर अठारह प्रकारका हुआ। वह कायिका आदि संज्ञाओंसे सिद्ध होकर सिद्धान्त नाम धारण करता है। श्रुतिसारमय जो शैव-शास्त्र है, उसका विस्तार सौ करोड़ श्लोकोंमें किया गया है। उसीमें उत्कृष्ट 'पाशुपत व्रत' और 'पाशुपत ज्ञान-का वर्णन किया गया है। युग-युगमें होनेवाले शिष्योंको उसका उपदेश देनेके लिये भगवान् शिव स्वयं ही योगाचार्यरूपसे जहाँ-तहाँ अवतीर्ण हो उसका प्रचार करते हैं।
इस शैव-शास्त्रको संक्षिप्त करके उसके सिद्धान्तका प्रवचन करनेवाले मुख्यतः चार महर्षि हैं—रुरु, दधीच, अगस्त्य और महायशस्वी उपमन्यु। उन्हें संहिताओंका प्रवर्तक 'पाशुपत' जानना चाहिये। उनकी संतान-परम्परामें सैकड़ों-हजारों गुरुजन हो चुके हैं। पाशुपत सिद्धान्तमें जो परम धर्म बताया गया है, वह चर्या* आदि चार पादोंके कारण चार प्रकारका माना गया है। उन चारोंमें जो पाशुपत योग है, वह दृढ़तापूर्वक शिवका साक्षात्कार करानेवाला है। इसलिये पाशुपत योग ही श्रेष्ठ अनुष्ठान माना गया है। उसमें भी ब्रह्माजीने जो उपाय बताया है, उसका वर्णन किया जाता है। भगवान् शिवके द्वारा परिकल्पित जो 'नामाष्टकमय योग' है, उसके द्वारा सहसा 'शैवी प्रज्ञा' का उदय होता है। उस प्रज्ञाद्वारा पुरुष शीघ्र ही सुस्थिर परम ज्ञान प्राप्त कर लेता है। जिसके हृदयमें वह ज्ञान प्रतिष्ठित हो जाता है, उसके ऊपर भगवान् शिव प्रसन्न होते हैं। उनके कृपा-प्रसादसे वह परम योग सिद्ध होता है, जो शिवका अपरोक्ष दर्शन कराता है। शिवके अपरोक्ष ज्ञानसे संसार-बन्धनका कारण दूर हो जाता है। इस प्रकार
* चर्या, विद्या, क्रिया और योग—ये चार पाद हैं।
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