शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
संसारसे मुक्त हुआ पुरुष शिवके समान हो जाता है। यह ब्रह्माजीका बताया हुआ उपाय है। उसीका पृथक् वर्णन करते हैं। शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु, पितामह (ब्रह्मा), संसारवैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा—ये मुख्यतः आठ नाम हैं। ये आठों मुख्य नाम शिवके प्रतिपादक हैं। इनमेंसे आदि पाँच नाम क्रमशः शान्त्यतीता आदि पाँच कलाओंसे सम्बन्ध रखते हैं और उन पाँच उपाधियोंको ग्रहण करनेसे सदाशिव आदिके बोधक होते हैं। उपाधिकी निवृत्ति होनेपर इन भेदोंकी निवृत्ति हो जाती है। वह पद ही नित्य है। किंतु उस पदपर प्रतिष्ठित होनेवाले अनित्य कहे गये हैं। पदोंका परिवर्तन होनेपर पदवाले पुरुष मुक्त हो जाते हैं। परिवर्तनके अनन्तर पुनः दूसरे आत्माओंको उस पदकी प्राप्ति बतायी जाती है और उन्हींके वे आदि पाँच नाम नियत होते हैं। उपादान आदि योगसे अन्य तीन नाम (संसारवैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा) भी त्रिविध उपाधिका प्रतिपादन करते हुए शिवमें ही अनुगत होते हैं।
अनादि मलका संसर्ग उनमें पहलेसे ही नहीं है तथा वे स्वभावतः अत्यन्त शुद्धस्वरूप हैं, इसलिये ‘शिव’ कहलाते हैं अथवा वे ईश्वर समस्त कल्याणमय गुणोंके एकमात्र घनीभूत विग्रह हैं। इसलिये शिवतत्त्वके अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ महात्मा उन्हें शिव कहते हैं। तेईस तत्त्वोंसे परे जो प्रकृति बतायी गयी है, उससे भी परे पचीसवें तत्त्वके स्थानमें पुरुषको बताया गया है, जिसे वेदके आदिमें ओंकाररूप कहा गया है। ओंकार और पुरुषमें वाच्य-वाचक-भाव सम्बन्ध है। उसके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान एकमात्र वेदसे ही होता है। वे ही वेदान्तमें प्रतिष्ठित हैं। किंतु वह प्रकृतिसे संयुक्त है; अतः उससे भी परे जो परम पुरुष है, उसका नाम ‘महेश्वर’ है; क्योंकि प्रकृति और पुरुष दोनोंकी प्रवृत्ति उसीके अधीन है अथवा यह जो अविनाशी त्रिगुणमय तत्त्व है, इसे प्रकृति समझना चाहिये। इस प्रकृतिको माया कहते हैं। यह माया जिनकी शक्ति है, उन मायापतिका नाम ‘महेश्वर’ है। महेश्वरके सम्बन्धसे जो माया अथवा प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करते हैं, वे अनन्त या ‘विष्णु’ कहे गये हैं। वे ही कालात्मा और परमात्मा आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं। उन्हींको स्थूल और सूक्ष्मरूप भी कहा गया है। दुःख अथवा दुःखके हेतुका नाम ‘सत्’ है। जो प्रभु उसका द्रावण करते हैं—उसे मार भगाते हैं, उन परम कारण शिवको साधु पुरुष ‘रुद्र’ कहते हैं। कला, काल आदि तत्त्वोंसे लेकर भूतोंमें पृथ्वी-पर्यन्त जो छत्तीस* तत्त्व हैं, उन्हींसे शरीर बनता है। उस शरीर, इन्द्रिय आदिमें जो तन्द्रारहित हो व्यापकरूपसे स्थित हैं, वे भगवान् शिव ‘रुद्र’ कहे गये। जगत्के पितारूप जो मूर्त्यात्मा हैं, उन सबके पिताके रूपमें भगवान् शिव विराजमान हैं; इसलिये वे ‘पितामह’ कहे गये हैं। जैसे रोगोंके निदानको जाननेवाला वैद्य तदनुकूल उपायों और दवाओंसे रोगको दूर कर देता है, उसी तरह ईश्वर लययोगाधिकारसे सदा जड-
* कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण, पाँच शब्द आदि विषय तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी ये छत्तीस तत्त्व हैं।
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