शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* वायवीयसंहिता * ७०७
मूलसहित संसार-रोगकी निवृत्ति करते हैं; अतः सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता विद्वान् उन्हें 'संसारवैद्य' कहते हैं। दस विषयोंके ज्ञानके लिये दसों इन्द्रियोंके होते हुए भी जीव तीनों कालोंमें होनेवाले स्थूल-सूक्ष्म पदार्थोंको पूर्णरूपसे नहीं जानते; क्योंकि मायाने ही उन्हें मलसे आवृत्त कर दिया है। परंतु भगवान् सदाशिव सम्पूर्ण विषयोंके ज्ञानके साधनभूत इन्द्रियादिके न होनेपर भी जो वस्तु जिस रूपमें स्थित है, उसे उसी रूपमें ठीक-ठीक जानते हैं; इसलिये वे 'सर्वज्ञ' कहलाते हैं। जो इन सभी उत्तम गुणोंसे नित्य संयुक्त होनेके कारण सबके आत्मा हैं, जिनके लिये अपनेसे अतिरिक्त किसी दूसरे आत्माकी सत्ता नहीं है, वे भगवान् शिव स्वयं ही 'परमात्मा' हैं।
आचार्यकी कृपासे इन आठों नामोंका अर्थसहित उपदेश पाकर शिव आदि पाँच नामोंद्वारा निवृत्ति आदि पाँचों कलाओंकी ग्रन्थिका क्रमशः छेदन और गुणके अनुसार शोधन करके गुणित, उद्घातयुक्त और अनिरुद्ध प्राणोंद्वारा हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य और ब्रह्मरन्ध्रसे युक्त पुर्यष्टकका भेदन करके सुषुम्णा नाड़ीद्वारा अपने आत्माको सहस्रार चक्रके भीतर ले जाय। उसका शुभ्रवर्ण है। वह तरुण सूर्यके सदृश रक्तवर्ण केसरके द्वारा रंजित और अधोमुख है। उसके पचास दलोंमें स्थित 'अ' से लेकर 'क्ष' तक सबिन्दु अक्षर-कर्णिकाके बीचमें गोलाकार चन्द्रमण्डल है। यह चन्द्रमण्डल छत्राकारमें स्थित है। उसने एक ऊर्ध्वमुख द्वादश-दल कमलको आवृत कर रखा है। उस कमलकी कर्णिकामें विद्युत्-सदृश अकथादि त्रिकोण यन्त्र है। उस यन्त्रके चारों ओर सुधासागर होनेके कारण वह मणिद्वीपके आकारका हो गया है। उस द्वीपके मध्यभागमें मणिपीठ है। उसके बीचमें नाद बिन्दुके ऊपर हंसपीठ है। उसपर परम शिव विराजमान हैं। उक्त चन्द्रमण्डलके ऊपर शिवके तेजमें अपने आत्माको संयुक्त करे। इस प्रकार जीवको शिवमें लीन करके शाक्त अमृतवर्षाके द्वारा अपने शरीरके अभिषिक्त होनेकी भावना करे। तत्पश्चात् अमृतमय विग्रहवाले अपने आत्माको ब्रह्मरन्ध्रसे उतारकर हृदयमें द्वादश-दल कमलके भीतर स्थित चन्द्रमासे परे श्वेत कमलपर अर्द्धनारीश्वर रूपमें विराजमान मनोहर आकृतिवाले निर्मल देव भक्तवत्सल महादेव शंकरका चिन्तन करे। उनकी अंगकान्ति शुद्धस्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है। वे शीतल प्रभासे युक्त और प्रसन्न हैं। इस प्रकार मन-ही-मन ध्यान करके शान्तचित्त हुआ मनुष्य शिवके आठ नामोंद्वारा ही भावमय पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। पूजनके अन्तमें पुनः प्राणायाम करके चित्तको भलीभाँति एकाग्र रखते हुए शिव-नामाष्टकका जप करे। फिर भावनाद्वारा नाभिमें आठ आहुतियोंका हवन करके पूर्णाहुति एवं नमस्कारपूर्वक आठ फूल चढ़ाकर अन्तिम अर्चना पूरी करके चुल्लूमें लिये हुए जलकी भाँति अपने-आपको शिवके चरणोंमें समर्पित कर दे। इस प्रकार करनेसे शीघ्र ही मंगलमय पाशुपत ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है और साधक उस ज्ञानकी सुस्थिरता पा लेता है। साथ ही वह परम उत्तम पाशुपत-व्रत एवं परम योगको पाकर मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।
(अध्याय ३२)
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