शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१० * संक्षिप्त शिवपुराण *
भस्म लगाना चाहिये। कोई-कोई भस्मकी जगह आलेपनका विधान करते हैं। दूसरे प्रकारके धूपका विधान होनेसे कुछ लोग प्रसिद्ध धूपका निषेध करते हैं। ‘अघोर’ नामक मुखके लिये श्वेत अगुरुका धूप देना चाहिये। ‘तत्पुरुष’ नामक मुखके लिये कृष्ण अगुरुके धूपका विधान है। ‘वामदेव’के लिये गुग्गुल, ‘सद्योजात’ मुखके लिये सौगन्धिक तथा ‘ईशान’ के लिये भी उशीर आदि धूपको विशेषरूपसे देना चाहिये। शर्करा, मधु, कपूर, कपिला गायका घी, चन्दनका चूरा तथा अगुरु नामक काष्ठ आदिका चूर्ण—इन सबको मिलाकर जो धूप तैयार किया जाता है, उसे सबके लिये सामान्यरूपसे उपयोगके योग्य बताया गया है। कपूरकी बत्ती और घीके दीपक जलाकर दीपमाला देनी चाहिये। तत्पश्चात् प्रत्येक मुखके लिये पृथक्-पृथक् अर्घ्य और आचमन देनेका विधान है।
प्रथम आवरणमें गणेश और कार्तिकेयकी पूजा करनी चाहिये। उनके साथ ही बाह्य अंगोंकी भी पूजा आवश्यक है। प्रथमावरणकी पूजा हो जानेपर द्वितीयावरणमें चक्रवर्ती विघ्नेश्वरोंका पूजन करना चाहिये। तृतीयावरणमें भव आदि अष्टमूर्तियोंकी पूजाका विधान है। वहीं महादेव आदि एकादश मूर्तियोंका भी पूजन आवश्यक है। चौथे आवरणमें सभी गणेश्वर पूजनीय हैं। पंचमावरणमें कमलके बाह्यभागमें क्रमशः दस दिक्पालों, उनके अस्त्रों और अनुचरोंकी क्रमशः पूजा करनी चाहिये। वहीं ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी, समस्त ज्योतिर्गणोंकी, सब देवी-देवताओंकी, सभी आकाशचारियोंकी, पातालवासियोंकी, अखिल मुनीश्वरोंकी, योगियोंकी, सब यज्ञोंकी, द्वादश सूर्योंकी, मातृकाओंकी, गणोंसहित क्षेत्रपालोंकी और इस समस्त चराचर जगत्की पूजा करनी चाहिये। इन सबको शंकरजीकी विभूति मानकर शिवकी प्रसन्नताके लिये ही इनका पूजन करना उचित है।
इस प्रकार आवरणपूजाके पश्चात् परमेश्वर शिवका पूजन करके उन्हें भक्तिपूर्वक घृत और व्यंजनसहित मनोहर हविष्य निवेदन करना चाहिये। मुखशुद्धिके लिये आवश्यक उपकरणोंसहित ताम्बूल देकर नाना प्रकारके फूलोंसे पुनः इष्टदेवका श्रृंगार करे। आरती उतारे। तत्पश्चात् पूजनका शेष कृत्य पूर्ण करे। प्याला तथा उपकारक सामग्रियोंसहित शय्या समर्पित करे। शय्यापर चन्द्रमाके समान चमकीला हार दे। राजोचित मनोहर वस्तुएँ सब प्रकारसे संचित करके दे। स्वयं पूजन करे, दूसरोंसे भी कराये तथा प्रत्येक पूजनमें आहुति दे। इसके बाद स्तुति, प्रार्थना और जप करके पंचाक्षरी विद्याको जपे। परिक्रमा और प्रणाम करके अपने-आपको समर्पित करे। तदनन्तर इष्टदेवके सामने ही गुरु और ब्राह्मणकी पूजा करे। इसके बाद अर्घ्य और आठ फूल देकर पूजित लिंग या मूर्तिसे देवताका विसर्जन करे। फिर अग्निदेवका भी विसर्जन करके पूजा समाप्त करे। मनुष्यको चाहिये कि प्रतिदिन इसी प्रकार पूर्वोक्तरूपसे सेवा करे। पूजनके अन्तमें सुवर्णमय कमल तथा अन्य सब उपकरणोंसहित उस शिवलिंगको गुरुके हाथमें दे दे अथवा शिवालयमें स्थापित कर दे। गुरुओं, ब्राह्मणों तथा विशेषतः