भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 725

* वायवीयसंहिता * ७११

व्रतधारियोंकी पूजा करके सामर्थ्य हो तो भक्त ब्राह्मणों तथा दीनों और अनाथोंको भी संतुष्ट करे। स्वयं उपवासमें असमर्थ होनेपर फल-मूल खाकर या दूध पीकर रहे अथवा भिक्षान्नभोजी हो या एक समय भोजन करे। रातको प्रतिदिन परिमित भोजन करे और पवित्रभावसे भूमिपर ही सोये। भस्मपर, तृणपर अथवा चीर या मृगचर्मपर शयन करे। प्रतिदिन ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इस व्रतका अनुष्ठान करे। यदि शक्ति हो तो रविवारके दिन, आर्द्रा नक्षत्रमें दोनों पक्षोंकी पूर्णिमा और अमावास्याको, अष्टमीको तथा चतुर्दशीको उपवास करे। मन, वाणी और क्रियाद्वारा सम्पूर्ण प्रयत्नसे पाखण्डी, पतित, रजस्वला स्त्री, सूतकमें पड़े हुए लोग तथा अन्त्यज आदिके सम्पर्कका त्याग करे। निरन्तर क्षमा, दान, दया, सत्यभाषण और अहिंसामें तत्पर रहे। संतुष्ट और शान्त रहकर जप और ध्यानमें लगा रहे। तीनों काल स्नान करे अथवा भस्म-स्नान कर ले। मन, वाणी और क्रियाद्वारा विशेष पूजा किया करे। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? व्रतधारी पुरुष कभी अशुभ आचरण न करे। प्रमादवश यदि वैसा आचरण बन जाय तो उसके गुरु-लाघवका विचार करके उसके दोषका निवारण करनेके लिये पूजा, होम और जप आदिके द्वारा उचित प्रायश्चित्त करे। व्रतकी समाप्तिपर्यन्त भूलकर भी अशुभ आचरण न करे। सम्पत्ति हो तो उसके अनुसार गोदान, वृषोत्सर्ग और पूजन करे। भक्त पुरुष निष्कामभावसे शिवकी प्रीतिके लिये ही सब कुछ करे। यह संक्षेपसे इस व्रतकी सामान्य विधि कही गयी है।

अब शास्त्रके अनुसार प्रत्येक मासमें जो विशेष कृत्य है, उसे बताता हूँ। वैशाखमासमें हीरेके बने हुए शिवलिंगका पूजन करना चाहिये। ज्येष्ठमासमें मरकत मणिमय शिवलिंगकी पूजा उचित है। आषाढ़मासमें मोतीके बने हुए शिवलिंगको पूजनीय समझे। श्रावणमासमें नीलमका बना हुआ शिवलिंग पूजनके योग्य है। भाद्रपदमासमें पूजनके लिये पद्मराग मणिमय शिवलिंगको उत्तम माना गया है। आश्विनमासमें गोमेदमणिके बने हुए लिंगको उत्तम समझे। कार्तिकमासमें मूँगेके और मार्गशीर्षमासमें वैदूर्यमणिके बने हुए लिंगकी पूजाका विधान है। पौषमासमें पुष्पराग (पुखराज)-मणिके तथा माघ-मासमें सूर्यकान्तमणिके लिंगका पूजन करना चाहिये। फाल्गुनमासमें चन्द्रकान्तमणिके और चैत्रमें सूर्यकान्तमणिके बने हुए लिंगके पूजनकी विधि है। अथवा रत्नोंके न मिलनेपर सभी मासोंमें सुवर्णमय लिंगका ही पूजन करना चाहिये। सुवर्णके अभावमें चाँदी, ताँबे, पत्थर, मिट्टी, लाह या और किसी वस्तुका जो सुलभ हो, लिंग बना लेना चाहिये। अथवा अपनी रुचिके अनुसार सर्वगन्धमय लिंगका निर्माण करे। व्रतकी समाप्तिके समय नित्यकर्म पूर्ण करके पूर्ववत् विशेष पूजा और हवन करनेके पश्चात् आचार्यका तथा विशेषतः व्रती ब्राह्मणका पूजन करे। फिर आचार्यकी आज्ञा ले पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके कुशासनपर बैठे। हाथमें कुश ले, प्राणायाम करके, ‘साम्बसदाशिव’ का ध्यान करते हुए यथाशक्ति मूलमन्त्रका जप करे। फिर पूर्ववत् आज्ञा ले हाथ जोड़ नमस्कार करके