शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
कहे—‘भगवन्! अब मैं आपकी आज्ञासे इस व्रतका उत्सर्ग करता हूँ।’ ऐसा कह शिवलिंगके मूल भागमें उत्तरदिशाकी ओर कुशोंका त्याग करे। तदनन्तर दण्ड, चीर, जटा और मेखलाको भी त्याग दे। इसके बाद फिर विधिपूर्वक आचमन करके पंचाक्षरमन्त्रका जप करे।
जो आत्यन्तिक दीक्षा ग्रहण करके अपने शरीरका अन्त होनेतक शान्तभावसे इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह ‘नैष्ठिक व्रती’ कहा गया है। उसे सब आश्रमोंसे ऊपर उठा हुआ महापाशुपत जानना चाहिये। वही तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ है और वही महान् व्रतधारी है। जो बारह दिनोंतक प्रतिदिन विधिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह भी नैष्ठिकके ही तुल्य है; क्योंकि उसने तीव्र व्रतका आश्रय लिया है। जो अपने शरीरमें घी लगाकर व्रतके सभी नियमोंके पालनमें तत्पर हो दो-तीन दिन या एक दिन भी इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह भी कोई नैष्ठिक ही है। जो निष्काम होकर अपना परम कर्तव्य मानकर अपने-आपको शिवके चरणोंमें समर्पित करके इस उत्तम व्रतका सदा अनुष्ठान करता है, उसके समान कहीं कोई नहीं है। विद्वान् ब्राह्मण भस्म लगाकर महापातक-जनित अत्यन्त दारुण पापोंसे भी तत्काल छूट जाता है, इसमें संशय नहीं है। रुद्राग्निका जो सबसे उत्तम वीर्य (बल) है, वही भस्म कहा गया है। अतः जो सभी समयोंमें भस्म लगाये रहता है, वह वीर्यवान् माना गया है। भस्ममें निष्ठा रखनेवाले पुरुषके सारे दोष उस भस्माग्निके संयोगसे दग्ध होकर नष्ट हो जाते हैं। जिसका शरीर भस्मस्नानसे विशुद्ध है, वह भस्मनिष्ठ कहा गया है। जिसके सारे अंगोंमें भस्म लगा हुआ है, जो भस्मसे प्रकाशमान है, जिसने भस्ममय त्रिपुण्ड्र लगा रखा है तथा जो भस्मसे स्नान करता है, वह भस्मनिष्ठ माना गया है। भूत, प्रेत, पिशाच तथा अत्यन्त दुःसह रोग भी भस्मनिष्ठके निकटसे दूर भागते हैं, इसमें संशय नहीं है। वह शरीरको भासित करता है, इसलिये ‘भसित’ कहा गया है तथा पापोंका भक्षण करनेके कारण उसका नाम ‘भस्म’ है। भूति (ऐश्वर्य)-कारक होनेसे उसे ‘भूति’ या ‘विभूति’ भी कहते हैं। विभूति रक्षा करनेवाली है, अतः उसका एक नाम ‘रक्षा’ भी है। भस्मके माहात्म्यको लेकर यहाँ और क्या कहा जाय। भस्मसे स्नान करनेवाला व्रती पुरुष साक्षात् महेश्वरदेव कहा गया है। यह परमेश्वर (रुद्राग्नि)-सम्बन्धी भस्म शिव-भक्तोंके लिये बड़ा भारी अस्त्र है; क्योंकि उसने धौम्य मुनिके बड़े भाई उपमन्युके तपमें आयी हुई आपत्तियोंका निवारण किया था; इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान करनेके पश्चात् हवन-सम्बन्धी भस्मका धनके समान संग्रह करके सदा भस्मस्नानमें तत्पर रहना चाहिये।
(अध्याय ३३)
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