शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* वायवीयसंहिता * ७१३
बालक उपमन्युको दूधके लिये दुःखी देख माताका उसे शिवकी आराधनाके लिये प्रेरित करना तथा उपमन्युकी तीव्र तपस्या
ऋषियोंने पूछा—प्रभो! धौम्यके बड़े भाई उपमन्यु जब छोटे बालक थे, तब उन्होंने दूधके लिये तपस्या की थी और भगवान् शिवने प्रसन्न होकर उन्हें क्षीरसागर प्रदान किया था। परंतु शैशवावस्थामें उन्हें शिवशास्त्रके प्रवचनकी शक्ति कैसे प्राप्त हुई अथवा वे कैसे शिवके सत्स्वरूपको जानकर तपस्यामें निरत हुए ? तपश्चरणके पर्वमें उन्हें भस्मके विज्ञानकी प्राप्ति कैसे हुई, जिससे जो रुद्राग्निका उत्तम वीर्य है, उस आत्मरक्षक भस्मको उन्होंने प्राप्त किया ?
वायुदेवने कहा—महर्षियो! जिन्होंने वह तप किया था, वे उपमन्यु कोई साधारण बालक नहीं थे, परम बुद्धिमान् मुनिवर व्याघ्रपादके पुत्र थे। उन्हें जन्मान्तरमें ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी थी। परंतु किसी कारणवश वे अपने पदसे च्युत हो गये—योगभ्रष्ट हो गये। अतः भाग्यवश जन्म लेकर वे मुनिकुमार हुए।
एक समयकी बात है अपने मामाके आश्रममें उन्हें पीनेके लिये बहुत थोड़ा दूध मिला। उनके मामाका बेटा अपनी इच्छाके अनुसार गरम-गरम उत्तम दूध पीकर उनके सामने खड़ा था। मातुलपुत्रको इस अवस्थामें देखकर व्याघ्रपादकुमार उपमन्युके मनमें ईर्ष्या हुई और वे अपनी माँके पास जाकर बड़े प्रेमसे बोले—'मातः! महाभागे! तपस्विनि! मुझे अत्यन्त स्वादिष्ट गरम-गरम गायका दूध दो। मैं थोड़ा-सा नहीं पीऊँगा।'
बेटेकी यह बात सुनकर व्याघ्रपादकी पत्नी तपस्विनी माताके मनमें उस समय बड़ा दुःख हुआ। उसने पुत्रको बड़े आदरके साथ छातीसे लगा लिया और प्रेमपूर्वक लाड़-प्यार करके अपनी निर्धनताका स्मरण हो आनेसे वह दुःखी हो विलाप करने लगी। महातेजस्वी बालक उपमन्यु बारंबार दूधको याद करके रोते हुए मातासे कहने लगे—'माँ! दूध दो, दूध दो।' बालकके उस हठको जानकर उस तपस्विनी ब्राह्मण-पत्नीने उसके हठके निवारणके लिये एक सुन्दर उपाय किया। उसने स्वयं उञ्छ-वृत्तिसे कुछ बीजोंका संग्रह किया था। उन बीजोंको देखकर उसने तत्काल उठा लिया और पीसकर पानीमें घोल दिया। फिर मीठी वाणीमें बोली—'आओ, आओ मेरे लाल!' यों कह बालकको शान्त करके हृदयसे लगा लिया और दुःखसे पीड़ित हो उसने कृत्रिम दूध उसके हाथमें दे दिया। माताके दिये हुए उस बनावटी दूधको पीकर बालक अत्यन्त व्याकुल हो उठा और बोला—'माँ! यह दूध नहीं है।' तब वह बहुत दुःखी हो गयी और बेटेका मस्तक सूँघकर अपने दोनों हाथोंसे उसके कमलसदृश नेत्रोंको पोंछती हुई बोली—'बेटा! अपने पास सभी वस्तुओंका अभाव होनेके कारण दरिद्रतावश मुझ अभागिनीने पीसे हुए बीजको पानीमें घोलकर यह तुम्हें मिथ्या दूध दिया था। तुम 'दूध नहीं दिया' ऐसा कहकर रोते हुए मुझे बारंबार दुःखी करते हो। किंतु भगवान् शिवकी कृपाके बिना तुम्हारे लिये कहीं दूध नहीं है। भक्तिपूर्वक