शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
माता पार्वती और अनुचरोंसहित भगवान् शिवके चरणारविन्दोंमें जो कुछ समर्पित किया गया हो, वही सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका कारण होता है। महादेवजी ही धन देनेवाले हैं। इस समय हम लोगोंने उनकी आराधना नहीं की है। वे भगवान् ही सकाम पुरुषोंको उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाले हैं। हम लोगोंने आजसे पहले कभी भी धनकी कामनासे भगवान् शिवकी पूजा नहीं की है। इसीलिये हम दरिद्र हो गये और यही कारण है कि तुम्हारे लिये दूध नहीं मिल रहा है। बेटा! पूर्वजन्ममें भगवान् शिव अथवा विष्णुके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वही वर्तमान जन्ममें मिलता है, दूसरा कुछ नहीं।'*
उपमन्यु बोले—माँ! यदि माता पार्वतीसहित भगवान् शिव विद्यमान हैं, तब आजसे शोक करना व्यर्थ है। महाभागे! अब शोक छोड़ो, सब मंगलमय ही होगा। माँ! आज मेरी बात सुन लो। यदि कहीं महादेवजी हैं तो मैं देरसे या जल्दी ही उनसे क्षीरसागर माँग लाऊँगा।
वायुदेवता कहते हैं—उस महाबुद्धिमान् बालककी वह बात सुनकर उसकी मनस्विनी माता उस समय बहुत प्रसन्न हुई और यों बोली।
माताने कहा—बेटा! तुमने बहुत अच्छा विचार किया है। तुम्हारा यह विचार मेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। अब तुम देर न लगाओ। साम्ब सदाशिवका भजन करो। अन्य देवताओंको छोड़कर मन, वाणी और क्रियाद्वारा भक्तिभावके साथ पार्षदगणोंसहित उन्हीं साम्ब सदाशिवका भजन करो। 'नमः शिवाय' यह मन्त्र उन देवाधिदेव वरदायक शिवका साक्षात् वाचक माना गया है। प्रणवसहित जो दूसरे सात करोड़ महामन्त्र हैं, वे सब इसीमें लीन होते हैं और फिर इसीसे प्रकट होते हैं। यह मन्त्र दूसरे सभी मन्त्रोंसे प्रबल है। यही सबकी रक्षा करनेमें समर्थ है; अतः दूसरेकी इच्छा नहीं करनी चाहिये। इसलिये तुम दूसरे मन्त्रोंको त्यागकर केवल पंचाक्षरके जपमें लग जाओ। इस मन्त्रके जिह्वापर आते ही यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता है। यह उत्तम भस्म जिसे मैंने तुम्हारे पिताजीसे ही प्राप्त किया है, यह विरजा होमकी अग्निसे सिद्ध हुआ है, अतः बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंका निवारण करनेवाला है। मैंने तुम्हें जो पंचाक्षरमन्त्र बताया है, उसको मेरी आज्ञासे ग्रहण करो। इसके जपसे ही शीघ्र तुम्हारी रक्षा होगी।
वायुदेवता कहते हैं—इस प्रकार आज्ञा देकर और 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहकर माताने पुत्रको बिदा किया। मुनि उपमन्युने उस आज्ञाको शिरोधार्य करके ही उसके चरणोंमें प्रणाम किया और तपस्याके लिये जानेकी तैयारी की। उस समय माताने आशीर्वाद देते हुए कहा—'सब देवता तुम्हारा मंगल करें।' माताकी आज्ञा पाकर उस बालकने दुष्कर तपस्या आरम्भ की। हिमालय पर्वतके एक शिखरपर जाकर उपमन्यु एकाग्रचित्त हो केवल वायु पीकर
* पूर्वजन्मनि यद्दत्तं शिवमुद्दिश्य वै सुत। तदेव लभ्यते नान्यद् विष्णुमुद्दिश्य वा प्रभूम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ३४। ३२)