शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वायवीयसंहिता * ७१५
रहने लगे। उन्होंने आठ ईंटोंका एक मन्दिर बनाकर उसमें मिट्टीके शिवलिंगकी स्थापना की। उसमें माता पार्वती तथा गणोंसहित अविनाशी महादेवजीका आवाहन करके भक्तिभावसे पञ्चाक्षरमन्त्रद्वारा ही वनके पत्र-पुष्प आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करते हुए वे चिरकालतक उत्तम तपस्यामें लगे रहे। उस एकाकी कृशकाय बालक द्विजवर उपमन्युको शिवमें मन लगाकर तपस्या करते देख मरीचिके शापसे पिशाचभावको प्राप्त हुए कुछ मुनियोंने अपने राक्षसस्वभावसे सताना और उनके तपमें विघ्न डालना आरम्भ किया। उनके द्वारा सताये जानेपर भी उपमन्यु किसी प्रकार तपमें लगे रहे और सदा 'नमः शिवाय'-का आर्तनादकी भाँति जोर-जोरसे उच्चारण करते रहे। उस शब्दको सुनते ही उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाले वे मुनि उस बालकको सताना छोड़कर उसकी सेवा करने लगे। ब्राह्मणबालक महात्मा उपमन्युकी उस तपस्यासे सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रदीप्त एवं संतप्त हो उठा। (अध्याय ३४)
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भगवान् शंकरका इन्द्ररूप धारण करके उपमन्युके भक्तिभावकी परीक्षा लेना, उन्हें क्षीरसागर आदि देकर बहुत-से वर देना और अपना पुत्र मानकर पार्वतीके हाथमें सौंपना, कृतार्थ हुए उपमन्युका अपनी माताके स्थानपर लौटना
तदनन्तर भगवान् विष्णुके अनुरोध करनेपर श्रीशिवजीने पहले इन्द्रका रूप धारण करके उपमन्युके पास जानेका विचार किया। फिर श्वेत ऐरावतपर आरूढ़ हो स्वयं देवराज इन्द्रका शरीर ग्रहण करके भगवान् सदाशिव देवता, असुर, सिद्ध तथा बड़े-बड़े नागोंके साथ उपमन्यु मुनिके तपोवनकी ओर चले। उस समय वह ऐरावत दायीं सूँड़में चँवर लेकर शचीसहित दिव्यरूपवाले देवराज इन्द्रको हवा कर रहा था और बायीं सूँड़में श्वेत छत्र लेकर उनपर लगाये चल रहा था। इन्द्रका रूप धारण किये उमासहित भगवान् सदाशिव उस श्वेत छत्रसे उसी तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे उदित हुए पूर्ण चन्द्रमण्डलसे मन्दराचल शोभायमान होता है। इस तरह इन्द्रके स्वरूपका आश्रय ले परमेश्वर शिव उपमन्युके उस आश्रमपर अपने उस भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये जा पहुँचे। इन्द्ररूपधारी