शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 778, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें७६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
कलशपर ‘ॐ नं ईशानाय नमः, ईशानं स्थापयामि' कहकर ईशानकी स्थापना करे। पूर्ववर्ती कलशपर ‘ॐ मं तत्पुरुषाय नमः, तत्पुरुषं स्थापयामि' कहकर तत्पुरुषकी, दक्षिण कलशपर ‘ॐ शिं अघोराय नमः, अघोरं स्थापयामि' कहकर अघोरकी, वाम या उत्तरभागमें रखे हुए कलशपर ‘ॐ वां वामदेवाय नमः, वामदेवं स्थापयामि' कहकर वामदेवकी तथा पश्चिमके कलशपर ‘ॐ यं सद्योजाताय नमः, सद्योजातं स्थापयामि' कहकर सद्योजातकी स्थापना करे। तदनन्तर रक्षाविधान करके मुद्रा बाँधकर कलशोंको अभिमन्त्रित करे। इसके बाद पूर्ववत् शिवाग्निमें होम आरम्भ करे। पहले होमके लिये जो आधी खीर रखी गयी थी, उसका हवन करके शेषभाग शिष्यको खानेके लिये दे। पहलेकी भाँति मन्त्रोंका तर्पणान्त कर्म करके पूर्णाहुति होम करनेके पश्चात् प्रदीपन कर्म करे। प्रदीपन कर्ममें ‘ॐ हुं नमः शिवाय फट् स्वाहा' का उच्चारण करके क्रमशः हृदय आदि अंगोंको तीन-तीन आहुतियाँ देनी चाहिये। (अंगोंमें हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्रत्रय और अस्त्र—इन छःकी गणना है।) इनमेंसे एक-एक अंगको तीन-तीन बार मन्त्र पढ़कर तीन-तीन आहुतियाँ देनी चाहिये। इन सबके स्वरूपका तेजस्वीरूपमें चिन्तन करना चाहिये। इसके बाद ब्राह्मणकी कुमारी कन्याके द्वारा काते हुए सफेद सूतको एक बार त्रिगुण करके पुनः त्रिगुण करे। फिर उस सूत्रको अभिमन्त्रित करके उसका एक छोर शिष्यकी शिखाके अग्रभागमें बाँध दे। शिष्य सिर ऊँचा करके खड़ा हो जाय, उस अवस्थामें वह सूत उसके पैरके अँगूठेतक लटकता रहे। सूतको इस तरह लटकाकर उसमें सुषुम्णा नाड़ीकी संयोजना करे। फिर मन्त्रज्ञ गुरु शान्त मुद्राके साथ मूलमन्त्रसे तीन आहुतिका होम करके उस नाड़ीको लेकर उस सूत्रमें स्थापित करे। फिर पूर्ववत् फूल फेंककर शिष्यके हृदयमें ताड़न करे और उससे चैतन्यको लेकर बारह आहुतियोंके पश्चात् शिवको निवेदित कर उस लटकते हुए सूत्रको एक सूतसे जोड़े और ‘हुं फट्' मन्त्रसे रक्षा करके उस सूतको शिष्यके शरीरमें लपेट दे। फिर यह भावना करे कि शिष्यका शरीर मूलत्रयमय पाश है, भोग और भोग्यत्व ही इसका लक्षण है, यह विषय इन्द्रिय और देह आदिका जनक है।
तदनन्तर शान्त्यतीता आदि पाँच कलाओंको, जो आकाशादि तत्त्वरूपिणी हैं, उस सूत्रमें उनके नाम ले-लेकर जोड़ना चाहिये। यथा—
‘व्योमरूपिणीं शान्त्यतीतकलां योजयामि, वायुरूपिणीं शान्तिकलां योजयामि, तेजोरूपिणीं विद्याकलां योजयामि, जलरूपिणीं प्रतिष्ठाकलां योजयामि, पृथ्विरूपिणीं निवृत्तिकलां योजयामि।' इति।
इस तरह इन कलाओंका योजन करके उनके नामके अन्तमें ‘नमः' जोड़कर इनकी पूजा करे। यथा—‘शान्त्यतीतकलायै नमः, शान्तिकलायै नमः।' इत्यादि। अथवा आकाशादिके बीजभूत (हं यं रं वं लं) मन्त्रोंद्वारा या पंचाक्षरके पाँच अक्षरोंमें नाद-विन्दुका योग करके बीजरूप हुए उन मन्त्राक्षरोंद्वारा क्रमशः पूर्वोक्त कार्य करके तत्त्व आदिमें मलादि पाशोंकी व्याप्तिका चिन्तन करे। इसी तरह मलादि पाशोंमें भी कलाओंकी व्याप्ति देखे। फिर आहुति