भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 779

* वायवीयसंहिता * ७६५

करके उन कलाओंको संदीपित करे। तदनन्तर शिष्यके मस्तकपर पुष्पसे ताड़न करके उसके शरीरमें लिपटे हुए सूत्रको मूलमन्त्रके उच्चारणपूर्वक शान्त्यतीत पदमें अंकित करे। इस प्रकार क्रमशः शान्त्यतीतसे आरम्भ करके निवृत्तिकलापर्यन्त पूर्वोक्त कार्य करके तीन आहुतियाँ देकर मण्डलमें पुनः शिवका पूजन करे। इसके बाद देवताके दक्षिणभागमें शिष्यको कुशयुक्त आसनपर मण्डलमें उत्तराभिमुख बिठाकर गुरु होमावशिष्ट चरु उसे दे। गुरुके दिये हुए उस चरुको शिष्य आदरपूर्वक ग्रहण करके शिवका नाम ले उसे खा जाय। फिर दो बार आचमन करके शिवमन्त्रका उच्चारण करे। इसके बाद गुरु दूसरे मण्डलमें शिष्यको पंचगव्य दे। शिष्य भी अपनी शक्तिके अनुसार उसे पीकर दो बार आचमन करके शिवका स्मरण करे। इसके बाद गुरु शिष्यको मण्डलमें पूर्ववत् बिठाकर उसे शास्त्रोक्त लक्षणसे युक्त दन्तधावन दे। शिष्य पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके बैठे और मौन हो उस दतौनके कोमल अग्रभागद्वारा अपने दाँतोंकी शुद्धि करे। फिर उस दतौनको धोकर फेंक दे और कुल्ला करके मुँह-हाथ धोकर शिवका स्मरण करे। फिर गुरुकी आज्ञा पाकर शिष्य हाथ जोड़े हुए शिवमण्डलमें प्रवेश करे। उस फेंके हुए दतौनको यदि गुरुने पूर्व, उत्तर या पश्चिम दिशामें अपने सामने देख लिया तब तो मंगल है; अन्यथा अन्य दिशाओंमें देखनेपर अमंगल होता है। यदि निन्दित दिशाकी ओर वह दीख जाय तो उसके दोषकी शान्तिके लिये गुरु मूलमन्त्रसे एक सौ आठ या चौवन आहुतियोंका होम करे। तत्पश्चात् शिष्यका स्पर्श करके उसके कानमें 'शिव' नामका जप करके महादेवजीके दक्षिणभागमें शिष्यको बिठाये। वहाँ नूतन वस्त्रपर बिछे हुए कुशके अभिमन्त्रित आसनपर पवित्र हुआ शिष्य मन-ही-मन शिवका ध्यान करते हुए पूर्वकी ओर सिरहाना करके रातमें सोये। शिखामें सूत बँधे हुए उस शिष्यकी शिखाको शिखासे ही बाँधकर गुरु नूतन वस्त्रद्वारा हुंकार-उच्चारण करके उसे ढक दे। फिर शिष्यके चारों ओर भस्म, तिल और सरसोंसे तीन रेखा खींचकर फट्-मन्त्रका जप करके रेखाके बाह्यभागमें दिक्पालोंके लिये बलि दे। शिष्य भी उपवासपूर्वक वहाँ रातमें सोया रहे और सबेरा होनेपर उठकर अपने देखे हुए स्वप्नकी बातें गुरुको बताये।

(अध्याय १७)


षडध्वशोधनकी विधि

उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! तदनन्तर गुरुकी आज्ञा ले शिष्य स्नान आदि सम्पूर्ण कर्मको समाप्त करके शिवका चिन्तन करता हुआ हाथ जोड़ शिवमण्डलके समीप जाय। इसके बाद पूजाके सिवा पहले दिनका शेष सारा कृत्य नेत्रबन्धनपर्यन्त कर लेनेके अनन्तर गुरु उसे मण्डलका दर्शन कराये। आँखमें पट्टी बँधे रहनेपर शिष्य कुछ फूल बिखेरे। जहाँ भी फूल गिरें, वहीं उसको उपदेश दे। फिर पूर्ववत् उसे निर्माल्य मण्डलमें ले जाकर ईशानदेवकी पूजा कराये और शिवाग्निमें हवन करे। यदि