भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गुड़, चाँदी, नमक, कोंहड़ा और कन्या— ये ही वे बारह वस्तुएँ हैं। इनमें गोदानसे कायिक, वाचिक और मानसिक पापोंका निवारण तथा कायिक आदि पुण्यकर्मोंकी पुष्टि होती है। ब्राह्मणो! भूमिका दान इहलोक और परलोकमें प्रतिष्ठा (आश्रय)- की प्राप्ति करानेवाला है। तिलका दान बलवर्धक एवं मृत्युका निवारक होता है। सुवर्णका दान जठराग्निको बढ़ानेवाला तथा वीर्यदायक है। घीका दान पुष्टिकारक होता है। वस्त्रका दान आयुकी वृद्धि करानेवाला है, ऐसा जानना चाहिये। धान्यका दान अन्न-धनकी समृद्धिमें कारण होता है। गुड़‌का दान मधुर भोजनकी प्राप्ति करानेवाला होता है। चाँदीके दानसे वीर्यकी वृद्धि होती है। लवणका दान षड्रस भोजनकी प्राप्ति कराता है। सब प्रकारका दान सारी समृद्धिकी सिद्धिके लिये होता है। विज्ञ पुरुष कूष्माण्डके दानको पुष्टिदायक मानते हैं। कन्याका दान आजीवन भोग देनेवाला कहा गया है। ब्राह्मणो! वह लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति करानेवाला है।

विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जिन वस्तुओंसे श्रवण आदि इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है, उनका सदा दान करे। श्रोत्र आदि दस इन्द्रियोंके जो शब्द आदि दस विषय हैं, उनका दान किया जाय तो वे भोगोंकी प्राप्ति कराते हैं तथा दिशा आदि इन्द्रिय* देवताओंको संतुष्ट करते हैं। वेद और शास्त्रको गुरुमुखसे ग्रहण करके गुरुके उपदेशसे अथवा स्वयं ही बोध प्राप्त करनेके पश्चात् जो बुद्धिका यह निश्चय होता है कि ‘कर्मोंका फल अवश्य मिलता है’, इसीको उच्चकोटिकी ‘आस्तिकता’ कहते हैं। भाई-बन्धु अथवा राजाके भयसे जो आस्तिकता-बुद्धि या श्रद्धा होती है, वह कनिष्ठ श्रेणीकी आस्तिकता है। जो सर्वथा दरिद्र है, इसलिये जिसके पास सभी वस्तुओंका अभाव है, वह वाणी अथवा कर्म (शरीर)-द्वारा यजन करे। मन्त्र, स्तोत्र और जप आदिको वाणीद्वारा किया गया यजन समझना चाहिये तथा तीर्थयात्रा और व्रत आदिको विद्वान् पुरुष शारीरिक यजन मानते हैं। जिस किसी भी उपायसे थोड़ा हो या बहुत, देवतार्पण-बुद्धिसे जो कुछ भी दिया अथवा किया जाय, वह दान या सत्कर्म भोगोंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ होता है। तपस्या और दान— ये दो कर्म मनुष्यको सदा करने चाहिये तथा ऐसे गृहका दान करना चाहिये, जो अपने वर्ण (चमक-दमक या सफाई) और गुण (सुख-सुविधा)-से सुशोभित हो। बुद्धिमान् पुरुष देवताओंकी तृप्तिके लिये जो कुछ देते हैं, वह अतिशय मात्रामें और सब प्रकारके भोग प्रदान करनेवाला होता है। उस दानसे विद्वान् पुरुष इहलोक और


अर्थात् खेत कट जाने या बाजार उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए अन्नके एक-एक कणको चुनना और उससे जीविका चलाना 'उञ्छ' वृत्ति है तथा खेतकी फसल कट जानेपर वहाँ पड़ी गेहूँ आदिकी बालें बीनना 'शिला' कहा है और उससे जीविका चलाना 'शिला' वृत्ति है।
* श्रवणेन्द्रियके देवता दिशाएँ, नेत्रके सूर्य, नासिकाके अश्विनीकुमार, रसनेन्द्रियके वरुण, त्वगिन्द्रियके वायु, वागिन्द्रियके अग्नि, लिंगके प्रजापति, गुदाके मित्र, हाथोंके इन्द्र और पैरोंके देवता विष्णु हैं।

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