भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* विद्येश्वरसंहिता * ६७


परलोकमें उत्तम जन्म और सदा सुलभ यज्ञ-दान आदि कर्म करके मनुष्य मोक्ष-होनेवाला भोग पाता है। ईश्वरार्पणबुद्धिसे फलका भागी होता है। (अध्याय १५)

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पृथ्वी आदिसे निर्मित देवप्रतिमाओंके पूजनकी विधि, उनके लिये नैवेद्यका विचार, पूजनके विभिन्न उपचारोंका फल, विशेष मास,वार, तिथि एवं नक्षत्रोंके योगमें पूजनका विशेष फल तथा लिंगके वैज्ञानिक स्वरूपका विवेचन

ऋषियोंने कहा—साधुशिरोमणे! अब आप पार्थिव प्रतिमाकी पूजाका विधान बताइये, जिससे समस्त अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होती है।

सूतजी बोले—महर्षियो! तुमलोगोंने बहुत उत्तम बात पूछी है। पार्थिव प्रतिमाका पूजन सदा सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है तथा दुःखका तत्काल निवारण करने-वाला है। मैं उसका वर्णन करता हूँ, तुमलोग उसको ध्यान देकर सुनो। पृथ्वी आदिकी बनी हुई देव प्रतिमाओंकी पूजा इस भूतलपर अभीष्टदायक मानी गयी है, निश्चय ही इसमें पुरुषोंका और स्त्रियोंका भी अधिकार है। नदी, पोखरे अथवा कुएँमें प्रवेश करके पानीके भीतरसे मिट्टी ले आये। फिर गन्ध-चूर्णके द्वारा उसका संशोधन करे और शुद्ध मण्डपमें रखकर उसे महीन पीसे और साने। इसके बाद हाथसे प्रतिमा बनाये और दूधसे उसका सुन्दर संस्कार करे। उस प्रतिमामें अंग-प्रत्यंग अच्छी तरह प्रकट हुए हों तथा वह सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न बनायी गयी हो। तदनन्तर उसे पद्मासनपर स्थापित करके आदरपूर्वक उसका पूजन करे। गणेश, सूर्य, विष्णु, दुर्गा और शिवकी प्रतिमाका, शिवका एवं शिवलिंग-का द्विजको सदा पूजन करना चाहिये। षोडशोपचार-पूजनजनित फलकी सिद्धिके लिये सोलह उपचारोंद्वारा पूजन करना चाहिये। पुष्पसे प्रोक्षण और मन्त्र-पाठपूर्वक अभिषेक करे। अगहनीके चावलसे नैवेद्य तैयार करे। सारा नैवेद्य एक कुडव (लगभग पावभर) होना चाहिये। घरमें पार्थिव-पूजनके लिये एक कुडव और बाहर किसी मनुष्यद्वारा स्थापित शिवलिंगके पूजनके लिये एक प्रस्थ (सेरभर) नैवेद्य तैयार करना आवश्यक है, ऐसा जानना चाहिये। देवताओंद्वारा स्थापित शिवलिंगके लिये तीन सेर नैवेद्य अर्पित करना उचित है और स्वयं प्रकट हुए स्वयम्भूल्लिंगके लिये पाँच सेर। ऐसा करनेपर पूर्ण फलकी प्राप्ति समझनी चाहिये। इस प्रकार सहस्र बार पूजा करनेसे द्विज सत्यलोकको प्राप्त कर लेता है।

बारह अंगुल चौड़ा, इससे दूना और एक अंगुल अधिक अर्थात् पचीस अंगुल लंबा तथा पंद्रह अंगुल चौड़ा जो लोहे या लकड़ीका बना हुआ पात्र होता है, उसे विद्वान् पुरुष 'शिव' कहते हैं। उसका आठवाँ भाग प्रस्थ कहलाता है, जो चार


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