भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त शिवपुराण *


त्रैलोक्यवन्दिता, साक्षात् उल्का (लुकाठी)-जैसी आकृतिवाली गणाम्बिका, जो जगत्की सृष्टि बढ़ानेके लिये ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर शिवके शरीरसे पृथक् हुई शिवाके दोनों भौंहोंके बीचसे निकली थीं, जो दाक्षायणी, सती, मेना तथा हिमवान्‌कुमारी उमा आदिके रूपमें प्रसिद्ध हैं; कौशिकी, भद्रकाली, अपर्णा और पाटलाकी जननी हैं; नित्य शिवार्चनमें तत्पर रहती हैं एवं रुद्रवल्लभा रुद्राणी कहलाती हैं, वे शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु दें॥ ७६—७९॥

चण्डः सर्वगणेशानः शम्भोर्वदनसम्भवः।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ८०॥

समस्त शिवगणोंके स्वामी चण्ड, जो भगवान् शंकरके मुखसे प्रकट हुए हैं, शिवा और शिवकी आज्ञाका आदर करके मुझे अभीष्ट वस्तु प्रदान करें॥ ८०॥

पिङ्गलो गणपः श्रीमान् शिवासक्तः शिवप्रियः।
आज्ञया शिवयोरेव स मे कामं प्रयच्छतु॥ ८१॥

भगवान् शिवमें आसक्त और शिवके प्रिय गणपाल श्रीमान् पिंगल शिव और शिवाकी आज्ञासे ही मेरी मनःकामना पूर्ण करें॥ ८१॥

भृङ्गीशो नाम गणपः शिवारोधनतत्परः।
प्रयच्छतु स मे कामं पत्युराज्ञापुरस्सरम्॥ ८२॥

शिवकी आराधनामें तत्पर रहनेवाले भृङ्गीश्वर नामक गणपाल अपने स्वामीकी आज्ञा ले मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ ८२॥

वीरभद्रो महातेजा हिमकुन्देन्दुसंनिभः।
भद्रकालीप्रियो नित्यं मातृणां चाभिरक्षिता॥ ८३॥
यज्ञस्य च शिरोहर्ता दक्षस्य च दुरात्मनः।
उपेन्द्रैन्द्रयमादीनां देवानामङ्गतक्षकः॥ ८४॥
शिवस्यानुचरः श्रीमान् शिवशासनपालकः।
शिवयोः शासनादेव स मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ८५॥

हिम, कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल, भद्रकालीके प्रिय, सदा ही मातृगणोंकी रक्षा करनेवाले; दुरात्मा दक्ष और उसके यज्ञका सिर काटनेवाले; उपेन्द्र, इन्द्र और यम आदि देवताओंके अंगोंमें घाव कर देनेवाले, शिवके अनुचर तथा शिवकी आज्ञाके पालक, महातेजस्वी श्रीमान् वीरभद्र शिव और शिवाके आदेशसे ही मुझे मेरी मनचाही वस्तु दें॥ ८३—८५॥

सरस्वती महेशस्य वाक्सरोजसमुद्भवा।
शिवयोः पूजने सक्ता सा मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ८६॥

महेश्वरके मुखकमलसे प्रकट हुई तथा शिव-पार्वतीके पूजनमें आसक्त रहनेवाली वे सरस्वतीदेवी मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ ८६॥

विष्णोर्वक्षःस्थिता लक्ष्मीः शिवयोः पूजने रता।
शिवयोः शासनादेव सा मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ८७॥

भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान लक्ष्मीदेवी, जो सदा शिव और शिवाके पूजनमें लगी रहती हैं, उन शिवदम्पतीके आदेशसे ही मेरी अभिलाषा पूर्ण करें॥ ८७॥

महामोटी महादेव्याः पादपूजापरायणा।
तस्या एव नियोगेन सा मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ८८॥

महादेवी पार्वतीके पादपद्मोंकी पूजामें परायण महामोटी उन्हींकी आज्ञासे मेरी मनचाही वस्तु मुझे दें॥ ८८॥

कौशिकी सिंहमारूढा पार्वत्याः परमा सुता।
विष्णोर्निद्रा महामाया महामहिषमर्दिनी॥ ८९॥
निशुम्भशुम्भसंहन्त्री मधुमांसासवप्रिया।
सत्कृत्य शासनं मातुः सा मे दिशतु काङ्क्षितम्॥ ९०॥