भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* वायवीयसंहिता *८०१

पार्वतीकी सबसे श्रेष्ठ पुत्री सिंहवाहिनी कौशिकी, भगवान् विष्णुकी योगनिद्रा महामाया, महामहिषमर्दिनी, महालक्ष्मी तथा मधु और फलोंके गूदे तथा रसको प्रेमपूर्वक भोग लगानेवाली निशुम्भ-शुम्भसंहारिणी महासरस्वती माता पार्वतीकी आज्ञासे मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ ८९-९०॥

देव्याः प्रियसखीवर्गो देवीलक्षणलक्षितः ॥ ९६ ॥
सहितो रुद्रकन्याभिः शक्तिभिश्चाप्यनेकशः ।
तृतीयावरणे शम्भोर्भक्त्या नित्यं समर्चितः ॥ ९७ ॥
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम्।
देवीकी प्रिय सखियोंका समुदाय, जो देवीके ही लक्षणोंसे लक्षित है और भगवान् शिवके तीसरे आवरणमें रुद्रकन्याओं तथा अनेक शक्तियोंसहित नित्य भक्तिभावसे पूजित हुआ है, वह शिव-पार्वतीकी आज्ञाका सत्कार करके मुझे मंगल प्रदान करे॥ ९६-९७$\frac{१}{२}$॥

रुद्रा रुद्रसमप्रख्याः प्रमथाः प्रथितौजसः।
भूताख्याश्च महावीर्या महादेवसमप्रभाः ॥ ९१ ॥
नित्यमुक्ता निरुपमा निर्द्वन्द्वा निरुपप्लवाः।
सशक्तयः सानुचराः सर्वलोकनमस्कृताः ॥ ९२ ॥
सर्वेषामेव लोकानां सृष्टिसंहरणक्षमाः।
परस्परानुरक्ताश्च परस्परमनुव्रताः ॥ ९३ ॥
परस्परमतिस्निग्धाः परस्परनमस्कृताः।
शिवप्रियतमा नित्यं शिवलक्षणलक्षिताः ॥ ९४ ॥
सौम्या घोरास्तथा मिश्राश्चान्तरालद्वयात्मिकाः।
विरूपाश्च सुरूपाश्च नानारूपधरास्तथा ॥ ९५ ॥
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं दिशन्तु वै।

रुद्रदेवके समान तेजस्वी रुद्रगण, प्रख्यातपराक्रमी प्रमथगण तथा महादेवजीके समान तेजस्वी महाबली भूतगण, जो नित्यमुक्त, उपमारहित, निर्द्वन्द्व, उपद्रवशून्य, शक्तियों और अनुचरोंके साथ रहनेवाले, सर्वलोकवन्दित, समस्त लोकोंकी सृष्टि और संहारमें समर्थ, परस्पर एक-दूसरेके अनुरक्त और भक्त, आपसमें अत्यन्त स्नेह रखनेवाले, एक-दूसरेको नमस्कार करनेवाले, शिवके नित्य प्रियतम, शिवके ही चिह्नोंसे लक्षित, सौम्य, घोर, उभय भावयुक्त, दोनोंके बीचमें रहनेवाले द्विरूप, कुरूप, सुरूप और नानारूपधारी हैं, वे शिव और शिवाकी आज्ञाका सत्कार करते हुए मेरा मनोरथ सिद्ध करें॥ ९१—९५$\frac{१}{२}$॥

दिवाकरो महेशस्य मूर्तिर्दीप्तसुमण्डलः ॥ ९८ ॥
निर्गुणो गुणसंकीर्णस्तथैव गुणकेवलः।
अविकारात्मकश्चाद्य एकः सामान्यविक्रियः ॥ ९९ ॥
असाधारणकर्मा च सृष्टिस्थितिलयक्रमात्।
एवं त्रिधा चतुर्द्धा च विभक्तः पञ्चधा पुनः ॥ १०० ॥
चतुर्थावरणे शम्भोः पूजितश्चानुगैः सह।
शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः ॥ १०१ ॥
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम्।

भगवान् सूर्य महेश्वरकी मूर्ति हैं, उनका सुन्दर मण्डल दीप्तिमान् है, वे निर्गुण होते हुए भी कल्याणमय गुणोंसे युक्त हैं, केवल सद्गुणरूप हैं; निर्विकार, सबके आदि कारण और एकमात्र (अद्वितीय) हैं; यह सामान्य जगत् उन्हींकी सृष्टि है, सृष्टि, पालन और संहारके क्रमसे उनके कर्म असाधारण हैं; इस तरह वे तीन, चार और पाँच रूपोंमें विभक्त हैं, भगवान् शिवके चौथे आवरणमें अनुचरोंसहित उनकी पूजा हुई है; वे शिवके प्रिय, शिवमें ही आसक्त तथा शिवके चरणारविन्दोंकी अर्चनामें तत्पर हैं; ऐसे सूर्यदेव शिवा और शिवकी आज्ञाका सत्कार करके मुझे मंगल प्रदान करें॥ ९८—१०१$\frac{१}{२}$॥


789 संक्षिप्त शिवपुराण—26 A