शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
दिवाकरषडङ्गानि दीप्ताद्याश्चाष्टशक्तयः ॥ १०२ ॥ आदित्यो भास्करो भानू रविश्चेत्यनुपूर्वशः । अर्को ब्रह्मा तथा रुद्रो विष्णुश्चादित्यमूर्तयः ॥ १०३ ॥ विस्तरा सुतरा बोधिन्याप्यायिन्यपराः पुनः । उषा प्रभा तथा प्राज्ञा संध्या चेत्यपि शक्तयः ॥ १०४ ॥ सोमादिकेतुपर्यन्ता ग्रहाश्च शिवभाविताः । शिवयोराज्ञया नुन्ना मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ॥ १०५ ॥ अथ वा द्वादशादित्यास्तथा द्वादश शक्तयः । ऋषयो देवगन्धर्वाः पन्नगाप्सरसां गणाः ॥ १०६ ॥ ग्रामण्यश्च तथा यक्षा राक्षसाश्च सुरास्तथा । सप्त सप्तगणाश्चैते सप्तच्छन्दोमया हयाः ॥ १०७ ॥ वालखिल्यादयश्चैव सर्वे शिवपदार्चकाः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे ॥ १०८ ॥
सूर्यदेवसे सम्बन्ध रखनेवाले छहों अंग, उनकी दीप्ता आदि आठ शक्तियाँ; आदित्य, भास्कर, भानु, रवि, अर्क, ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णु—ये आठ आदित्यमूर्तियाँ और उनकी विस्तरा, सुतरा, बोधिनी, आप्यायिनी तथा उनके अतिरिक्त उषा, प्रभा, प्राज्ञा और संध्या—ये शक्तियाँ; चन्द्रमासे लेकर केतुपर्यन्त शिवभावित ग्रह, बारह आदित्य, उनकी बारह शक्तियाँ तथा ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, अप्सराओंके समूह, ग्रामणी (अगुवा), यक्ष, राक्षस—ये सात-सात संख्यावाले गण, सात छन्दोमय अश्व, वालखिल्य आदि मुनि—ये सब-के-सब भगवान् शिवके चरणारविन्दोंकी अर्चना करनेवाले हैं। ये लोग शिव और पार्वतीकी आज्ञाका आदर करते हुए मुझे मंगल प्रदान करें॥ १०२—१०८॥
ब्रह्माथ देवदेवस्य मूर्तिर्भूमण्डलाधिपः । चतुःषष्टिगुणैश्वर्यो बुद्धितत्त्वे प्रतिष्ठितः ॥ १०९ ॥ निर्गुणो गुणसंकीर्णस्तथैव गुणकेवलः । अविकारात्मको देवस्ततः साधारणः पुरः ॥ ११० ॥ असाधारणकर्मा च सृष्टिस्थितिलयक्रमात् । एवं त्रिधा चतुर्द्धा च विभक्तः पञ्चधा पुनः ॥ १११ ॥ चतुर्थावरणे शम्भोः पूजितश्च सहानुगैः । शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः ॥ ११२ ॥ सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् ।
ब्रह्माजी देवाधिदेव महादेवजीकी मूर्ति हैं। भूमण्डलके अधिपति हैं। चौंसठ गुणोंके ऐश्वर्यसे युक्त हैं और बुद्धितत्त्वमें प्रतिष्ठित हैं। वे निर्गुण होते हुए भी अनेक कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न हैं, सद्गुणसमूहरूप हैं, निर्विकार देवता हैं, उनके सामने दूसरे सब लोग साधारण हैं। सृष्टि, पालन और संहारके क्रमसे उनके सब कर्म असाधारण हैं। इस तरह वे तीन, चार एवं पाँच आवरणों या स्वरूपोंमें विभक्त हैं। भगवान् शिवके चौथे आवरणमें अनुचरोंसहित उनकी पूजा हुई है; वे शिवके प्रिय, शिवमें ही आसक्त तथा शिवके चरणारविन्दोंकी अर्चनामें तत्पर हैं; ऐसे ब्रह्मदेव शिवा और शिवकी आज्ञाका सत्कार करके मुझे मंगल प्रदान करें॥ १०९—११२$\frac{१}{२}$॥
हिरण्यगर्भो लोकेशो विराट् कालश्च पूरुषः ॥ ११३ ॥ सनत्कुमारः सनकः सनन्दश्च सनातनः । प्रजानां पतयश्चैव दक्षाद्या ब्रह्मसूनवः ॥ ११४ ॥ एकादश सपत्नीका धर्मः संकल्प एव च । शिवार्चनरताश्चैते शिवभक्तिपरायणाः ॥ ११५ ॥ शिवाज्ञावशगाः सर्वे दिशन्तु मम मङ्गलम् ।
हिरण्यगर्भ, लोकेश, विराट्, कालपुरुष, सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, दक्ष आदि ब्रह्मपुत्र, ग्यारह प्रजापति और उनकी पत्नियाँ, धर्म तथा संकल्प—ये सब-के-सब शिवकी अर्चनामें तत्पर रहनेवाले और शिवभक्तिपरायण हैं, अतः
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