भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* वायवीयसंहिता * ८०३

शिवकी आज्ञाके अधीन हो मुझे मंगल प्रदान करें॥ ११३-११५$\frac{१}{२}$॥

चत्वारश्च तथा वेदाः सेतिहासपुराणकाः॥ ११६॥
धर्मशास्त्राणि विद्याभिर्वैदिकीभिः समन्विताः।
परस्पराविरुद्धार्थाः शिवप्रकृतिपादकाः॥ ११७॥
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे।

चार वेद, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और वैदिक विद्याएँ—ये सब-के-सब एकमात्र शिवके स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाले हैं; अतः इनका तात्पर्य एक-दूसरेके विरुद्ध नहीं है। ये सब शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मंगल करें॥ ११६-११७$\frac{१}{२}$॥

अथ रुद्रो महादेवः शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी॥ ११८॥
वाह्नेयमण्डलाधीशः पौरुषैश्वर्यवान् प्रभुः।
शिवाभिमानसम्पन्नो निर्गुणस्त्रिगुणात्मकः॥ ११९॥
केवलं सात्त्विकश्चापि राजसश्चैव तामसः।
अविकाररतः पूर्वं ततस्तु समविक्रियः॥ १२०॥
असाधारणकर्मा च सृष्ट्यादिकरणात्पृथक्।
ब्रह्मणोऽपि शिरश्छेत्ता जनकस्तस्य तत्सुतः॥ १२१॥
जनकस्तनयश्चापि विष्णोरपि नियामकः।
बोधकश्च तयोर्नित्यमनुग्रहकरः प्रभुः॥ १२२॥
अण्डस्यान्तर्बहिर्वर्ती रुद्रो लोकद्वयाधिपः।
शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः॥ १२३॥
शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य स मे दिशतु मङ्गलम्।

महादेव रुद्र शम्भुकी सबसे गरिष्ठ मूर्ति हैं। ये अग्निमण्डलके अधीश्वर हैं। समस्त पुरुषार्थों और ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हैं, सर्वसमर्थ हैं। इनमें शिवत्वका अभिमान जाग्रत् है। ये निर्गुण होते हुए भी त्रिगुणरूप हैं। केवल सात्त्विक, राजस और तामस भी हैं। ये पहलेसे ही निर्विकार हैं। सब कुछ इन्हींकी सृष्टि है। सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण इनका कर्म असाधारण माना जाता है। ये ब्रह्माजीके भी मस्तकका छेदन करनेवाले हैं। ब्रह्माजीके पिता और पुत्र भी हैं। इसी तरह विष्णुके भी जनक और पुत्र हैं तथा उन्हें नियन्त्रणमें रखनेवाले हैं। ये उन दोनों—ब्रह्मा और विष्णुको ज्ञान देनेवाले तथा नित्य उनपर अनुग्रह रखनेवाले हैं। ये प्रभु ब्रह्माण्डके भीतर और बाहर भी व्याप्त हैं तथा इहलोक और परलोक—दोनों लोकोंके अधिपति रुद्र हैं। ये शिवके प्रिय, शिवमें ही आसक्त तथा शिवके ही चरणारविन्दोंकी अर्चनामें तत्पर हैं, अतः शिवकी आज्ञाको सामने रखते हुए मेरा मंगल करें॥ ११८-१२३$\frac{१}{२}$॥

तस्य ब्रह्म षडङ्गानि विद्येशानां तथाष्टकम्॥ १२४॥
चत्वारो मूर्तिभेदाश्च शिवपूर्वाः शिवार्चकाः।
शिवो भवो हरश्चैव मृडश्चैव तथापरः।
शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य मङ्गलं प्रदिशन्तु मे॥ १२५॥

भगवान् शंकरके स्वरूपभूत ईशानादि ब्रह्म, हृदयादि छः अंग, आठ विद्येश्वर, शिव आदि चार मूर्तिभेद—शिव, भव, हर और मृड—ये सब-के-सब शिवके पूजक हैं। ये लोग शिवकी आज्ञाको शिरोधार्य करके मुझे मंगल प्रदान करें॥ १२४-१२५॥

अथ विष्णुर्महेशस्य शिवस्यैव परा तनुः।
वारितत्त्वाधिपः साक्षाद्व्यक्तपदसंस्थितः॥ १२६॥
निर्गुणः सत्त्वबहुलस्तथैव गुणकेवलः।
अविकाराभिमानी च त्रिसाधारणविक्रियः॥ १२७॥
असाधारणकर्मा च सृष्ट्यादिकरणात्पृथक्।
दक्षिणाङ्गभवेनापि स्पर्धमानः स्वयम्भुवा॥ १२८॥
आद्येन ब्रह्मणा साक्षात्सृष्टः स्रष्टा च तस्य तु।
अण्डस्यान्तर्बहिर्वर्ती विष्णुर्लोकद्वयाधिपः॥ १२९॥
असुरान्तकरश्चक्री शक्रस्यापि तथानुजः।
प्रादुर्भूतश्च दशधा भृगुशापच्छलादिह॥ १३०॥
भूभारनिग्रहार्थाय स्वेच्छयावातरत् क्षितौ।
अप्रमेयबलो मायी मायया मोहयज्जगत्॥ १३१॥

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