भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* वायवीयसंहिता * | ८०५

त्रिशूल, वज्र, परशु, बाण, खड्ग, पाश, अंकुश और श्रेष्ठ आयुध पिनाक—ये महादेव तथा महादेवीके दिव्य आयुध शिव और शिवाकी आज्ञाका नित्य सत्कार करते हुए सदा मेरी रक्षा करें॥ १४०-१४१॥

वृषरूपधरो देवः सौरभेयो महाबलः।
वडवाख्यानलस्पर्द्धी पञ्चगोमातृभिर्वृतः ॥ १४२॥
वाहनत्वमनुप्राप्तस्तपसा परमेशयोः।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु ॥ १४३ ॥

वृषभरूपधारी देव, जो सुरभिके महाबली पुत्र हैं, वडवानलसे भी होड़ लगाते हैं, पाँच गोमाताओंसे घिरे रहते हैं और अपनी तपस्याके प्रभावसे परमेश्वर शिव तथा परमेश्वरी शिवाके वाहन हुए हैं, उन दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरी इच्छा पूर्ण करें ॥ १४२-१४३॥

नन्दा सुनन्दा सुरभिः सुशीला सुमनास्तथा।
पञ्च गोमातरस्त्वेताः शिवलोके व्यवस्थिताः ॥ १४४॥
शिवभक्तिपरा नित्यं शिवार्चनपरायणाः।
शिवयोः शासनादेव दिशन्तु मम वाञ्छितम् ॥ १४५॥

नन्दा, सुनन्दा, सुरभि, सुशीला और सुमना—ये पाँच गोमाताएँ सदा शिवलोकमें निवास करती हैं। ये सब-की-सब नित्य शिवार्चनमें लगी रहती और शिवभक्ति-परायणा हैं; अतः शिव तथा शिवाके आदेशसे ही मेरी इच्छाकी पूर्ति करें ॥ १४४-१४५॥

क्षेत्रपालो महातेजा नीलजीमूतसंनिभः।
दंष्ट्राकरालवदनः स्फुरद्रक्ताधरोज्ज्वलः ॥ १४६॥
रक्तोर्ध्वमूर्द्धजः श्रीमान् भ्रुकुटीकुटिलेक्षणः।
रक्तवृत्तत्रिनयनः शशिपन्नगभूषणः ॥ १४७॥
नग्नस्त्रिशूलपाशासिकपालोद्यतपाणिकः।
भैरवो भैरवैः सिद्धैर्योगिनीभिश्च संवृतः ॥ १४८॥
क्षेत्रे क्षेत्रसमासीनः स्थितो यो रक्षकः सताम्।
शिवप्रणामपरमः शिवसद्भावभावितः ॥ १४९॥
शिवाश्रितान् विशेषेण रक्षन् पुत्रानिवौरसान्।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् ॥ १५०॥

क्षेत्रपाल महान् तेजस्वी हैं, उनकी अंगकान्ति नील मेघके समान है और मुख दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता है। उनके लाल-लाल ओठ फड़कते रहते हैं, जिससे उनकी शोभा बढ़ जाती है, उनके सिरके बाल भी लाल और ऊपरको उठे हुए हैं। वे तेजस्वी हैं, उनकी भौंहें तथा आँखें भी टेढ़ी ही हैं। वे लाल और गोलाकार तीन नेत्र धारण करते हैं। चन्द्रमा और सर्प उनके आभूषण हैं। वे सदा नंगे ही रहते हैं तथा उनके हाथोंमें त्रिशूल, पाश, खड्ग और कपाल उठे रहते हैं। वे भैरव हैं और भैरवों, सिद्धों तथा योगिनियोंसे घिरे रहते हैं। प्रत्येक क्षेत्रमें उनकी स्थिति है। वे वहाँ सत्पुरुषोंके रक्षक होकर रहते हैं। उनका मस्तक सदा शिवके चरणोंमें झुका रहता है, वे सदा शिवके सद्भावसे भावित हैं तथा शिवके शरणागत भक्तोंकी औरस पुत्रोंकी भाँति विशेष रक्षा करते हैं। ऐसे प्रभावशाली क्षेत्रपाल शिव और शिवाकी आज्ञाका सत्कार करते हुए मुझे मंगल प्रदान करें ॥ १४६–१५०॥

तालजङ्घादयस्तस्य प्रथमावरणेऽर्चिताः।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां चत्वारः समवन्तु माम् ॥ १५१॥

तालजंघ आदि शिवके प्रथम आवरणमें पूजित हुए हैं, वे चारों देवता शिवकी आज्ञाका आदर करके मेरी रक्षा करें ॥ १५१ ॥

भैरवाद्याश्च ये चान्ये समन्तातस्य वेष्टिताः।
तेऽपि मामनुगृह्णन्तु शिवशासनगौरवात् ॥ १५२॥

जो भैरव आदि तथा दूसरे लोग शिवको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं, वे भी