शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिवके आदेशका गौरव मानकर मुझपर अनुग्रह करें॥ १५२॥
नारदाद्याश्च मुनयो दिव्या देवैश्च पूजिताः।
साध्या नागाश्च ये देवा जनलोकनिवासिनः॥ १५३॥
विनिर्वृत्ताधिकाराश्च महर्लोकनिवासिनः।
सप्तर्षयस्तथान्ये वै वैमानिकगणैः सह॥ १५४॥
सर्वे शिवार्चनरताः शिवाज्ञावशवर्तिनः।
शिवयोराज्ञया मह्यं दिशन्तु समकाङ्क्षितम्॥ १५५॥
नारद आदि देवपूजित दिव्य मुनि, साध्य, नाग, जनलोकनिवासी देवता, विशेषाधिकारसे सम्पन्न महर्लोकनिवासी, सप्तर्षि तथा अन्य वैमानिकगण सदाशिवकी अर्चनामें तत्पर रहते हैं। ये सब शिवकी आज्ञाके अधीन हैं, अतः शिवा और शिवकी आज्ञासे मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ १५३—१५५॥
गन्धर्वाद्याः पिशाचान्ताश्चतस्रो देवयोनयः।
सिद्धा विद्याधराद्याश्च येऽपि चान्ये नभश्चराः॥ १५६॥
असुरा राक्षसाश्चैव पातालतलवासिनः।
अनन्ताद्याश्च नागेन्द्रा वैनतेयादयो द्विजाः॥ १५७॥
कूष्माण्डाः प्रेतवेताला ग्रहा भूतगणाः परे।
डाकिन्यश्चापि योगिन्यः शाकिन्यश्चापि तादृशाः॥ १५८॥
क्षेत्रारामगृहादीनि तीर्थान्यायतननि च।
द्वीपाः समुद्रा नद्यश्च नदाश्चान्ये सरांसि च॥ १५९॥
गिरयश्च सुमेर्वाद्याः काननानि समन्ततः।
पशवः पक्षिणो वृक्षाः कृमिकीटादयो मृगाः॥ १६०॥
भुवनान्यपि सर्वाणि भुवनानामधीश्वराः।
अण्डान्यावरणैः सार्धं मासाश्च दश दिग्गजाः॥ १६१॥
वर्णाः पदानि मन्त्राश्च तत्त्वान्यपि सहाधिपैः।
ब्रह्माण्डधारका रुद्रा रुद्राश्चान्ये सशक्तिकाः॥ १६२॥
यच्च किंचिज्जगत्यस्मिन्दृष्टं चानुमितं श्रुतम्।
सर्वे कामं प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्॥ १६३॥
गन्धर्वोंसे लेकर पिशाचपर्यन्त जो चार देवयोनियाँ हैं, जो सिद्ध, विद्याधर, अन्य आकाशचारी, असुर, राक्षस, पातालतलवासी अनन्त आदि नागराज, गरुड आदि दिव्य पक्षी, कूष्माण्ड, प्रेत, वेताल, ग्रह, भूतगण, डाकिनियाँ, योगिनियाँ, शाकिनियाँ तथा वैसी ही और स्त्रियाँ, क्षेत्र, आराम (बगीचे), गृह आदि तीर्थ, देवमन्दिर, द्वीप, समुद्र, नदियाँ, नद, सरोवर, सुमेरु आदि पर्वत, सब ओर फैले हुए वन, पशु, पक्षी, वृक्ष, कृमि, कीट आदि, मृग, समस्त भुवन, भुवनेश्वर, आवरणोंसहित ब्रह्माण्ड, बारह मास, दस दिग्गज, वर्ण, पद, मन्त्र, तत्त्व, उनके अधिपति, ब्रह्माण्डधारक रुद्र, अन्य रुद्र और उनकी शक्तियाँ तथा इस जगत्में जो कुछ भी देखा, सुना और अनुमान किया हुआ है—ये सब-के-सब शिवा और शिवकी आज्ञासे मेरा मनोरथ पूर्ण करें॥ १५६—१६३॥
अथ विद्या परा शैवी पशुपाशविमोचिनी।
पञ्चार्थसंहिता दिव्या पशुविद्याबहिष्कृता॥ १६४॥
शास्त्रं च शिवधर्माख्यं धर्माख्यं च तदुत्तरम्।
शैवाख्यं शिवधर्माख्यं पुराणं श्रुतिसम्मितम्॥ १६५॥
शैवागमाश्च ये चान्ये कामिकाद्याश्चतुर्विधाः।
शिवाभ्यामविशेषेण उत्कृष्ट्येह समर्पिताः॥ १६६॥
ताभ्यामेव समाज्ञाता ममाभिप्रेतसिद्धये।
कर्मेदमनुमन्यन्तां सफलं साध्वनुष्ठितम्॥ १६७॥
जो पंच-पुरुषार्थस्वरूपा होनेसे पंचार्था कही गयी है, जिसका स्वरूप दिव्य है तथा जो पशुविद्याकी कोटिसे बाहर है, वह पशुओंको पाशसे मुक्त करनेवाली शैवी परा विद्या, शिवधर्मशास्त्र, शैवधर्म, श्रुतिसम्मत शिवसंज्ञकपुराण, शैवागम तथा धर्मकामादि चतुर्विध पुरुषार्थ, जिन्हें शिव और शिवाके समान ही मानकर उन्हींके समान