भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 827, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 827

* वायवीयसंहिता * ८१३

शत्रुओं अथवा अनेक प्रकारकी व्याधियोंका शिकार होकर और मौतके मुँहमें पड़कर भी मनुष्य बिना किसी विघ्न-बाधाके मुक्त हो जाता है। अत्यन्त कृपण भी उदार और निर्धन भी कुबेरके समान हो जाता है। कुरूप भी कामदेवके समान सुन्दर और बूढ़ा भी जवान हो जाता है। शत्रु क्षणभरमें मित्र और विरोधी भी किंकर हो जाता है। अमृत विषके समान और विष भी अमृतके समान हो जाता है। समुद्र भी स्थल और स्थल भी समुद्रवत् हो जाता है। गड्ढा पहाड़-जैसा ऊँचा और पर्वत भी गड्ढेके समान हो जाता है। अग्नि सरोवरके समान शीतल और सरोवर भी अग्निके समान दाहक बन जाता है। उद्यान जंगल और जंगल उद्यान हो जाता है। क्षुद्र मृग सिंहके समान शौर्यशाली और सिंह भी क्रीडामृगके समान आज्ञापालक हो जाता है। स्त्रियाँ अभिसारिका बन जाती हैं—अधिक प्रेम करने लगती हैं और लक्ष्मी सुस्थिर हो जाती है। वाणी इच्छानुसार दासी बन जाती है और कीर्ति गणिकाके समान सर्वत्रगामिनी हो जाती है। बुद्धि स्वेच्छानुसार विचरनेवाली और मन हीरेको छेदनेवाली सूईके समान सूक्ष्म हो जाता है। शक्ति आँधीके समान प्रबल हो जाती है और बल मत्त गजराजके समान पराक्रमशाली होता है। शत्रु-पक्षके उद्योग और कार्य स्तब्ध हो जाते हैं तथा शत्रुओंके समस्त सुहृद्गण उनके लिये शत्रुपक्षके समान हो जाते हैं। शत्रु बन्धु-बान्धवोंसहित जीते-जी मुर्देके समान हो जाते हैं और सिद्धपुरुष स्वयं आपत्तिमं पड़कर भी अरिष्टरहित (संकटमुक्त) हो जाता है। अमरत्व-सा प्राप्त कर लेता है। उसका खाया हुआ अपथ्य भी उसके लिये सदा रसायनका काम देता है। निरन्तर रतिका सेवन करनेपर भी वह नया-सा ही बना रहता है। भविष्य आदिकी सारी बातें उसे हाथपर रखे हुए आँवलेके समान प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं। अणिमा आदि सिद्धियाँ भी इच्छा करते ही फल देने लगती हैं। इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ, इस कर्मका सम्पादन कर लेनेपर सम्पूर्ण कामार्थ सिद्धियोंमें कोई भी ऐसी वस्तु नहीं रहती जो अलभ्य हो।

(अध्याय ३२)


पारलौकिक फल देनेवाले कर्म—शिवलिंग-महाव्रतकी विधि और महिमाका वर्णन

उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! अब मैं केवल परलोकमें फल देनेवाले कर्मकी विधि बतलाऊँगा। तीनों लोकोंमें इसके समान दूसरा कोई कर्म नहीं है। यह विधि अतिशय पुण्यसे युक्त है और सम्पूर्ण देवताओंने इसका अनुष्ठान किया है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्रादि लोकपाल, सूर्यादि नवग्रह, विश्वामित्र और वसिष्ठ आदि ब्रह्मवेत्ता महर्षि, श्वेत, अगस्त्य, दधीचि तथा हम-सरीखे शिवभक्त, नन्दीश्वर, महाकाल और भृंगीश आदि गणेश्वर, पातालवासी दैत्य, शेष आदि महानाग, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, भूत और पिशाच—इन सबने अपना-अपना पद प्राप्त करनेके लिये