भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 826, कुल 850 में से

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पृष्ठ 826

८१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

चाहिये। शान्ति और पुष्टिकर्मको विशेषतः शान्तचित्त पुरुष ही करे। जो निर्दय और क्रोधी हो, उसीको आभिचारिक कर्ममें प्रवृत्त होना चाहिये। वह भी उस दशामें, जबकि दुरवस्था चरम सीमाको पहुँच गयी हो और उसके निवारणका दूसरा कोई उपाय न रह गया हो, आततायीको नष्ट करनेके उद्देश्यसे आभिचारिक कर्म करना चाहिये। अपने राष्ट्रपतिको हानि पहुँचानेके उद्देश्यसे आभिचारिक कर्म कदापि नहीं करना चाहिये। यदि कोई आस्तिक, परम धर्मात्मा और माननीय पुरुष हो, उससे यदि कभी आततायीपनका कार्य हो जाय, तो भी उसको नष्ट करनेके उद्देश्यसे आभिचारिक कर्मका प्रयोग नहीं करना चाहिये। जो कोई भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् शिवके आश्रित हो, उसके तथा राष्ट्रपतिके उद्देश्यसे भी आभिचारिक कर्म करके मनुष्य शीघ्र ही पतित हो जाता है। इसलिये कोई भी पुरुष जो अपने लिये सुख चाहता हो, अपने राष्ट्रपालक राजाकी तथा शिवभक्तकी अभिचार आदिके द्वारा हिंसा न करे। दूसरे किसीके उद्देश्यसे भी मारण आदिका प्रयोग करनेपर पश्चात्तापसे युक्त हो प्रायश्चित्त करना चाहिये।

निर्धन या धनवान् पुरुष भी बाणलिंग (नर्मदासे प्रकट हुए शिवलिंग); ऋषियोंद्वारा स्थापित लिंग या वैदिक लिंगमें भगवान् शंकरकी पूजा करे। जहाँ ऐसे लिंगका अभाव हो वहाँ सुवर्ण और रत्नके बने हुए शिवलिंगमें पूजा करनी चाहिये। यदि सुवर्ण और रत्नोंके उपार्जनकी शक्ति न हो तो मनसे ही भावनामयी मूर्तिका निर्माण करके मानसिक पूजन करना चाहिये। अथवा प्रतिनिधि द्रव्योंद्वारा शिवलिंगकी कल्पना करनी चाहिये। जो किसी अंशमें समर्थ और किसी अंशमें असमर्थ है, वह भी यदि अपनी शक्तिके अनुसार पूजन-कर्म करता है तो अवश्य फलका भागी होता है। जहाँ इस कर्मका अनुष्ठान करनेपर भी फल नहीं दिखायी देता, वहाँ दो या तीन बार उसकी आवृत्ति करे। ऐसा करनेसे सर्वथा फलका दर्शन होगा। पूजाके उपयोगमें आया हुआ जो सुवर्ण, रत्न आदि उत्तम द्रव्य हो, वह सब गुरुको दे देना चाहिये तथा उसके अतिरिक्त दक्षिणा भी देनी चाहिये। यदि गुरु नहीं लेना चाहते हों तो वह सब वस्तु भगवान् शिवको ही समर्पित कर दे अथवा शिवभक्तोंको दे दे। इनके सिवा दूसरोंको देनेका विधान नहीं है। जो पुरुष गुरु आदिकी अपेक्षा न रखकर स्वयं यथाशक्ति पूजा सम्पन्न करता है, वह भी ऐसा ही आचरण करे। पूजामें चढ़ायी हुई वस्तु स्वयं न ले ले। जो मूढ़ लोभवश पूजाके अंगभूत उत्तम द्रव्यको स्वयं ग्रहण कर लेता है, वह अभीष्ट फलको नहीं पाता। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। किसीके द्वारा पूजित शिवलिंगको मनुष्य ग्रहण करे या न करे, यह उसकी इच्छापर निर्भर है। यदि ले ले तो स्वयं नित्य उसकी पूजा करे अथवा उसकी प्रेरणासे दूसरा कोई पूजा करे। जो पुरुष इस कर्मका शास्त्रीय विधिके अनुसार ही निरन्तर अनुष्ठान करता है, वह फल पानेसे कभी वंचित नहीं रहता। इससे बढ़कर प्रशंसाकी बात और क्या हो सकती है?

तथापि मैं संक्षेपसे कर्मजनित उत्तम सिद्धिकी महिमाका वर्णन करता हूँ। इससे

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