शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
भोग पाते और अन्तमें शिवयोगकी भी उपलब्धि कर लेते हैं। इसलिये भोगार्थी मनुष्योंको चाहिये कि वे रहनेको स्थान, खान-पान, शय्या तथा ओढ़ने-बिछानेकी सामग्री आदि देकर सदा शिवयोगियोंका सत्कार करें। योगधर्म ससार—अत्यन्त प्रबल है, अतः पापरूपी मुद्गरोंसे उसका भेदन नहीं हो सकता। योगधर्म और पाप-मुद्गरमें उतना ही अन्तर समझना चाहिये, जितना वज्र और तन्दुलमें; अतः योगीजन पापों और तापसमूहोंसे उसी तरह लिप्त नहीं होते, जैसे कमलका पत्ता पानीसे।
शिवयोगपरायण मुनि जिस देशमें नित्य निवास करता है, वह देश भी पवित्र हो जाता है। फिर उसकी पवित्रताके विषयमें तो कहना ही क्या। अतः चतुर एवं विद्वान् पुरुष सब कृत्योंको छोड़कर सम्पूर्ण दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये शिवयोगका अभ्यास करे। जिसका योगफल सिद्ध हो गया है, वह योगी यथेष्ट भोगोंको भोगकर समस्त लोकोंकी हित-कामनासे संसारमें विचरे अथवा अपने स्थानपर ही रहे या विषयसुखको अत्यन्त तुच्छ समझकर छोड़ दे और वैराग्ययोगसे स्वेच्छापूर्वक कर्मोंका परित्याग कर दे। जो मनुष्य बहुत-से अरिष्ट देखकर अपनी मृत्युको निकट जान ले, उसे योगानुष्ठानमें संलग्न हो शिवक्षेत्रका आश्रय लेना चाहिये। वह मनुष्य यदि धीरचित्त होकर वहीं निवास करता रहे तो रोग आदिके बिना भी स्वयं ही प्राणोंका परित्याग कर सकता है। अनशन करके, शिवाग्निमें शरीरकी आहुति देकर अथवा शिवतीर्थोंमें अवगाहन करते हुए अपने शरीरको उन्हींके जलमें डालकर शिवशास्त्रोक्त विधिसे जो अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह तत्काल मुक्त हो जाता है—इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है अथवा जो रोग आदिसे विवश होकर शिवक्षेत्रकी शरण लेता है, उसकी भी यदि वहाँ मृत्यु हो जाय तो वह इसी प्रकार मुक्त हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। इसलिये लोग अनशन आदिसे शिवक्षेत्रमें श्रेष्ठ मरणकी कामना करते हैं; क्योंकि शास्त्रपर विश्वास करके धीर हुए मनसे उनके द्वारा इस तरहकी मृत्यु स्वीकार की जाती है। जो शिवके लिये अथवा शिवभक्तोंके लिये प्राणत्याग करता है, उसके समान दूसरा कोई मनुष्य मुक्ति-मार्गपर स्थित नहीं है। इस कारण इस संसार-मण्डलसे उसकी शीघ्र मुक्ति हो जाती है। इनमेंसे किसी एक उपायका किसी तरह भी अवलम्बन करके अथवा विधिवत् षडध्वशुद्धिको प्राप्त होकर यदि कोई मनुष्य मरता है तो उसका अन्य पशुओं—प्राणियोंके समान यहाँ और्ध्वदैहिक संस्कार नहीं करना चाहिये। विशेषतः उसके पुत्र आदिको उसके मरनेसे अशौचकी प्राप्ति नहीं होती। ऐसे पुरुषके मृत शरीरको धरतीमें गाड़ दे या पवित्र अग्निसे जला दे या शिवस्वरूपजलमें डाल दे अथवा काठ या मिट्टीके ढेलेकी भाँति कहीं भी फेंक दे, सब उसके लिये बराबर है। यदि ऐसे पुरुषके उद्देश्यसे भी कोई कर्म करनेकी इच्छा हो तो दूसरोंका कल्याण ही करे और अपनी शक्तिके अनुसार शिवभक्तोंको तृप्त करे। उसके धनको शिवभक्त ही ग्रहण करे। यदि