भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* वायवीयसंहिता * ८२७


उसकी संतति शिवभक्त हो तो वह भी समर्पित कर दे। परंतु उसकी पशुसंतति ग्रहण कर सकती है। यदि ऐसा सम्भव (शिवभक्तिहीन संतान) उस धनको ग्रहण न हो तो उसका धन भगवान् शिवको न करे। (अध्याय ३९)

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वायुदेवका अन्तर्धान, ऋषियोंका सरस्वतीमें अवभृथ-स्नान और काशीमें दिव्य तेजका दर्शन करके ब्रह्माजीके पास जाना, ब्रह्माजीका उन्हें सिद्धि-प्राप्तिकी सूचना देकर मेरुके कुमारशिखरपर भेजना

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार क्रोधको जीतनेवाले उपमन्युसे यदुकुलनन्दन श्रीकृष्णने जो ज्ञानयोग प्राप्त किया था, उसका प्रणतभावसे बैठे हुए उन मुनियोंको उपदेश देकर आत्मदर्शी वायुदेव सायंकाल आकाशमें अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर प्रातःकाल नैमिषारण्यके समस्त तपस्वी मुनि सत्रके अन्तमें अवभृथ-स्नान करनेको उद्यत हुए। उस समय ब्रह्माजीके आदेशसे साक्षात् सरस्वतीदेवी स्वादिष्ट जलसे भरी हुई स्वच्छ सुन्दर नदीके रूपमें वहाँ बहने लगीं। सरस्वती नदीको उपस्थित देख मुनि मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सत्र समाप्त करके उसमें अवगाहन (स्नान) आरम्भ किया। उस नदीके मंगलमय जलसे देवता आदिका तर्पण करके पूर्व-वृत्तान्तका स्मरण करते हुए वे सब-के-सब वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये। उस समय हिमालयके चरणोंसे निकलकर दक्षिणकी ओर बहनेवाली भागीरथीका दर्शन करके उन ऋषियोंने उसमें स्नान किया और भागीरथीके ही किनारेका मार्ग पकड़कर वे आगे बढ़े। तदनन्तर वाराणसीमें पहुँचकर उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। वहाँ उत्तरवाहिनी गंगामें स्नान करके उन्होंने अविमुक्तेश्वर-लिंगका दर्शन और विधिपूर्वक पूजन किया। पूजन करके जब वे चलनेको उद्यत हुए तब उन्होंने आकाशमें एक दिव्य और परम अद्भुत प्रकाशमान तेज देखा, जो करोड़ों सूर्योंके समान जान पड़ता था। उसने अपनी प्रभाके प्रसारसे सम्पूर्ण दिगन्तको व्याप्त कर लिया था। तदनन्तर जिन्होंने अपने शरीरमें भस्म लगा रखा था, वे सैकड़ों सिद्ध पाशुपत मुनि निकट जाकर उस तेजमें लीन हो गये। उन तपस्वी महात्माओंके इस प्रकार लीन हो जानेपर वह तेज तत्काल अदृश्य हो गया। वह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई। उस महान् आश्चर्यको देखकर वे नैमिषारण्यके निवासी महर्षि 'यह क्या है' इस बातको न जानते हुए ब्रह्मवनको चले गये।

इनके जानेसे पहले ही लोकपावन पवनदेव वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने नैमिषारण्य-वासी ऋषियोंका जिस प्रकार साक्षात्कार हुआ, जिस तरह उनसे उनकी बातचीत हुई, उन ऋषियोंकी शुद्ध बुद्धि जिस प्रकार पार्षदोंसहित साम्ब सदाशिवमें लगी थी और जिस प्रकार उन यज्ञपरायण ऋषियोंका वह दीर्घकालिक यज्ञ पूरा हुआ था, ये सारी बातें जगत्स्रष्टा ब्रह्मयोनि