शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* वायवीयसंहिता * ७७१
इसके बाद शिवभावको प्राप्त हुए आचार्य शिष्यके मस्तकपर शिवहस्त* रखे और उसे शिवाचार्यकी संज्ञा दे। तदनन्तर उसको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके शिवमण्डलमें महादेवजीकी आराधना करके एक सौ आठ आहुति एवं पूर्णाहुति दे। फिर देवेश्वरकी पूजा एवं भूतलपर साष्टांग प्रणाम करके गुरु मस्तकपर हाथ जोड़ भगवान् शिवसे यह निवेदन करे—
भगवंस्त्वत्प्रसादेन देशिकोऽयं मया कृतः।
अनुगृह्य त्वया देव दिव्याज्ञास्मै प्रदीयताम्॥
‘भगवान्! आपकी कृपासे मैंने इस योग्य शिष्यको आचार्य बना दिया है। देव! अब आप अनुग्रह करके इसे दिव्य आज्ञा प्रदान करें।’ इस प्रकार कहकर गुरु शिष्यके साथ पुनः शिवको प्रणाम करे और दिव्य शिवशास्त्रका शिवकी ही भाँति पूजन करे। इसके बाद शिवकी आज्ञा लेकर आचार्य अपने उस शिष्यको अपने दोनों हाथोंसे शिवसम्बन्धी ज्ञानकी पुस्तक दे। वह उस शिवागम विद्याको मस्तकपर रखकर फिर उसे विद्यासनपर रखे और यथोचित रीतिसे प्रणाम कर उसकी पूजा करे। तदनन्तर गुरु उसे राजोचित चिह्न प्रदान करे; क्योंकि आचार्य-पदवीको प्राप्त हुआ पुरुष राज्य पानेके भी योग्य है।
तत्पश्चात् गुरु उसे पूर्वाचार्योंद्वारा आचरित शिवशास्त्रोक्त आचारका अनुशासन करे, जिससे सब लोकोंमें सम्मान होता है। ‘आचार्य’ पदवीको प्राप्त हुआ पुरुष शिवशास्त्रोक्त लक्षणोंके अनुसार यत्न-पूर्वक शिष्योंकी परीक्षा करके उनका संस्कार करनेके अनन्तर उन्हें शिवज्ञानका उपदेश दे। इस प्रकार वह बिना किसी आयासके शौच, क्षमा, दया, अस्पृहा (कामना-त्याग) तथा अनसूया (ईर्ष्या-त्याग) आदि गुणोंका यत्नपूर्वक अपने भीतर संग्रह करे। इस तरह उस शिष्यको आदेश देकर मण्डलसे शिवका, शिव-कलशोंका तथा अग्नि आदिका विसर्जन करके वह सदस्योंका भी पूजन (दक्षिणा आदिसे सत्कार) करे।
अथवा, अपने गणोंसहित गुरु एक साथ ही सब संस्कार करे। जहाँ दो या तीन संस्कारोंका प्रयोग करना हो, वहाँके लिये विधिका उपदेश किया जाता है—वहाँ आदिमें ही अध्वशुद्धि-प्रकरणमें कहे अनुसार कलशोंकी स्थापना करे। अभिषेकके सिवा समयाचार दीक्षाके सब कर्म करके शिवका पूजन और अध्वशोधन करे। अध्वशुद्धि हो जानेपर फिर महादेवजीकी पूजा करे। इसके बाद हवन और मन्त्र-तर्पण करके दीपन-कर्म करे तथा महेश्वरकी आज्ञा ले शिष्यके हाथमें मन्त्रसमर्पणपूर्वक शेष कार्य पूर्ण करे।
अथवा सम्पूर्ण मन्त्र-संस्कारका क्रमशः अनुचिन्तन करके गुरु अभिषेक-पर्यन्त अध्वशुद्धिका कार्य सम्पन्न
* गुरु पहले अपने दाहिने हाथपर सुगन्ध द्रव्यद्वारा मण्डलका निर्माण करे, तत्पश्चात् वह उसपर विधि-पूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करे। इस प्रकार वह 'शिवहस्त' हो जाता है। 'मैं स्वयं परम शिव हूँ' यह निश्चय करके श्रीगुरुदेव असंदिग्धचित्तसे शिष्यके सिरका स्पर्श करते हैं। उस 'शिवहस्त' के स्पर्शमात्रसे शिष्यका शिवत्व अभिव्यक्त हो जाता है।
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करे। वहाँ शान्त्यतीता आदि कलाओंके लिये जिस विधिका अनुष्ठान किया गया है। वह सारा विधान तीन तत्त्वोंकी शुद्धिके लिये भी कर्तव्य है। शिव-तत्त्व, विद्या-तत्त्व और आत्म-तत्त्व—ये तीन तत्त्व कहे गये हैं। शक्तिमें पहले शिवका, फिर विद्याका और उसके बाद उसकी आत्माका आविर्भाव हुआ है। शिवसे ‘शान्त्यतीताध्वा’ व्याप्त है, उससे ‘शान्तिकलाध्वा’ उससे ‘विद्या-कलाध्वा’ विद्यासे परिशिष्ट ‘प्रतिष्ठा-कलाध्वा’ और उससे ‘निवृत्तिकलाध्वा’ व्याप्त है। शिवशास्त्रके पारंगत मनीषी पुरुष मन्त्रमूलक शाम्भव (शैव)-संस्कारको दुर्लभ मानकर शाक्तसंस्कारका प्रतिपादन करते हैं। श्रीकृष्ण ! इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण यह चतुर्विध संस्कार-कर्मका वर्णन किया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय २०)
अन्तर्याग अथवा मानसिक पूजाविधिका वर्णन
तदनन्तर श्रीकृष्णके पूछनेपर नित्य-नैमित्तिक कर्म तथा न्यासका वर्णन करनेके पश्चात् उपमन्यु बोले—अब मैं पूजाके विधानका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ। इसे शिवशास्त्रमें शिवने शिवाके प्रति कहा है। मनुष्य अग्निहोत्रपर्यन्त अन्तर्यागका अनुष्ठान करके पीछे बहिर्याग (बाह्यपूजन) करे। (उसकी विधि इस प्रकार है—) अन्तर्यागमें पहले पूजाद्रव्योंको मनसे कल्पित और शुद्ध करके गणेशजीका विधिपूर्वक चिन्तन एवं पूजन करे। तत्पश्चात् दक्षिण और उत्तरभागमें क्रमशः नन्दीश्वर और सुयशाकी आराधना करके विद्वान् पुरुष मनसे उत्तम आसनकी कल्पना करे। सिंहासन, योगासन अथवा तीनों तत्त्वोंसे युक्त निर्मल पद्मासनकी भावना करे। उसके ऊपर सर्वमनोहर साम्ब-शिवका ध्यान करे। वे शिव समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त और सम्पूर्ण अवयवोंसे शोभायमान हैं। वे सबसे बढ़कर हैं और समस्त आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके हाथ-पैर लाल हैं। उनका मुसकराता हुआ मुख कुन्द और चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। उनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल है। तीन नेत्र प्रफुल्ल कमलकी भाँति सुन्दर हैं। चार भुजाएँ, उत्तम अंग और मनोहर चन्द्रकलाका मुकुट धारण किये भगवान् हर अपने दो हाथोंमें वरद तथा अभयकी मुद्रा धारण करते हैं और शेष दो हाथोंमें मृगमुद्रा एवं टंक लिये हुए हैं। उनकी कलाईमें सर्पोंकी माला कड़ेका काम देती है। गलेके भीतर मनोहर नील चिह्न शोभित होता है, उनकी कहीं कोई उपमा नहीं है। वे अपने अनुगामी सेवकों तथा आवश्यक उपकरणोंके साथ विराजमान हैं।
इस तरह ध्यान करके उनके वाम-भागमें महेश्वरी शिवाका चिन्तन करे। शिवाकी अंगकान्ति प्रफुल्ल कमलदलके समान परम सुन्दर है। उनके नेत्र बड़े-बड़े हैं। मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित है। मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं। वे नील उत्पलदलके समान कान्तिमती हैं। मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण करती हैं। उनके पीन पयोधर अत्यन्त
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गोल, घनीभूत, ऊँचे और स्निग्ध हैं। शरीरका मध्यभाग कृश है। नितम्बभाग स्थूल है। वे महीन पीले वस्त्र धारण किये हुए हैं। सम्पूर्ण आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। ललाटपर लगे हुए सुन्दर तिलकसे उनका सौन्दर्य और खिल उठा है। विचित्र फूलोंकी मालासे गुम्फित केशपाश उनकी शोभा बढ़ाते हैं। उनकी आकृति सब ओरसे सुन्दर और सुडौल है। मुख लज्जासे कुछ-कुछ झुका है। वे दाहिने हाथमें शोभाशाली सुवर्णमय कमल धारण किये हुए हैं और दूसरे हाथको दण्डकी भाँति सिंहासनपर रखकर उसका सहारा ले उस महान् आसनपर बैठी हुई हैं। शिवादेवी समस्त पाशोंका छेदन करनेवाली साक्षात् सच्चिदानन्दस्वरूपिणी हैं। इस प्रकार महादेव और महादेवीका ध्यान करके शुभ एवं श्रेष्ठ आसनपर सम्पूर्ण उपचारोंसे युक्त भावमय पुष्पोंद्वारा उनका पूजन करे।
अथवा उपर्युक्त वर्णनके अनुसार प्रभु शिवकी एक मूर्ति बनवा ले, उसका नाम शिव या सदाशिव हो। दूसरी मूर्ति शिवाकी होनी चाहिये; उसका नाम माहेश्वरी षड्विंशिका अथवा 'श्रीकण' हो। फिर अपने ही शरीरकी भाँति मूर्तिमें मन्त्रन्यास आदि करके उस मूर्तिमें सत्-असत्से परे मूर्तिमान् परम शिवका ध्यान करे। इसके बाद बाह्य पूजनके ही क्रमसे मनसे पूजा सम्पादित करे। तत्पश्चात् समिधा और घी आदिसे नाभिमें होमकी भावना करे। तदनन्तर भूमध्यमें शुद्ध दीपशिखाके समान आकारवाले ज्योतिर्मय शिवका ध्यान करे। इस प्रकार अपने अंगमें अथवा स्वतन्त्र विग्रहमें शुभ ध्यानयोगके द्वारा अग्निमें होमपर्यन्त सारा पूजन करना चाहिये। यह विधि सर्वत्र ही समान है। इस तरह ध्यानमय आराधनाका सारा क्रम समाप्त करके महादेवजीका शिवलिंगमें, वेदीपर अथवा अग्निमें पूजन करे।
(अध्याय २१—२३)
शिवपूजनकी विधि
उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन ! विशुद्धिके लिये मूलमन्त्रसे गन्ध, चन्दनमिश्रित जलके द्वारा पूजास्थानका प्रोक्षण करना चाहिये। इसके बाद वहाँ फूल बिखेरे। अस्त्र-मन्त्र (फट्)-का उच्चारण करके विघ्नोंको भगाये। फिर कवच-मन्त्र (हुम्)-से पूजास्थानको सब ओरसे अवगुण्ठित करे। अस्त्र-मन्त्रका सम्पूर्ण दिशाओंमें न्यास करके पूजाभूमिकी कल्पना करे। वहाँ सब ओर कुश बिछा दे और प्रोक्षण आदिके द्वारा उस भूमिका प्रक्षालन करे। पूजासम्बन्धी समस्त पात्रोंका शोधन करके द्रव्यशुद्धि करे। प्रोक्षणीपात्र, अर्घ्यपात्र, पाद्यपात्र और आचमनीयपात्र—इन चारोंका प्रक्षालन, प्रोक्षण और वीक्षण करके इनमें शुभ जल डाले और जितने मिल सकें, उन सभी पवित्र द्रव्योंको उनमें डाले। पंचरत्न, चाँदी, सोना, गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि तथा फल, पल्लव और कुश—ये सब अनेक प्रकारके पुण्य द्रव्य हैं। स्नान और पीनेके जलमें विशेषरूपसे सुगन्ध आदि एवं शीतल मनोज्ञ पुष्प आदि
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छोड़े। पाद्यपात्रमें खश और चन्दन छोड़ना चाहिये। आचमनीयपात्रमें विशेषतः जायफल, कंकौल, कपूर, सहिजन और तमालका चूर्ण करके डालना चाहिये। इलायची सभी पात्रोंमें डालनेकी वस्तु है। कपूर, चन्दन, कुशाग्रभाग, अक्षत, जौ, धान, तिल, घी, सरसों, फूल और भस्म—इन सबको अर्घ्यपात्रमें छोड़ना चाहिये। कुश, फूल, जौ, धान, सहिजन, तमाल और भस्म—इन सबका प्रोक्षणीपात्रमें प्रक्षेपण करना चाहिये। सर्वत्र मन्त्र-न्यास करके कवच-मन्त्रसे प्रत्येक पात्रको बाहरसे आवेष्टित करे। तत्पश्चात् अस्त्र-मन्त्रसे उसकी रक्षा करके धेनुमुद्रा दिखाये। पूजाके सभी द्रव्योंका प्रोक्षणीपात्रके जलसे मूलमन्त्रद्वारा प्रोक्षण करके विधिवत् शोधन करे। श्रेष्ठ साधकको चाहिये कि अधिक पात्रोंके न मिलनेपर सब कर्मोंमें एकमात्र प्रोक्षणीपात्रको ही सम्पादित करके रखे और उसीके जलसे सामान्यतः अर्घ्य आदि दे। तत्पश्चात् मण्डपके दक्षिण द्वारभागमें भक्ष्य-भोज्य आदिके क्रमसे विधिपूर्वक विनायकदेवकी पूजा करके अन्तःपुरके स्वामी साक्षात् नन्दीकी भलीभाँति पूजा करे। उनकी अंगकान्ति सुवर्णमय पर्वतके समान है। समस्त आभूषण उसकी शोभा बढ़ाते हैं। मस्तकपर बालचन्द्रका मुकुट सुशोभित होता है। उनकी मूर्ति सौम्य है। वे तीन नेत्र और चार भुजाओंसे युक्त हैं। उनके एक हाथमें चमचमाता हुआ त्रिशूल, दूसरेमें मृगी, तीसरेमें टंक और चौथेमें तीखा बेंत है। उनके मुखकी कान्ति चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल है। मुख वानरके सदृश है।
द्वारके उत्तर पार्श्वमें उनकी पत्नी सुयशा हैं, जो मरुद्गणोंकी कन्या हैं। वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हैं और पार्वतीजीके चरणोंका श्रृंगार करनेमें लगी रहती हैं। उनका पूजन करके परमेश्वर शिवके भवनके भीतर प्रवेश करे और उन द्रव्योंसे शिवलिंगका पूजन करके निर्माल्यको वहाँसे हटा ले। तदनन्तर फूल धोकर शिवलिंगके मस्तकपर उसकी शुद्धिके लिये रखे। फिर हाथमें फूल ले यथाशक्ति मन्त्रका जप करे। इससे मन्त्रकी शुद्धि होती है। ईशानकोणमें चण्डीकी आराधना करके उन्हें पूर्वोक्त निर्माल्य अर्पित करे। तत्पश्चात् इष्टदेवके लिये आसनकी कल्पना करे। क्रमशः आधार आदिका ध्यान करे—कल्याणमयी आधार-शक्ति भूतलपर विराजमान हैं और उनकी अंगकान्ति श्याम है। इस प्रकार उनके स्वरूपका चिन्तन करे। उनके ऊपर फन उठाये सर्पाकार अनन्त बैठे हैं, जिनकी अंगकान्ति उज्ज्वल है। वे पाँच फनोंसे युक्त हैं और आकाशको चाटते हुए-से जान पड़ते हैं। अनन्तके ऊपर भद्रासन है, जिसके चारों पायोंमें सिंहकी आकृति बनी हुई है। वे चारों पाये क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यरूप हैं। धर्म नामवाला पाया आग्नेय-कोणमें है और उसका रंग सफेद है। ज्ञान नामक पाया नैर्ऋत्यकोणमें है और उसका रंग लाल है। वैराग्य वायव्यकोणमें है और उसका रंग पीला है तथा ऐश्वर्य ईशान-कोणमें है और उसका वर्ण श्याम है। अधर्म आदि उस आसनके पूर्वादि भागोंमें क्रमशः स्थित हैं अर्थात् अधर्म पूर्वमें, अज्ञान दक्षिणमें, अवैराग्य पश्चिममें और अनैश्वर्य उत्तरमें हैं। इनके अंग राजावर्त मणिके
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समान हैं—ऐसी भावना करनी चाहिये। इस भद्रासनको ऊपरसे आच्छादित करनेवाला श्वेत निर्मल पद्ममय आसन है। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य—गुण ही उस कमलके आठ दल हैं; वामदेव आदि रुद्र अपनी वामा आदि शक्तियोंके साथ उस कमलके केसर हैं। वे मनोन्मनी आदि अन्तःशक्तियाँ ही बीज हैं, अपर वैराग्य कर्णिका है, शिवस्वरूप ज्ञान नाल है, शिवधर्म कन्द है, कर्णिकाके ऊपर तीन मण्डल (चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल और वह्निमण्डल) हैं और उन मण्डलोंके ऊपर आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व तथा शिवतत्त्वरूप त्रिविध आसन हैं। इन सब आसनोंके ऊपर विचित्र बिछौनोंसे आच्छादित एक सुखद दिव्य आसनकी कल्पना करे, जो शुद्ध विद्यासे अत्यन्त प्रकाशमान हो। आसनके अनन्तर आवाहन, स्थापन, संनिरोधन, निरीक्षण एवं नमस्कार करे। इन सबकी पृथक्-पृथक् मुद्राएँ बाँधकर दिखाये।*
तदनन्तर पाद्य, आचमन, अर्घ्य, (स्नानीय, वस्त्र, यज्ञोपवीत,) गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, (नैवेद्य) और ताम्बूल देकर शिवा और शिवको शयन कराये अथवा उपर्युक्त रूपसे आसन और मूर्तिकी कल्पना करके मूलमन्त्र एवं अन्य ईशानादि ब्रह्ममन्त्रोंद्वारा सकलीकरणकी क्रिया करके देवी पार्वतीसहित परम कारण शिवका आवाहन करे। भगवान् शिवकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल है। वे निश्चल, अविनाशी, समस्त लोकोंके परम कारण, सर्वलोकस्वरूप, सबके बाहर-भीतर विद्यमान, सर्वव्यापी, अणु-से-अणु और महान्से भी महान् हैं। भक्तोंको अनायास ही दर्शन देते हैं। सबके ईश्वर एवं अव्यय हैं। ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु तथा रुद्र आदि देवताओंके लिये भी अगोचर हैं। सम्पूर्ण वेदोंके सारतत्त्व हैं। विद्वानोंके भी दृष्टिथमें नहीं आते हैं। आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं। भवरोगसे ग्रस्त प्राणियोंके लिये औषधरूप हैं। शिवतत्त्वके रूपमें विख्यात हैं और सबका कल्याण करनेके लिये जगत्में सुस्थिर शिवलिंगके रूपमें विद्यमान हैं।
ऐसी भावना करके भक्तिभावसे गन्ध, धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य—इन पाँच उपचारोंद्वारा उत्तम शिवलिंगका पूजन करे। परमात्मा महेश्वर शिवकी लिंगमयी मूर्तिके स्नानकालमें जय-जयकार आदि शब्द और मंगलपाठ करे। पंचगव्य, घी, दूध, दही, मधु और शर्कराके साथ फल-मूलके सारतत्त्वसे, तिल, सरसों, सत्तूके उबटनसे, जौ आदिके उत्तम बीजोंसे, उड़द आदिके चूर्णोंसे तथा आटा आदिसे आलेपन करके गरम जलसे शिवलिंगको नहलाये। लेप
* दोनों हाथोंकी अंजलि बनाकर अनामिका अंगुलिके मूलपर्वपर अँगूठेको लगा देना 'आवाहन' मुद्रा है। इसी आवाहन मुद्राको अधोमुख कर दिया जाय तो वह 'स्थापन' मुद्रा हो जाती है। यदि मुट्ठीके भीतर अँगूठेको डाल दिया जाय और दोनों हाथोंकी मुट्ठी संयुक्त कर दी जाय तो वह 'संनिरोधन' मुद्रा कही गयी है। दोनों मुट्ठियोंको उत्तान कर देनेपर 'सम्मुखीकरण' नामक मुद्रा होती है। इसीको यहाँ 'निरीक्षण' नामसे कहा गया है। शरीरको दण्डकी भाँति देवताके सामने डाल देना, मुखको नीचेकी ओर रखना और दोनों हाथोंको देवताकी ओर फैला देना—साष्टांग प्रणामकी इस क्रियाको ही यहाँ 'नमस्कार' मुद्रा कहा गया है।
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और गन्धके निवारणके लिये बिल्वपत्र आदिसे रगड़े। फिर जलसे नहलाकर चक्रवर्ती सम्राट्के लिये उपयोगी उपचारोंसे (अर्थात् सुगन्धित तेल-फुलेल आदिके द्वारा) सेवा करे। सुगन्धयुक्त आँवला और हल्दी भी क्रमशः अर्पित करे। इन सब वस्तुओंसे शिवलिंग अथवा शिवमूर्तिका भलीभाँति शोधन करके चन्दनमिश्रित जल, कुश-पुष्पयुक्त जल, सुवर्ण एवं रत्नयुक्त जल तथा मन्त्रसिद्ध जलसे क्रमशः स्नान कराये। इन सब द्रव्योंका मिलना सम्भव न होनेपर यथासम्भव संगृहीत वस्तुओंसे युक्त जलद्वारा अथवा केवल मन्त्राभिमन्त्रित जलद्वारा श्रद्धापूर्वक शिवको स्नान कराये। कलश, शंख और वर्धनीसे तथा कुश और पुष्पसे युक्त हाथके जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक इष्टदेवताको नहलाना चाहिये। पवमानसूक्त, रुद्रसूक्त, नीलरुद्रसूक्त, त्वरितमन्त्र, लिंगसूक्त, आदिसूक्त, अथर्वशीर्ष, ऋग्वेद, सामवेद तथा शिवसम्बन्धी ईशानादि पंच-ब्रह्ममन्त्र, शिवमन्त्र तथा प्रणवसे देवदेवेश्वर शिवको स्नान कराये।
जैसे महादेवजीको स्नान कराये, उसी तरह महादेवी पार्वतीको भी स्नान आदि कराना चाहिये। उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है; क्योंकि वे दोनों सर्वथा समान हैं। पहले महादेवजीके उद्देश्यसे स्नान आदि क्रिया करके फिर देवीके लिये उन्हीं देवाधिदेवके आदेशसे सब कुछ करे। अर्धनारीश्वरकी पूजा करनी हो तो उसमें पूर्वापरका विचार नहीं है। अतः उसमें महादेव और महादेवीकी साथ-साथ पूजा होती रहती है। शिवलिंगमें या अन्यत्र मूर्ति आदिमें अर्द्धनारीश्वरकी भावनासे सभी उपचारोंका शिव और शिवाके लिये एक साथ ही उपयोग होता है। पवित्र सुगन्धित जलसे शिवलिंगका अभिषेक करके उसे वस्त्रसे पोंछे। फिर नूतन वस्त्र एवं यज्ञोपवीत चढ़ावे। तत्पश्चात् पाद्य, आचमन, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, आभूषण, धूप, दीप, नैवेद्य, पीनेयोग्य जल, मुखशुद्धि, पुनराचमन, मुखवास तथा सम्पूर्ण रत्नोंसे जटित सुन्दर मुकुट, आभूषण, नाना प्रकारकी पवित्र पुष्पमालाएँ, छत्र, चँवर, व्यजन, ताड़का पंखा और दर्पण देकर सब प्रकारकी मंगलमयी वाद्यध्वनियोंके साथ इष्टदेवकी नीराजना करे (आरती उतारे)। उस समय गीत और नृत्य आदिके साथ जय-जयकार भी होनी चाहिये। सोना, चाँदी, ताँबा अथवा मिट्टीके सुन्दर पात्रमें कमल आदिके शोभायमान फूल रखे। कमलके बीज तथा दही, अक्षत आदि भी डाल दे। त्रिशूल, शंख, दो कमल, नन्द्यावर्त नामक शंखविशेष, सूखे गोबरकी आग, श्रीवत्स, स्वस्तिक, दर्पण, वज्र तथा अग्नि आदिसे चिह्नित पात्रमें आठ दीपक रखे। वे आठों आठ दिशाओंमें रहें और एक नवाँ दीपक मध्यभागमें रहे। इन नवों दीपकोंमें वामा आदि नव शक्तियोंका पूजन करे। फिर कवचमन्त्रसे आच्छादन और अस्त्रमन्त्रद्वारा सब ओरसे संरक्षण करके धेनुमुद्रा दिखाकर दोनों हाथोंसे पात्रको ऊपर उठाये अथवा पात्रमें क्रमशः पाँच दीप रखे। चारको चारों कोनोंमें और एकको बीचमें स्थापित करे। तत्पश्चात् उस पात्रको उठाकर शिवलिंग या शिवमूर्त्ति आदिके ऊपर क्रमशः तीन बार प्रदक्षिण क्रमसे घुमाये और मूलमन्त्रका
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उच्चारण करता रहे। तदनन्तर मस्तकपर अर्घ्य और सुगन्धित भस्म चढ़ाये। फिर पुष्पांजलि देकर उपहार निवेदन करे। इसके बाद जल देकर आचमन कराये। फिर सुगन्धित द्रव्योंसे युक्त पाँच ताम्बूल भेंट करे। तत्पश्चात् प्रोक्षणीय पदार्थोंका प्रोक्षण करके नृत्य और गीतका आयोजन करे। लिंग या मूर्ति आदिमें शिव तथा पार्वतीका चिन्तन करते हुए यथाशक्ति शिव-मन्त्रका जप करे। जपके पश्चात् प्रदक्षिणा, नमस्कार, स्तुतिपाठ, आत्मसमर्पण तथा कार्यका विनयपूर्वक विज्ञापन करे। फिर अर्घ्य और पुष्पांजलि दे विधिवत् मुद्रा बाँधकर इष्ट-देवसे त्रुटियोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करे। तत्पश्चात् मूर्तिसहित देवताका विसर्जन करके अपने हृदयमें उसका चिन्तन करे। पाद्यसे लेकर मुखवासपर्यन्त पूजन करना चाहिये अथवा अर्घ्य आदिसे पूजन आरम्भ करना चाहिये या अधिक संकटकी स्थितिमें प्रेमपूर्वक केवल फूलमात्र चढ़ा देना चाहिये। प्रेमपूर्वक फूलमात्र चढ़ा देनेसे ही परम धर्मका सम्पादन हो जाता है। जबतक प्राण रहे शिवका पूजन किये बिना भोजन न करे। (अध्याय २४)
शिवपूजाकी विशेष विधि तथा शिव-भक्तिकी महिमा
उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! दीपदानके बाद और नैवेद्य-निवेदनसे पहले आवरण-पूजा करनी चाहिये अथवा आरतीका समय आनेपर आवरणपूजा करे। वहाँ शिव या शिवाके प्रथम आवरणमें ईशानसे लेकर ‘सद्योजातपर्यन्त’ तथा हृदयसे लेकर अस्त्रपर्यन्तका पूजन करे।* ईशानमें, पूर्वभागमें, दक्षिणमें, उत्तरमें, पश्चिममें, आग्नेयकोणमें, ईशानकोणमें, नैर्ऋत्यकोणमें, वायव्यकोणमें, फिर ईशानकोणमें तत्पश्चात् चारों दिशाओंमें गर्भावरण अथवा मन्त्र-संघातकी पूजा बतायी गयी है या हृदयसे लेकर अस्त्रपर्यन्त अंगोंकी पूजा करे। इनके बाह्यभागमें पूर्वदिशामें इन्द्रका, दक्षिणदिशामें यमका, पश्चिम दिशामें वरुणका, उत्तरदिशामें कुबेरका, ईशानकोणमें ईशानका, अग्निकोणमें अग्निका, नैर्ऋत्यकोणमें निर्ऋतिका, वायव्यकोणमें वायुका, नैर्ऋत्य और पश्चिमके बीचमें अनन्त या विष्णुका तथा ईशान और पूर्वके बीचमें ब्रह्माका पूजन करे। कमलके बाह्यभागमें वज्रसे लेकर कमलपर्यन्त लोकेश्वरोंके सुप्रसिद्ध आयुधों-का पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः पूजन करे। यह ध्यान करना चाहिये कि समस्त आवरणदेवता सुखपूर्वक बैठकर महादेव और महादेवीकी ओर दोनों हाथ जोड़े देख रहे हैं। फिर सभी आवरण देवताओंको प्रणाम करके ‘नमः’ पदयुक्त अपने-अपने नामसे
* अर्थात्—
ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात—इन पाँच मूर्तियोंका तथा हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र—इन अंगोंका पूजन करना चाहिये।
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* संक्षिप्त शिवपुराण *
पुष्पोपचारसमर्पणपूर्वक उनका क्रमशः पूजन करे। (यथा इन्द्राय नमः पुष्पं समर्पयामि इत्यादि।) इसी तरह गर्भावरणका भी अपने आवरण-सम्बन्धी मन्त्रसे यजन करे। योग, ध्यान, होम, जप, बाह्य अथवा आभ्यन्तरमें भी देवताका पूजन करना चाहिये। इसी तरह उनके लिये छः प्रकारकी हवि भी देनी चाहिये—किसी एक शुद्ध अन्नका बना हुआ, मूँगमिश्रित अन्न या मूँगकी खिचड़ी, खीर, दधिमिश्रित अन्न, गुड़़का बना हुआ पकवान तथा मधुसे तर किया हुआ भोज्य पदार्थ। इनमेंसे एक या अनेक हविष्यको नाना प्रकारके व्यंजनोंसे संयुक्त तथा गुड़ और खाँड़से सम्पन्न करके नैवेद्यके रूपमें अर्पित करना चाहिये। साथ ही मक्खन और उत्तम दही परोसना चाहिये। पूआ आदि अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थ और स्वादिष्ट फल देने चाहिये। लाल चन्दन और पुष्पवासित अत्यन्त शीतल जल अर्पित करना चाहिये। मुख-शुद्धिके लिये मधुर इलायचीके रससे युक्त सुपारीके टुकड़े, खैर आदिसे युक्त सुनहरे रंगके पीले पानके पत्तोंके बने हुए बीड़े, शिलाजीतका चूर्ण, सफेद चूना, जो अधिक रूखा या दूषित न हो, कपूर, कंकौल, नूतन एवं सुन्दर जायफल आदि अर्पित करने चाहिये। आलेपनके लिये चन्दनका मूलकाष्ठ अथवा उसका चूरा, कस्तूरी, कुंकुम, मृगमदात्मक रस होने चाहिये। फूल वे ही चढ़ाने चाहिये, जो सुगन्धित, पवित्र और सुन्दर हों। गन्धरहित, उत्कट गन्धवाले, दूषित, बासी तथा स्वयं ही टूटकर गिरे हुए फूल शिवके पूजनमें नहीं देने चाहिये। कोमल वस्त्र ही चढ़ाने चाहिये। भूषणोंमें विशेषतः वे ही अर्पित करने चाहिये, जो सोनेके बने हुए तथा विद्युन्मण्डलके समान चमकीले हों, ये सब वस्तुएँ कपूर, गुग्गुल, अगुरु और चन्दनसे भूषित तथा पुष्पसमूहोंसे सुवासित होनी चाहिये। चन्दन, अगुरु, कपूर, सुगन्धित काष्ठ तथा गुग्गुलके चूर्ण, घी और मधुसे बना हुआ धूप उत्तम माना गया है।
कपिला गायके अत्यन्त सुगन्धित घीसे प्रतिदिन जलाये गये कर्पूरयुक्त दीप श्रेष्ठ माने गये हैं। पंचगव्य, मीठा और कपिला गायका दूध, दही एवं घी—ये सब भगवान् शंकरके स्नान और पानके लिये अभीष्ट हैं। हाथीके दाँतके बने हुए भद्रासन, जो सुवर्ण एवं रत्नोंसे जटित हैं, शिवके लिये श्रेष्ठ बताये गये हैं। उन आसनोंपर विचित्र बिछावन, कोमल गद्दे और तकिये होने चाहिये। इनके सिवा और भी बहुत-सी छोटी-बड़ी सुन्दर एवं सुखद शय्याएँ होनी चाहिये। समुद्रगामिनी नदी एवं नदसे लाया तथा कपड़ेसे छानकर रखा हुआ शीतल जल भगवान् शंकरके स्नान और पानके लिये श्रेष्ठ कहा गया है। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल छत्र, जो मोतियोंकी लड़ियोंसे सुशोभित, नवरत्नजटित, दिव्य एवं सुवर्णमय दण्डसे मनोहर हो, भगवान् शिवकी सेवामें अर्पित करनेयोग्य हैं। सुवर्णभूषित दो श्वेत चँवर, जो रत्नमय दण्डोंसे शोभायमान तथा दो राजहंसोंके समान आकारवाले हों, शिवकी सेवामें देनेयोग्य हैं। सुन्दर एवं स्निग्ध दर्पण, जो दिव्य गन्धसे अनुलिप्त, सब ओरसे रत्नोंद्वारा आच्छादित तथा सुन्दर हारोंसे विभूषित हो, भगवान् शंकरको अर्पित करना चाहिये। उनके पूजनमें हंस, कुन्द एवं चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा गम्भीर ध्वनि
* वायवीयसंहिता * ७७९
करनेवाले शंखका उपयोग करना चाहिये, जिसके मुख और पृष्ठ आदि भागोंमें रत्न एवं सुवर्ण जड़े गये हों। शंखके सिवा नाना प्रकारकी ध्वनि करनेवाले सुन्दर काहल (वाद्यविशेष), जो सुवर्णनिर्मित तथा मोतियोंसे अलंकृत हों, बजाने चाहिये। इनके अतिरिक्त भेरी, मृदंग, मुरज, तिमिच्छ और पटह आदि बाजे भी, जो समुद्रकी गर्जनाके समान ध्वनि करनेवाले हों, यत्न-पूर्वक जुटाकर रखने चाहिये। पूजाके सभी पात्र और भाण्ड भी सुवर्णके ही बनवाये। परमात्मा महेश्वर शिवका मन्दिर राजमहलके समान बनवाना चाहिये, जो शिल्पशास्त्रमें बताये हुए लक्षणोंसे युक्त हो। वह ऊँची चहारदीवारीसे घिरा हो। उसका गोपुर इतना ऊँचा हो कि पर्वताकार दिखायी दे। वह अनेक प्रकारके रत्नोंसे आच्छादित हो। उसके दरवाजेके फाटक सोनेके बने हुए हों। उस मन्दिरके मण्डपमें तपाये हुए सोने तथा रत्नोंके सैकड़ों खम्भे लगे हों। चाँदवेमें मोतियोंकी लड़ियाँ लगी हुई हों। दरवाजेके फाटकमें मूँगे जड़े गये हों। मन्दिरका शिखर सोनेके बने हुए दिव्य कलशाकार मुकुटोंसे अलंकृत एवं अस्त्रराज त्रिशूलसे चिह्नित हो।
न्यायोपार्जित द्रव्योंसे भक्तिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। यदि कोई अन्यायोपार्जित द्रव्यसे भी भक्तिपूर्वक शिवजीकी पूजा करता है तो उसे भी कोई पाप नहीं लगता; क्योंकि भगवान् भावके वशीभूत हैं। न्यायोपार्जित धनसे भी यदि कोई बिना भक्तिके पूजन करता है तो उसे उसका फल नहीं मिलता; क्योंकि पूजाकी सफलतामें भक्ति ही कारण है। भक्तिसे अपने वैभवके अनुसार भगवान् शिवके उद्देश्यसे जो कुछ किया जाय वह थोड़ा हो या बहुत, करनेवाला धनी हो या दरिद्र, दोनोंका समान फल है। जिसके पास बहुत थोड़ा धन है, वह मानव भी भक्तिभावसे प्रेरित होकर भगवान् शिवका पूजन कर सकता है, किंतु महान् वैभवशाली भी यदि भक्तिहीन है तो उसे शिवका पूजन नहीं करना चाहिये। शिवके प्रति भक्तिहीन पुरुष यदि अपना सर्वस्व भी दे डाले तो उससे वह शिवाराधनाके फलका भागी नहीं होता; क्योंकि आराधनामें भक्ति ही कारण है।* शिवके प्रति भक्तिको छोड़कर कोई अत्यन्त उग्र तपस्याओं और सम्पूर्ण महा-यज्ञोंसे भी दिव्य शिवधाममें नहीं जा सकता। अतः श्रीकृष्ण! सर्वत्र परमेश्वर शिवके आराधनमें भक्तिका ही महत्त्व है। यह गुह्यसे भी गुह्यतर बात है। इसमें संदेह नहीं है।
पापके महासागरको पार करनेके लिये भगवान् शिवकी भक्ति नौकाके समान है। इसलिये जो भक्तिभावसे युक्त है, उसे रजोगुण और तमोगुणसे क्या हानि हो
* भक्त्या प्रचोदितः कुर्यादल्पवित्तोऽपि मानवः। महाविभवसारोऽपि न कुर्याद् भक्तिवर्जितः॥
सर्वस्वमपि यो दद्याच्छिवे भक्तिविवर्जितः। न तेन फलभाक् स स्याद् भक्तिरेवात्र कारणम्॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २५। ५१-५२)
७८० * संक्षिप्त शिवपुराण *
सकती है? श्रीकृष्ण! अन्त्यज, अधम, मूर्ख अथवा पतित मनुष्य भी यदि भगवान् शिवकी शरणमें चला जाय तो वह समस्त देवताओं एवं असुरोंके लिये भी पूजनीय हो जाता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके भक्तिभावसे ही शिवकी पूजा करे; क्योंकि अभक्तोंको कहीं भी फल नहीं मिलता। (अध्याय २५)
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पञ्चाक्षर-मन्त्रके जप तथा भगवान् शिवके भजन-पूजनकी महिमा, अग्निकार्यके लिये कुण्ड और वेदी आदिके संस्कार, शिवाग्निकी स्थापना और उसके संस्कार, होम, पूर्णाहुति, भस्मके संग्रह एवं रक्षणकी विधि तथा हवनान्तमें किये जानेवाले कृत्यका वर्णन
उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! कोई बड़ा भारी पाप करके भी भक्तिभावसे पञ्चाक्षर-मन्त्रद्वारा यदि देवेश्वर शिवका पूजन करे तो वह उस पापसे मुक्त हो जाता है। जो भक्तिभावसे पञ्चाक्षर-मन्त्रद्वारा एक ही बार शिवका पूजन कर लेता है, वह भी शिवमन्त्रके गौरववश शिवधामको चला जाता है। जो मूढ़ दुर्लभ मानव-जन्म पाकर भगवान् शिवकी अर्चना नहीं करता, उसका वह जन्म निष्फल है; क्योंकि वह मोक्षका साधक नहीं होता। जो दुर्लभ मानव-जन्म पाकर पिनाकपाणि महादेवजीकी आराधना करते हैं, उन्हींका जन्म सफल है और वे ही कृतार्थ एवं श्रेष्ठ मनुष्य हैं। जो भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, जिनका चित्त भगवान् शिवके सामने प्रणत होता है तथा जो सदा ही भगवान् शिवके चिन्तनमें लगे रहते हैं, वे कभी दुःखके भागी नहीं होते।* मनोहर भवन, हाव, भाव, विलाससे विभूषित तरुणी स्त्रियाँ और जिससे पूर्ण तृप्ति हो जाय, इतना धन—ये सब भगवान् शिवकी आराधनाके फल हैं। जो देवलोकमें महान् भोग और राज्य चाहते हैं, वे सदा भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं। सौभाग्य, कान्तिमान् रूप, बल, त्याग, दयाभाव, शूरता और विश्वमें विख्याति—ये सब बातें भगवान् शिवकी पूजा करनेवाले लोगोंको ही सुलभ होती हैं। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, उसे सब कुछ छोड़कर केवल भगवान् शिवमें मन लगा उनकी आराधना करनी चाहिये। जीवन बड़ी तेजीसे जा रहा है, जवानी शीघ्रतासे बीती जा रही है और रोग तीव्रगतिसे निकट आ रहा है, इसलिये सबको पिनाकपाणि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये, जबतक मृत्यु नहीं आती है,
* दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं येऽर्चयन्ति पिनाकिनम्॥
तेषां हि सफलं जन्म कृतार्थास्ते नरोत्तमाः। भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः॥
भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दुःखस्य भागिनः॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २६। १५–१७)
* वायवीयसंहिता * ७८१
जबतक वृद्धावस्थाका आक्रमण नहीं होता और जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं हो जाती है, तबतक ही भगवान् शंकरकी आराधना कर लो। भगवान् शिवकी आराधनाके समान दूसरा कोई धर्म तीनों लोकोंमें नहीं है।*
अब मैं अग्निकार्यका वर्णन करूँगा। कुण्डमें, स्थण्डिलपर, वेदीमें, लोहेके हवनपात्रमें या नूतन सुन्दर मिट्टीके पात्रमें विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके उसका संस्कार करे। तत्पश्चात् वहाँ महादेवजीकी आराधना करके होमकर्म आरम्भ करे। कुण्ड दो या एक हाथ लंबा-चौड़ा होना चाहिये। वेदीको गोल या चौकोर बनाना चाहिये। साथ ही मण्डल भी बनाना आवश्यक है। कुण्ड विस्तृत और गहरा होना चाहिये। उसके मध्यभागमें अष्टदल-कमल अंकित करे। वह दो या चार अंगुल ऊँचा हो। कुण्डके भीतर दो बित्तेकी ऊँचाईपर नाभिकी स्थिति बतायी गयी है। मध्यमा अंगुलिके मध्यम और उत्तम पर्वोंके बराबर मध्यभाग या कटिभाग जानना चाहिये। साधु पुरुष चौबीस अंगुलके बराबर एक हाथका परिमाण बताते हैं। कुण्डकी तीन, दो या एक मेखला होनी चाहिये। इन मेखलाओंका इस तरह निर्माण करे, जिससे कुण्डकी शोभा बढ़े। सुन्दर और चिकनी योनि बनाये, जिसकी आकृति पीपलके पत्तेकी भाँति अथवा हाथीके अधरोष्ठके समान हो; कुण्डके दक्षिण या पश्चिम भागमें मेखलाके बीचोबीच सुन्दर योनिका निर्माण करना चाहिये, जो मेखलासे कुछ नीची हो। उसका अग्रभाग कुण्डकी ओर हो तथा वह मेखलाको कुछ छोड़कर बनायी गयी हो। वेदीके लिये ऊँचाईका कोई नियम नहीं है। वह मिट्टी या बालूकी होनी चाहिये। गायके गोबर या जलसे मण्डल बनाना चाहिये। पात्रका परिमाण नहीं बताया गया है। कुण्ड और मिट्टीकी वेदीको गोबर और जलसे लीपना चाहिये। पात्रको धोकर तपाये तथा अन्य वस्तुओंका जलसे प्रोक्षण करे। अपने-अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार कुण्डमें और वेदीपर उल्लेखन (रेखा) करे। (रेखाओंपरसे मृत्तिका लेकर ईशानकोणमें फेंक दे।) फिर अग्निके उस आसनका कुशों अथवा पुष्पोंद्वारा जलसे प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् पूजन और हवनके लिये सब प्रकारके द्रव्योंका संग्रह करे। धोनेयोग्य वस्तुओंको धोकर प्रोक्षणीके जलसे उनका प्रोक्षण करके उन्हें शुद्ध करे। इसके बाद सूर्यकान्तमणिसे प्रकट, काष्ठसे उत्पन्न, श्रोत्रियकी अग्निशालामें संचित अथवा दूसरी किसी उत्तम अग्निको आधार-सहित ले आये। उसे कुण्ड अथवा वेदीके ऊपर तीन बार प्रदक्षिणक्रमसे घुमाकर अग्निबीज (रं)-का उच्चारण करके उस अग्निको उक्त कुण्ड या वेदीके आसनपर
* त्वरितं जीवितं याति त्वरितं याति यौवनम्॥
त्वरितं व्याधिरभ्येति तस्मात्पूज्यः पिनाकधृक्। यावन्नायाति मरणं यावन्नाक्रमते जरा॥
यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावत्पूजय शंकरम्। न शिवार्चनतुल्योऽस्ति धर्मोऽन्यो भुवनत्रये॥
(शि० पु० वा० सं० उ० खं० २६। २१—२३)
७८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
स्थापित कर दे। कुण्डमें स्थापित करना हो तो योनिमार्गसे अग्निका आधान करे और वेदीपर अपने सामनेकी ओर अग्निकी स्थापना करे। योनिप्रदेशके पास स्थित विद्वान् पुरुष समस्त कुण्डको अग्निसे संयुक्त करे। साथ ही यह भावना करे कि अपनी नाभिके भीतर जो अग्निदेव विराजमान हैं, वे ही नाभिरन्ध्रसे चिनगारीके रूपमें निकलकर बाह्य अग्निमें मण्डलाकार होकर लीन हुए हैं। अग्निपर समिधा रखनेसे लेकर घीके संस्कारपर्यन्त सारा कार्य मन्त्रज्ञ पुरुष अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे मूलमन्त्रद्वारा सम्पन्न करे। तदनन्तर शिवमूर्तिकी पूजा करके दक्षिण पार्श्वमें मन्त्र-न्यास करे और घृतमें धेनुमुद्राका प्रदर्शन करे। स्रुक् और स्रुवा—ये दोनों धातुके बने हुए हों तो ग्रहण करनेयोग्य हैं। परंतु काँसी, लोहे और शीशेके बने हुए स्रुक्, स्रुवाको नहीं ग्रहण करना चाहिये अथवा यज्ञसम्बन्धी काष्ठके बने हुए स्रुक्, स्रुवा ग्राह्य हैं। स्मृति या शिवशास्त्रमें जो विहित हों, वे भी ग्राह्य हैं अथवा ब्रह्मवृक्ष (पलास या गूलर) आदिके छिद्ररहित बिचले दो पत्ते लेकर उन्हें कुशसे पोंछे और अग्निमें तपाकर फिर उनका प्रोक्षण करे। उन्हीं पत्तोंको स्रुक् और स्रुवाका रूप दे उनमें घी उठाये और अपने गृह्यसूत्रमें बताये हुए क्रमसे शिवबीज (ॐ)-सहित आठ बीजाक्षरोंद्वारा अग्निमें आहुति दे। इससे अग्निका संस्कार सम्पन्न होता है। वे बीज इस प्रकार हैं—श्रुं स्तुं बुं श्रूं पुं डुं हूं। ये सात हैं, इनमें शिवबीज (ॐ)-को सम्मिलित कर लेनेपर आठ बीजाक्षर होते हैं। उपर्युक्त सात बीज क्रमशः अग्निकी सात जिह्वाओंके हैं। उनकी मध्यमा जिह्वाका नाम बहुरूपा है। उसकी तीन शिखाएँ हैं। उनमेंसे एक शिखा दक्षिणमें और दूसरी वाम दिशा (उत्तर)-में प्रज्वलित होती है और बीचवाली शिखा बीचमें ही प्रकाशित होती है। ईशानकोणमें जो जिह्वा है, उसका नाम हिरण्या है। पूर्वदिशामें विद्यमान जिह्वा कनका नामसे प्रसिद्ध है। अग्निकोणमें रक्ता, नैर्ऋत्यकोणमें कृष्णा और वायव्यकोणमें सुप्रभा नामकी जिह्वा प्रकाशित होती है। इनके अतिरिक्त पश्चिममें जो जिह्वा प्रज्वलित होती है, उसका नाम मरुत् है। इन सबकी प्रभा अपने-अपने नामके अनुरूप है। अपने-अपने बीजके अनन्तर क्रमशः इनका नाम लेना चाहिये और नामके अन्तमें स्वाहाका प्रयोग करना चाहिये। इस तरह जो जिह्वामन्त्र* बनते हैं, उनके द्वारा क्रमशः प्रत्येक जिह्वाके लिये एक-एक घीकी आहुति दे, परंतु मध्यमाकी तीन जिह्वाओंके लिये तीन आहुतियाँ दे। कुण्डके मध्यभागमें 'रं वह्नये स्वाहा' बोलकर तीन आहुतियाँ दे। ये आहुतियाँ घी अथवा समिधासे देनी चाहिये। आहुति देनेके पश्चात् अग्निमें जलका सेचन करे। ऐसा करनेपर वह अग्नि भगवान् शिवकी हो जाती है। फिर उसमें शिवके आसनका चिन्तन करे और वहाँ अर्धनारीश्वर भगवान् शिवका
* ओं श्रुं त्रिशिखायै बहुरूपायै स्वाहा (दक्षिणे मध्ये उत्तरे च) ३। ओं स्तुं हिरण्यायै स्वाहा (ऐशान्यै) १। ओं बुं कनकायै स्वाहा (पूर्वस्याम्) १। ओं श्रूं रक्तायै स्वाहा (आग्नेय्याम्) १। ओं पुं कृष्णायै स्वाहा (नैर्ऋत्याम्) १। ओं डुं सुप्रभायै स्वाहा (पश्चिमायाम्) १। ओं हूं मरुज्जिह्वायै स्वाहा (वायव्ये) १।
- वायवीयसंहिता * ७८३
आवाहन करके पूजन करे। पाद्य-अर्घ्य आदिसे लेकर दीपदानपर्यन्त पूजन करके अग्निका जलसे प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् समिधाओंकी आहुति दे। वे समिधाएँ पलासकी या गूलर आदि दूसरे यज्ञिय वृक्षकी होनी चाहिये। उनकी लंबाई बारह अंगुलकी हो। समिधाएँ टेढ़ी न हों। स्वतः सूखी हुई भी न हों। उनके छिलके न उतरे हों तथा उनपर किसी प्रकारकी चोट न हो। सब समिधाएँ एक-सी होनी चाहिये। दस अंगुल लंबी समिधाएँ भी हवनके लिये विहित हैं। उनकी मोटाई कनिष्ठिका अंगुलिके समान होनी चाहिये अथवा प्रादेशमात्र (अँगूठेसे लेकर तर्जनीपर्यन्त) लंबी समिधाएँ उपयोगमें लानी चाहिये। यदि उपयुक्त समिधाएँ न मिलें तो जो मिल सकें, उन सबका ही हवन करना चाहिये। समिधा-हवनके बाद घीकी आहुति दे। घीकी धारा दूर्वादलके समान पतली और चार अंगुल लंबी हो। उसके बाद अन्नकी आहुति देनी चाहिये, जिसका प्रत्येक ग्रास सोलह-सोलह माशेके बराबर हो। लावा, सरसों, जौ और तिल—इन सबमें घी मिलाकर यथासम्भव भक्ष्य, लेह्य और चोष्यका भी मिश्रण करे तथा इन सबकी यथाशक्ति दस, पाँच या तीन आहुतियाँ दे अथवा एक ही आहुति दे। स्रुवासे, समिधासे, स्रुक्से अथवा हाथसे आहुति देनी चाहिये। उसमें भी दिव्य तीर्थसे अथवा ऋषितीर्थसे आहुति देनेका विधान है; यदि उपर्युक्त सभी द्रव्य न मिलें तो किसी एक ही द्रव्यसे श्रद्धापूर्वक आहुति देनी चाहिये। प्रायश्चित्तके लिये मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके तीन आहुतियाँ दे। फिर होमावशिष्ट घृतसे स्रुक्को भरकर उसके अग्रभागमें फूल रखकर उसे दर्भसहित अधोमुख स्रुवासे ढक दे। इसके बाद खड़ा हो उसे अंजलिमें लेकर 'ओं नमः शिवाय वौषट्' का उच्चारण करके जौके तुल्य घीकी धाराकी आहुति दे। इस प्रकार पूर्णाहुति करके अग्निमें पूर्ववत् जलका छींटा दे। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवका विसर्जन करके अग्निकी रक्षा करे। फिर अग्निका भी विसर्जन करके भावनाद्वारा नाभिमें स्थापित करके नित्य यजन करे।
अथवा शिवशास्त्रमें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार वागीश्वरीके गर्भसे प्रकट हुए अग्निदेवको लाकर विधिवत् संस्कार करके उनका पूजन करे। फिर समिधाका आधान करके सब ओरसे परिधियोंका निर्माण करे। इसके बाद वहाँ दो-दो पात्र रखकर शिवका यजन करके प्रोक्षणीपात्रका शोधन करे। उस पात्रके जलसे पूर्वोक्त वस्तुओंका प्रोक्षण करके जलसे भरे हुए प्रणीतापात्रको ईशानकोणमें रखे। घीके संस्कारतकका सारा कार्य करके स्रुक् और स्रुवाका संशोधन करे। तदनन्तर पिता शिवद्वारा माता वागीश्वरीका गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन-संस्कार करके प्रत्येक संस्कारके निमित्त पृथक्-पृथक् आहुति दे और गर्भसे अग्निके उत्पन्न होनेकी भावना करे। उनके तीन पैर, सात हाथ, चार सींग और दो मस्तक हैं। मधुके समान पिंगल-वर्णवाले तीन नेत्र हैं। सिरपर जटाजूट और चन्द्रमाका मुकुट है। उनकी अंगकान्ति लाल है। लाल रंगके ही वस्त्र, चन्दन, माला और आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। सब लक्षणोंसे सम्पन्न, यज्ञोपवीतधारी तथा त्रिगुण मेखलासे युक्त हैं। उनके दायें हाथोंमें
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शक्ति है, स्रुक् और स्रुवा है तथा बायें हाथोंमें तोमर, ताड़का पंखा और घीसे भरा हुआ पात्र है। इस आकृतिमें उत्पन्न हुए अग्निदेवका ध्यान करके उनका 'जातकर्म'-संस्कार करे। तत्पश्चात् नालच्छेदन करके सूतककी शुद्धि करे। फिर आहुति देकर उस शिवसम्बन्धी अग्निका रुचि नाम रखे। इसके बाद माता-पिताका विसर्जन करके चूड़ाकर्म और उपनयन आदिसे लेकर आप्तोर्यामपर्यन्त संस्कार करे।* तत्पश्चात् घृतधारा आदिका होम करके स्विष्टकृत् होम करे। इसके बाद 'रं' बीजका उच्चारण करके अग्निपर जलका छींटा डाले। फिर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईश, लोकेश्वरगण और उनके अस्त्रोंका सब ओर क्रमशः पूजन करके धूप, दीप आदिकी सिद्धिके लिये अग्निको अलग निकालकर कर्मविधिका ज्ञाता पुरुष पुनः घृतयुक्त पूर्वोक्त होम-द्रव्य तैयार करके अग्निमें आसनकी कल्पना (भावना) करे और उसपर पूर्ववत् महादेव और महादेवीका आवाहन, पूजन करके पूर्णाहुतिपर्यन्त सब कार्य सम्पन्न करे।
अथवा अपने आश्रमके लिये शास्त्र-विहित अग्निहोत्रकर्म करके उसे भगवान् शिवको समर्पित करे। शिवाश्रमी पुरुष इन सब बातोंको समझकर होमकर्म करे। इसके लिये दूसरी कोई विधि नहीं है। शिवाग्निका भस्म संग्रहणीय है। अग्निहोत्रकर्मका भस्म भी संग्रह करनेके योग्य है। वैवाहिक अग्निका भस्म भी जो परिपक्व, पवित्र एवं सुगन्धित हो, संग्रह करके रखना चाहिये। कपिला गायका वह गोबर, जो गिरते समय आकाशमें ही दोनों हाथोंपर रोक लिया गया हो, उत्तम माना गया है। वह यदि अधिक गीला वा अधिक कड़ा न हो, दुर्गन्धयुक्त और सूखा हुआ न हो तो अच्छा माना गया है। यदि वह पृथ्वीपर गिर गया हो तो उसमेंसे ऊपर और नीचेके हिस्सेको त्यागकर बीचका भाग ले ले। उस गोबरका पिण्ड बनाकर उसे शिवाग्नि आदिमें मूल-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक छोड़ दे। जब वह पक जाय, तब उसे निकाल ले। उसमें जितना अधपका हो, उसको और जो भाग बहुत अधिक पक गया हो, उसको भी त्यागकर श्वेत भस्म ले ले और उसे घोटकर चूर्ण बना दे। इसके बाद उसे भस्म रखनेके पात्रमें रख दे। भस्मपात्र धातुका, लकड़ीका, मिट्टीका, पत्थरका अथवा और किसी वस्तुका बनवा ले। वह देखनेमें सुन्दर होना चाहिये। उसमें रखे हुए भस्मको धनकी भाँति किसी शुभ, शुद्ध एवं समतल स्थानमें रखे। किसी अयोग्य या अपवित्रके हाथमें भस्म न दे। नीचे अपवित्र स्थानमें भी न डाले। नीचेके अंगोंसे उसका स्पर्श न करे। भस्मकी न तो उपेक्षा करे और न उसे लाँघे ही। शास्त्रोक्त समयपर उस पात्रसे भस्म लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक अपने ललाट आदिमें लगाये। दूसरे समयमें उसका उपयोग न करे और न अयोग्य व्यक्तियोंके हाथमें उसे दे। भगवान् शिवका विसर्जन न हुआ हो, तभी भस्म-संग्रह कर ले; क्योंकि
* उपनयनसे आप्तोर्यामपर्यन्त संस्कारोंकी नामावली इस प्रकार है—उपनयन, व्रतबन्ध, समावर्तन, विवाह, उपाकर्म, उत्सर्जन, (सात पाक-यज्ञ—) हुत, प्रहुत, आहुत, शूलगव, बलिहरण, प्रत्यवरोहण, अष्टकाहोम, (सात हविर्यज्ञ-संस्था—) अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयणेष्टि, निरूढपशुबन्ध, सौत्रामणि, (सात सोमयज्ञ-संस्था—) अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, आप्तोर्याम।
| * वायवीयसंहिता * | ७८५ |
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विसर्जनके बाद उसपर चण्डका अधिकार हो जाता है।
जब अग्निकार्य सम्पन्न कर लिया जाय, तब शिवशास्त्रोक्त मार्गसे अथवा अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिसे बलिकर्म करे। तदनन्तर अच्छी तरह लिपे-पुते मण्डलमें विद्यासनको बिछाकर विद्याकोशकी स्थापना करके क्रमशः पुष्प आदिके द्वारा यजन करे। विद्याके सामने गुरुका भी मण्डल बनाकर वहाँ श्रेष्ठ आसन रखे और उसपर पुष्प आदिके द्वारा गुरुकी पूजा करे। तदनन्तर पूजनीय पुरुषोंकी पूजा करे और भूखोंको भोजन कराये। इसके बाद स्वयं सुखपूर्वक शुद्ध अन्न भोजन करे। वह अन्न तत्काल भगवान् शिवको निवेदित किया गया हो अथवा उनका प्रसाद हो। उसे आत्मशुद्धिके लिये श्रद्धापूर्वक भोजन करे। जो अन्न चण्डको समर्पित हो, उसे लोभवश ग्रहण न करे। गन्ध और पुष्पमाला आदि जो अन्य वस्तुएँ हैं, उनके लिये भी यह विधि समान ही है अर्थात् चण्डका भाग होनेपर उन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिये। वहाँ विद्वान् पुरुष 'मैं ही शिव हूँ' ऐसी बुद्धि न करे। भोजन और आचमन करके शिवका मन-ही-मन चिन्तन करते हुए मूलमन्त्रका उच्चारण करे। शेष समय शिवशास्त्रकी कथाके श्रवण आदि योग्य कार्योंमें बिताये। रातका प्रथम प्रहर बीत जानेपर मनोहर पूजा करके शिव और शिवाके लिये एक परम सुन्दर शय्या प्रस्तुत करे। उसके साथ ही भक्ष्य, भोज्य, वस्त्र, चन्दन और पुष्पमाला आदि भी रख दे। मनसे और क्रियाद्वारा भी सब सुन्दर व्यवस्था करके पवित्र हो महादेवजी और महादेवीके चरणोंके निकट शयन करे। यदि उपासक गृहस्थ हो तो वह वहाँ अपनी पत्नीके साथ शयन करे। जो गृहस्थ न हों, वे अकेले ही सोयें। उषःकाल आया जान मन-ही-मन पार्वतीदेवी तथा पार्षदोंसहित अविनाशी भगवान् शिवको प्रणाम करके देशकालोचित कार्य तथा शौच आदि कृत्य पूर्ण करे। फिर यथाशक्ति शंख आदि वाद्योंकी दिव्य ध्वनियोंसे महादेव और महादेवीको जगाये। इसके बाद उस समय खिले हुए परम सुगन्धित पुष्पोंद्वारा शिवा और शिवकी पूजा करके पूर्वोक्त कार्य आरम्भ करे। (अध्याय २७)
<div align="center">~~~~ o ~~~~</div>काम्य कर्मके प्रसंगमें शक्तिसहित पंचमुख महादेवकी पूजाके विधानका वर्णन
तदनन्तर शिवाश्रमसेवियोंके लिये नैमित्तिक कर्मकी विधि बताकर उपमन्युजीने कहा— यदुनन्दन! अब मैं काम्य कर्मका वर्णन करूँगा, जो इहलोक और परलोकमें भी फल देनेवाला है। शैवों तथा माहेश्वरोंको क्रमशः भीतर और बाहर इसे करना चाहिये। जैसे शिव और महेश्वरमें यहाँ अत्यन्त भेद नहीं है, उसी प्रकार शैवों और माहेश्वरोंमें भी अधिक भेद नहीं है। जो मनुष्य शिवके आश्रित रहकर ज्ञानयज्ञमें तत्पर होते हैं, वे शैव कहलाते हैं और जो शिवाश्रित भक्त भूतलपर कर्मयज्ञमें संलग्न रहते हैं, वे महान् ईश्वरका यजन करनेके कारण माहेश्वर कहे गये हैं। इसलिये ज्ञानयोगी शैवोंको अपने
७८६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
भीतर भगवान्द्वारा कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये और कर्मपरायण माहेश्वरोंको बाहर विहित द्रव्यों तथा उपकरणोंद्वारा उसका सम्पादन करना चाहिये। आगे बताये जानेवाले कर्मके प्रयोगमें उनके लिये कोई भेद नहीं है।
गन्ध, वर्ण और रस आदिके द्वारा विधिपूर्वक भूमिकी परीक्षा करके मनोऽभिलषित स्थानपर आकाशमें चँदोवा तान दे और उस स्थानको भलीभाँति लीप-पोतकर दर्पणके समान स्वच्छ बना दे। तत्पश्चात् शास्त्रोक्त मार्गसे वहाँ पहले पूर्वदिशाकी कल्पना करे। उस दिशामें एक या दो हाथका मण्डल बनाये। उस मण्डलमें सुन्दर अष्टदल कमल अंकित करे। कमलमें कर्णिका भी होनी चाहिये। यथासम्भव संचित रत्न और सुवर्ण आदिके चूर्णसे उसका निर्माण करे। वह अत्यन्त शोभायमान और पाँच आवरणोंसे युक्त हो! कमलके आठ दलोंमें पूर्वादिक्रमसे अणिमा आदि आठ सिद्धियोंकी कल्पना करे तथा उनके केसरोंमें शक्तिसहित वामदेव आदि आठ रुद्रोंको पूर्वादि दलके क्रमसे स्थापित करे। कमलकी कर्णिकामें वैराग्यको स्थान दे और बीजोंमें नवशक्तियोंकी स्थापना करे। कमलके कन्दमें शिवसम्बन्धी धर्म और नालमें शिवसम्बन्धी ज्ञानकी भावना करे। कर्णिकाके ऊपर अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डलकी भावना करे। इन मण्डलोंके ऊपर शिवतत्त्व, विद्यातत्त्व और आत्मतत्त्वका चिन्तन करे। सम्पूर्ण कमलासनके ऊपर सुखपूर्वक विराजमान और नाना प्रकारके विचित्र पुष्पोंसे अलंकृत, पाँच आवरणोंसहित भगवान् शिवका माता पार्वतीके साथ पूजन करे। उनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल है। वे सतत प्रसन्न रहते हैं। उनकी प्रभा शीतल है। मस्तकपर विद्युन्मण्डलके समान चमकीली जटारूप मुकुट उनकी शोभा बढ़ाता है। वे व्याघ्रचर्म धारण किये हुए हैं। उनके मुखारविन्दपर कुछ-कुछ मन्द मुसकानकी छटा छा रही है। उनके हाथकी हथेलियाँ और पैरोंके तलवे लाल कमलके समान अरुण प्रभासे उद्भासित हैं। वे भगवान् शिव समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके हाथोंमें उत्तमोत्तम दिव्य आयुध शोभा पा रहे हैं और अंगोंमें दिव्य चन्दनका लेप लगा हुआ है। उनके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं। अर्धचन्द्र उनकी शिखाके मणि हैं। उनका पूर्ववर्ती मुख प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे उद्भासित एवं सौम्य है। उसमें तीन नेत्ररूपी कमल खिले हुए हैं तथा सिरपर बालचन्द्रमाका मुकुट शोभा पाता है। दक्षिणमुख नील जलधरके समान श्याम प्रभासे भासित होता है। उसकी भौंहें टेढ़ी हैं। वह देखनेमें भयानक है। उसमें गोलाकार लाल-लाल आँखें दृष्टिगोचर होती हैं। दाढ़ोंके कारण वह मुख विकराल जान पड़ता है। उसका पराभव करना किसीके लिये भी कठिन है। उसके अधरपल्लव फड़कते रहते हैं। उत्तरवर्ती मुख मूँगेकी भाँति लाल है। काले-काले केशपाश उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उसमें विभ्रमविलाससे युक्त तीन नेत्र हैं और उसका मस्तक अर्द्धचन्द्रमय मुकुटसे विभूषित है। भगवान् शिवका पश्चिम मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा तीन नेत्रोंसे प्रकाशमान है। उसका मस्तक चन्द्रलेखाकी शोभा धारण करता है।
* वायवीयसंहिता *
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वह मुख देखनेमें सौम्य है और मन्द मुसकानकी शोभासे उपासकोंके मनको मोहे लेता है। उनका पाँचवाँ मुख स्फटिकमणिके समान निर्मल, चन्द्रलेखासे समुज्ज्वल, अत्यन्त सौम्य तथा तीन प्रफुल्ल नेत्रकमलोंसे प्रकाशमान है।
भगवान् शिव अपने दाहिने हाथोंमें शूल, परशु, वज्र, खड्ग और अग्नि धारण करके उन सबकी प्रभासे प्रकाशित होते हैं तथा बायें हाथोंमें नाग, बाण, घण्टा, पाश तथा अंकुश उनकी शोभा बढ़ाते हैं। पैरोंसे लेकर घुटनोंतकका भाग निवृत्तिकलासे सम्बद्ध है। उससे ऊपर नाभितकका भाग प्रतिष्ठाकलासे, कण्ठतकका भाग विद्याकलासे, ललाटतकका भाग शान्ति-कलासे और उसके ऊपरका भाग शान्त्यतीताकलासे संयुक्त है। इस प्रकार वे पंचाध्वव्यापी तथा साक्षात् पंचकलामय शरीरधारी हैं। ईशानमन्त्र उनका मुकुट है। तत्पुरुषमन्त्र उन पुरातनदेवका मुख है। अघोरमन्त्र हृदय है। वामदेवमन्त्र उन महेश्वरका गुह्यभाग है और सद्योजातमन्त्र उनका युगल चरण है। उनकी मूर्ति अड़तीस कलामयी* है। परमेश्वर शिवका विग्रह मातृका-(वर्णमाला-) मय, पंचब्रह्म ('ईशानः सर्व-विद्यानाम्' इत्यादि पाँच मन्त्र) मय, प्रणवमय तथा हंसशक्तिसे सम्पन्न है। इच्छाशक्ति उनके अंकमें आरूढ़ है, ज्ञानशक्ति दक्षिण-भागमें है तथा क्रियाशक्ति वामभागमें विराजमान है। वे त्रितत्त्वमय हैं। अर्थात् आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व उनके स्वरूप हैं। वे सदाशिव साक्षात् विद्यामूर्ति हैं। इस प्रकार उनका ध्यान करना चाहिये।
मूलमन्त्रसे मूर्तिकी कल्पना और सकलीकरणकी क्रिया करके मूलमन्त्रसे ही यथोचित रीतिसे क्रमशः पाद्य आदि विशेषार्घ्यपर्यन्त पूजन करे। फिर पराशक्तिके साथ साक्षात् मूर्तिमान् शिवका पूर्वोक्त मूर्तिमें आवाहन करके सदसद्व्यक्तिरहित परमेश्वर महादेवका गन्धादि पंचोपचारोंसे पूजन करे। पाँच ब्रह्ममन्त्रोंसे, छः अंगमन्त्रोंसे, मातृकामन्त्रसे, प्रणवसे, शक्तियुक्त शिव-मन्त्रसे, शान्त तथा अन्य वेदमन्त्रोंसे अथवा केवल शिवमन्त्रसे उन परम देवका पूजन करे। पाद्यसे लेकर मुखशुद्धिपर्यन्त पूजन सम्पन्न करके इष्टदेवका विसर्जन किये बिना ही क्रमशः पाँच आवरणोंकी पूजा आरम्भ करे। (अध्याय २८-२९)
आवरणपूजाकी विस्तृत विधि तथा उक्त विधिसे पूजनकी महिमाका वर्णन
उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! पहले <u>शिवा और शिवके दायें और बायें भागमें</u> <u>क्रमशः गणेश और कार्तिकेयका गन्ध आदि पाँच उपचारोंद्वारा पूजन करे। फिर इन सबके</u>
* कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पंचभूत, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय—ये छत्तीस तत्त्व हैं। ये सब तत्त्व जीवके शरीरमें होते हैं। परमेश्वरके शरीरको शाक्त (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) तथा मन्त्रमय बताया गया है। इन दो तत्त्वोंको जोड़ लेनेसे अड़तीस कलाएँ होती हैं। समस्त जड-चेतन परमेश्वरका स्वरूप होनेसे उनकी मूर्तिको अड़तीस कलामयी बताया गया है। अथवा पाँच स्वर और तैंतीस व्यंजनरूप होनेसे उनके शरीरको अड़तीस कलामय कहा गया है।
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चारों ओर ईशानसे लेकर सद्योजातपर्यन्त पाँच ब्रह्ममूर्तियोंका शक्तिसहित क्रमशः पूजन करे। यह प्रथम आवरणमें किया जानेवाला पूजन है। उसी आवरणमें हृदय आदि छः अंगों तथा शिव और शिवाका अग्निकोणसे लेकर पूर्वदिशापर्यन्त आठ दिशाओंमें क्रमशः पूजन करे। वहीं वामा आदि शक्तियोंके साथ वाम आदि आठ रुद्रोंकी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः पूजा करे। यह पूजन वैकल्पिक है। यदुनन्दन! यह मैंने तुमसे प्रथम आवरणका वर्णन किया है।
अब प्रेमपूर्वक दूसरे आवरणका वर्णन किया जाता है, श्रद्धापूर्वक सुनो। पूर्वदिशावाले दलमें अनन्तका और उनके वामभागमें उनकी शक्तिका पूजन करे। दक्षिणदिशावाले दलमें शक्तिसहित सूक्ष्मदेवकी पूजा करे। पश्चिमदिशाके दलमें शक्तिसहित शिवोत्तमका, उत्तरदिशावाले दलमें शक्तियुक्त एकनेत्रका, ईशानकोणवाले दलमें एकरुद्र और उनकी शक्तिका, अग्निकोणवाले दलमें त्रिमूर्ति और उनकी शक्तिका, नैर्ऋत्यकोणके दलमें श्रीकण्ठ और उनकी शक्तिका तथा वायव्यकोणवाले दलमें शक्तिसहित शिखण्डीशका पूजन करे। समस्त चक्रवर्तियोंकी भी द्वितीय आवरणमें ही पूजा करनी चाहिये। तृतीय आवरणमें शक्तियोंसहित अष्टमूर्तियोंका पूर्वादि आठों दिशाओंमें क्रमशः पूजन करे। भव, शर्व, ईशान, रुद्र, पशुपति, उग्र, भीम और महादेव—ये क्रमशः आठ मूर्तियाँ हैं। इसके बाद उसी आवरणमें शक्तियोंसहित महादेव आदि ग्यारह मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। महादेव, शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, ईशान, विजय, भीम, देवदेव, भवोद्भव तथा कपर्दीश (या कपालीश)—ये ग्यारह मूर्तियाँ हैं। इनमेंसे जो प्रथम आठ मूर्तियाँ हैं, उनका अग्निकोणवाले दलसे लेकर पूर्वदिशापर्यन्त आठ दिशाओंमें पूजन करना चाहिये। देवदेवको पूर्वदिशाके दलमें स्थापित एवं पूजित करे और ईशानका पुनः अग्निकोणमें स्थापन-पूजन करे। फिर इन दोनोंके बीचमें भवोद्भवकी पूजा करे और उन्हींके बाद कपालीश या कपर्दीशका स्थापन-पूजन करना चाहिये। उस तृतीय आवरणमें फिर वृषभराजका पूर्वमें, नन्दीका दक्षिणमें, महाकालका उत्तरमें, शास्ताका अग्निकोणके दलमें, मातृकाओंका दक्षिणदिशाके दलमें, गणेशजीका नैर्ऋत्यकोणके दलमें, कार्तिकेयका पश्चिमदलमें, ज्येष्ठाका वायव्यकोणके दलमें, गौरीका उत्तरदलमें, चण्डका ईशानकोणमें तथा शास्ता एवं नन्दीश्वरके बीचमें मुनीन्द्र वृषभका यजन करे। महाकालके उत्तरभागमें पिंगलका, शास्ता और मातृकाओंके बीचमें भृंगीश्वरका, मातृकाओं तथा गणेशजीके बीचमें वीरभद्रका, स्कन्द और गणेशजीके बीचमें सरस्वतीदेवीका, ज्येष्ठा और कार्तिकेयके बीचमें शिवचरणोंकी अर्चना करनेवाली श्रीदेवीका, ज्येष्ठा और गणाम्बा (गौरी)-के बीचमें महामोटीकी पूजा करे। गणाम्बा और चण्डके बीचमें दुर्गादेवीकी पूजा करे। इसी आवरणमें पुनः शिवके अनुचरवर्गकी पूजा करे। इस अनुचरवर्गमें रुद्रगण, प्रमथगण और भूतगण आते हैं। इन सबके विविध रूप हैं और ये सब-के-सब अपनी शक्तियोंके साथ हैं। इनके बाद एकाग्रचित्त हो शिवाके सखीवर्गका भी ध्यान एवं पूजन करना चाहिये।
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इस प्रकार तृतीय आवरणके देवताओंका विस्तारपूर्वक पूजन हो जानेपर उसके बाह्यभागमें चतुर्थ आवरणका चिन्तन एवं पूजन करे। पूर्वदलमें सूर्यका, दक्षिणदलमें चतुर्मुख ब्रह्माका, पश्चिमदलमें रुद्रका और उत्तरदिशाके दलमें भगवान् विष्णुका पूजन करे। इन चारों देवताओंके भी पृथक्-पृथक् आवरण हैं। इनके प्रथम आवरणमें छहों अंगों तथा दीप्ता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा और विद्युता—इनकी क्रमशः पूर्व आदि आठ दिशाओंमें स्थिति है। द्वितीय आवरणमें पूर्वसे लेकर उत्तरतक क्रमशः चार मूर्तियोंकी और उनके बाद उनकी शक्तियोंकी पूजा करे। आदित्य, भास्कर, भानु और रवि—ये चार मूर्तियाँ क्रमशः पूर्वादि चारों दिशाओंमें पूजनीय हैं। तत्पश्चात् अर्क, ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णु—ये चार मूर्तियाँ भी पूर्वादि दिशाओंमें पूजनीय हैं। पूर्वदिशामें विस्तरा, दक्षिणदिशामें सुतरा, पश्चिमदिशामें बोधिनी और उत्तरदिशामें आप्यायिनीकी पूजा करे। ईशानकोणमें उषाकी, अग्निकोणमें प्रभाकी, नैर्ऋत्यकोणमें प्राज्ञाकी और वायव्यकोणमें संध्याकी पूजा करे। इस तरह द्वितीय आवरणमें इन सबकी स्थापना करके विधिवत् पूजा करनी चाहिये।
तृतीय आवरणमें सोम, मंगल, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बुध, विशालबुद्धि बृहस्पति, तेजोनिधि शुक्र, शनैश्चर तथा धूम्रवर्णवाले भयंकर राहु-केतुका पूर्वादि दिशाओंमें पूजन करे अथवा द्वितीय आवरणमें द्वादश आदित्योंकी पूजा करनी चाहिये और तृतीय आवरणमें द्वादश राशियोंकी। उसके बाह्य भागमें सात-सात गणोंकी सब ओर पूजा करनी चाहिये। ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वों, नागों, अप्सराओं, ग्रामणियों, यक्षों, यातुधानों, सात छन्दोमय अश्वों तथा वालखिल्योंका पूजन करे। इस तरह तृतीय आवरणमें सूर्यदेवका पूजन करनेके पश्चात् तीन आवरणोंसहित ब्रह्माजीका पूजन करे।
पूर्वदिशामें हिरण्यगर्भका, दक्षिणमें विराट्का, पश्चिमदिशामें कालका और उत्तरदिशामें पुरुषका पूजन करे। हिरण्यगर्भ नामक जो पहले ब्रह्मा हैं, उनकी अंगकान्ति कमलके समान है। काल जन्मसे ही अंजनके समान काले हैं और पुरुष स्फटिकमणिके समान निर्मल हैं। त्रिगुण, राजस, तामस तथा सात्त्विक—ये चारों भी पूर्वादि दिशाके क्रमसे प्रथम आवरणमें ही स्थित हैं।
द्वितीय आवरणमें पूर्वादि दिशाओंके दलोंमें क्रमशः सनत्कुमार, सनक, सनन्दन और सनातनका पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् तीसरे आवरणमें ग्यारह प्रजापतियोंकी पूजा करे। उनमेंसे प्रथम आठका तो पूर्व आदि आठ दिशाओंमें पूजन करे, फिर शेष तीनका पूर्व आदिके क्रमसे अर्थात् पूर्व, दक्षिण एवं पश्चिममें स्थापन-पूजन करे। दक्ष, रुचि, भृगु, मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि, कश्यप और वसिष्ठ—ये ग्यारह विख्यात प्रजापति हैं। इनके साथ इनकी पत्नियोंका भी क्रमशः पूजन करना चाहिये। प्रसूति, आकूति, ख्याति, सम्भूति, धृति, स्मृति, क्षमा, संनति, अनसूया, देवमाता अदिति तथा अरुन्धती—ये सभी ऋषिपत्नियां पतिव्रता, सदा शिव-पूजनपरायणा, कान्तिमती और प्रिय-दर्शना (परम सुन्दरी) हैं। अथवा प्रथम आवरणमें चारों वेदोंका पूजन करे, फिर
७९० * संक्षिप्त शिवपुराण *
द्वितीय आवरणमें इतिहास-पुराणोंकी अर्चना करे तथा तृतीय आवरणमें धर्मशास्त्र- सहित सम्पूर्ण वैदिक विद्याओंका सब ओर पूजन करना चाहिये। चार वेदोंको पूर्वादि चार दिशाओंमें पूजना चाहिये, अन्य ग्रन्थोंको अपनी रुचिके अनुसार आठ या चार भागोंमें बाँटकर सब ओर उनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार दक्षिणमें तीन आवरणोंसे युक्त ब्रह्माजीकी पूजा करके पश्चिममें आवरणसहित रुद्रका पूजन करे। ईशान आदि पाँच ब्रह्म और हृदय आदि छः अंगोंको रुद्रदेवका प्रथम आवरण कहा गया है। द्वितीय आवरण विद्येश्वरमय$^१$ है। तृतीय आवरणमें भेद है। अतः उसका वर्णन किया जाता है। उस आवरणमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे त्रिगुणादि चार मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वदिशामें पूर्णरूप शिव नामक महादेव पूजित होते हैं, इनकी 'त्रिगुण' संज्ञा है (क्योंकि ये त्रिगुणात्मक जगत्के आश्रय हैं)। दक्षिणदिशामें 'राजस' पुरुषके नामसे प्रसिद्ध सृष्टिकर्ता ब्रह्माका पूजन किया जाता है, ये 'भव' कहलाते हैं। पश्चिम- दिशामें 'तामस' पुरुष अग्निकी पूजा की जाती है, इन्हींको संहारकारी हर कहा गया है। उत्तरदिशामें 'सात्त्विक' पुरुष सुख- दायक विष्णुका पूजन किया जाता है। ये ही विश्वपालक 'मृड' हैं। इस प्रकार पश्चिमभागमें शम्भुके शिवरूपका, जो पचीस तत्त्वोंका साक्षी छब्बीसवाँ$^२$ तत्त्व- रूप है, पूजन करके उत्तरदिशामें भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। इनके प्रथम आवरणमें वासुदेवको पूर्वमें, अनिरुद्धको दक्षिणमें, प्रद्युम्नको पश्चिममें और संकर्षणको उत्तरमें स्थापित करके इनकी पूजा करनी चाहिये। यह प्रथम आवरण बताया गया। अब द्वितीय शुभ आवरण बताया जाता है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, तीनोंमेंसे एक राम, आप श्रीकृष्ण और हयग्रीव—ये द्वितीय आवरणमें पूजित होते हैं। तृतीय आवरणमें पूर्वभागमें चक्रकी पूजा करे, दक्षिणभागमें कहीं भी प्रतिहत न होनेवाले नारायणास्त्रका यजन करे, पश्चिममें पांचजन्यका और उत्तरमें शार्ङ्गधनुषकी पूजा करे। इस प्रकार तीन आवरणोंसे युक्त साक्षात् विश्व नामक परम हरि महाविष्णुकी, जो सदा सर्वत्र व्यापक हैं, मूर्तिमें भावना करके पूजा करे। इस तरह विष्णुके चतुर्व्यूहक्रमसे चार मूर्तियोंका पूजन करके क्रमशः उनकी चार शक्तियोंका पूजन करे। प्रभाका अग्निकोणमें, सरस्वतीका नैर्ऋत्यकोणमें, गणाम्बिकाका वायव्यकोणमें तथा लक्ष्मीका ईशानकोणमें पूजन करे। इसी प्रकार भानु आदि मूर्तियों और उनकी शक्तियोंका पूजन करके उसी आवरणमें लोकेश्वरोंकी पूजा करे। उनके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण,
१-पाशुपत-दर्शनमें विद्येश्वरोंकी संख्या आठ बतायी गयी है। उनके नाम इस प्रकार हैं—अनन्त, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डी। इनको क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें स्थापित करके इनकी पूजा करे। द्वितीय आवरणमें इन्हींकी पूजा बतायी गयी है।
२-सांख्यरोक्त २४ प्राकृत तत्त्वोंके साक्षी जीवको पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है; जो इससे भी परे हैं, वे सर्वसाक्षी परमात्मा शिव छब्बीसवें तत्त्वरूप हैं।