शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-बहुतसे परमार्थसे बहिर्मुख जिनकी भिन्न भिन्न मति है अपने मतिके अनुसार कर्मोंको मानते और करते हैं कोई कहते हैं कि, ईश्वर नहीं है इसीतरह बहुत लोग कहते हैं कि, यह संसार बिना ईश्वरके नहीं है अर्थात् ईश्वरहीसे है यही निश्चय जानते हैं अपनी युक्तिसे बहुत २ भेद कहते और उसमें स्थिरतासे तत्पर रहते हैं ॥ १३॥ १४ ॥ मूलम्-एते चान्ये च मुनिभिः संज्ञाभेदाः पृथग्विधाः ॥ शास्त्रेषु कथिता ह्येते लोक- व्यामोहकारकाः॥१५॥एतद्विवादशीला- नां मतं वक्तुं न शक्यते ॥ भ्रमन्त्यस्मि- जनाः सर्वे मुक्तिमार्गबहिष्कृताः ॥ १६ ॥ टीका-ऐसे बहुत मुनिलोगोंने नानाप्रकारके मत शास्त्रमें स्थापन किये हैं यह संसारके मोह भ्रममें पड़नेका हेतु है अर्थात् शास्त्रमें बहुतप्रकारके मत दे- खनेसे मनुष्यके चित्तमें भ्रम उत्पन्न होता है उस भ्रम- का फल यह है कि, अपनी बुद्धिके अनुसार कोई एक मत ग्रहण करके मरणपर्यन्त उसमें तत्पर मनुष्य रह- ताहै परंतु अमृत लाभ नहीं होता ऐसे विवादशील लोगोंका मत वर्णन करनेको हम शक्य नहीं हैं ।