भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

प्रथमपटलः । (५) टीका-कोई कोई बुद्धिमान् गुप्तशास्त्रके जाननेमें तत्पर अर्थात् गूढदर्शी बहुत आत्मा नित्य और सर्व- व्यापक कहते हैं बहुत प्रत्यक्षवादी यह कहते हैं कि, जो वस्तु प्रत्यक्ष देखनेमें आताहै वही सत्य है और कुछ नहीं है जिनकी बुद्धि स्वर्गादिकके न माननेमें निश्चित है ॥ १० ॥ ११ ॥ मूल-ज्ञानप्रवाह इत्यन्ये शून्यं केचित्परं वि- दुः ॥ द्वावेव तत्त्वं मन्यन्तेऽपरे प्रकृति- पूरुषौ ॥ १२ ॥ टीका-कोई मनुष्य कहते हैं कि, सिवाय ज्ञान- धाराके और कुछ नहीं है जो वस्तु संसारमें वर्तमान देखने या सुननेमें आती है या किसी प्रकारसे उसका होना निश्चय होताहै वह सब ज्ञानही है कोई पुरुष यही जानता है कि, सिवाय शून्यके और कुछ नहीं है इसीतरह कोई मनुष्य प्रकृतिपुरुष दोनोंको तत्त्व मानते हैं ॥१२॥ मूलम्-अत्यन्तभिन्नमतयः परमार्थपराङ्- खाः॥ एवमन्ये तु संचिन्त्य यथामति य- थाश्रुतम् ॥ १३ ॥ निरीश्वरमिदं प्राहुः सेश्वरञ्च तथाऽपरे ॥ वदन्ति विविधैर्भेदैः संयुत्क्यति स्थियाकातराः ॥ १४ ॥