शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । समझते हैं इसी प्रकार मनुष्य बहुतसे उपाय मुक्तिके हेतु अपने मतिके अनुसार करते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ मूलम्-एवं व्यवसिता लोके कृत्याकृत्यवि- दो जनाः ॥ व्यामोहमेव गच्छन्ति विमु- क्ताः पापकर्मभिः ॥८ ॥ एतन्मतावलम्बी यो लब्ध्वा दुरितपुण्यके ॥ भ्रमतीत्यव- शः सोऽत्र जन्ममृत्युपरम्पराम् ॥ ९ ॥ टीका-इसीतरह विधिनिषेध कर्मके जाननेवाले लोग पापकर्मसे रहित होके मोहमेंही पड़तेहैं और जो मनुष्य पुण्यपापका अनुष्ठान पहिले जो मत कहा है उसके आसरे होके करते हैं उसका फल यह होता है कि, मनुष्य वारंवार संसारमें जनमता और मरता है अर्थात् शुभाशुभ कर्म करनेसे कदापि मोक्ष नहीं होता परन्तु शुभकर्म करनेसे केवल चित्तकी शुद्धि होतीहै ॥ ८ ॥ ९ ॥ मूलम्-अन्यैर्मतिमतां श्रेष्ठैर्गुप्तालोकनतत्प- रैः॥ आत्मानो बहवः प्रोक्ता नित्याः सर्व- गतास्तथा ॥ १० ॥ यद्यत्प्रत्यक्षविषयं तदन्यन्नास्ति चक्षते ॥ कुतः स्वर्गादयः सन्तीत्यन्ये निश्चितमानसाः ॥ ११ ॥