शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
(४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । समझते हैं इसी प्रकार मनुष्य बहुतसे उपाय मुक्तिके हेतु अपने मतिके अनुसार करते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ मूलम्-एवं व्यवसिता लोके कृत्याकृत्यवि- दो जनाः ॥ व्यामोहमेव गच्छन्ति विमु- क्ताः पापकर्मभिः ॥८ ॥ एतन्मतावलम्बी यो लब्ध्वा दुरितपुण्यके ॥ भ्रमतीत्यव- शः सोऽत्र जन्ममृत्युपरम्पराम् ॥ ९ ॥ टीका-इसीतरह विधिनिषेध कर्मके जाननेवाले लोग पापकर्मसे रहित होके मोहमेंही पड़तेहैं और जो मनुष्य पुण्यपापका अनुष्ठान पहिले जो मत कहा है उसके आसरे होके करते हैं उसका फल यह होता है कि, मनुष्य वारंवार संसारमें जनमता और मरता है अर्थात् शुभाशुभ कर्म करनेसे कदापि मोक्ष नहीं होता परन्तु शुभकर्म करनेसे केवल चित्तकी शुद्धि होतीहै ॥ ८ ॥ ९ ॥ मूलम्-अन्यैर्मतिमतां श्रेष्ठैर्गुप्तालोकनतत्प- रैः॥ आत्मानो बहवः प्रोक्ता नित्याः सर्व- गतास्तथा ॥ १० ॥ यद्यत्प्रत्यक्षविषयं तदन्यन्नास्ति चक्षते ॥ कुतः स्वर्गादयः सन्तीत्यन्ये निश्चितमानसाः ॥ ११ ॥
प्रथमपटलः । (५) टीका-कोई कोई बुद्धिमान् गुप्तशास्त्रके जाननेमें तत्पर अर्थात् गूढदर्शी बहुत आत्मा नित्य और सर्व- व्यापक कहते हैं बहुत प्रत्यक्षवादी यह कहते हैं कि, जो वस्तु प्रत्यक्ष देखनेमें आताहै वही सत्य है और कुछ नहीं है जिनकी बुद्धि स्वर्गादिकके न माननेमें निश्चित है ॥ १० ॥ ११ ॥ मूल-ज्ञानप्रवाह इत्यन्ये शून्यं केचित्परं वि- दुः ॥ द्वावेव तत्त्वं मन्यन्तेऽपरे प्रकृति- पूरुषौ ॥ १२ ॥ टीका-कोई मनुष्य कहते हैं कि, सिवाय ज्ञान- धाराके और कुछ नहीं है जो वस्तु संसारमें वर्तमान देखने या सुननेमें आती है या किसी प्रकारसे उसका होना निश्चय होताहै वह सब ज्ञानही है कोई पुरुष यही जानता है कि, सिवाय शून्यके और कुछ नहीं है इसीतरह कोई मनुष्य प्रकृतिपुरुष दोनोंको तत्त्व मानते हैं ॥१२॥ मूलम्-अत्यन्तभिन्नमतयः परमार्थपराङ्- खाः॥ एवमन्ये तु संचिन्त्य यथामति य- थाश्रुतम् ॥ १३ ॥ निरीश्वरमिदं प्राहुः सेश्वरञ्च तथाऽपरे ॥ वदन्ति विविधैर्भेदैः संयुत्क्यति स्थियाकातराः ॥ १४ ॥
(६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-बहुतसे परमार्थसे बहिर्मुख जिनकी भिन्न भिन्न मति है अपने मतिके अनुसार कर्मोंको मानते और करते हैं कोई कहते हैं कि, ईश्वर नहीं है इसीतरह बहुत लोग कहते हैं कि, यह संसार बिना ईश्वरके नहीं है अर्थात् ईश्वरहीसे है यही निश्चय जानते हैं अपनी युक्तिसे बहुत २ भेद कहते और उसमें स्थिरतासे तत्पर रहते हैं ॥ १३॥ १४ ॥ मूलम्-एते चान्ये च मुनिभिः संज्ञाभेदाः पृथग्विधाः ॥ शास्त्रेषु कथिता ह्येते लोक- व्यामोहकारकाः॥१५॥एतद्विवादशीला- नां मतं वक्तुं न शक्यते ॥ भ्रमन्त्यस्मि- जनाः सर्वे मुक्तिमार्गबहिष्कृताः ॥ १६ ॥ टीका-ऐसे बहुत मुनिलोगोंने नानाप्रकारके मत शास्त्रमें स्थापन किये हैं यह संसारके मोह भ्रममें पड़नेका हेतु है अर्थात् शास्त्रमें बहुतप्रकारके मत दे- खनेसे मनुष्यके चित्तमें भ्रम उत्पन्न होता है उस भ्रम- का फल यह है कि, अपनी बुद्धिके अनुसार कोई एक मत ग्रहण करके मरणपर्यन्त उसमें तत्पर मनुष्य रह- ताहै परंतु अमृत लाभ नहीं होता ऐसे विवादशील लोगोंका मत वर्णन करनेको हम शक्य नहीं हैं ।
प्रथमपटलः । ( ७ ) मुक्तिमार्गसे विमुख होके सब मनुष्य संसारमें भ्रमण कर- ते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ मूलम्-आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ इदमेकं सुनिष्पन्नं योग- शास्त्रं परं मतम् ॥ १७ ॥ टीका-श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, सब शास्त्रोंको देखके और वारंवार विचारके यह निश्चित हुआ कि, एक यह योगशास्त्र उत्तम परमसम्मत है अर्थात् यह सबसे उत्तम है तात्पर्य यह है कि, ऐसे मतको छोड़कर जिसकी प्रशंसा ईश्वर अपने मुखारविन्दसे करते हैं और जिसके ग्रहण करनेसे ब्रह्म करामलकवत् जानपडता है मनुष्य विक्षि- प्तके तरह इधर उधर चित्तको दौड़ाते हैं और बहुत लोग यह विचारते हैं कि, यह बड़ा कठिन है आश्चर्यकी बात है कि, मनुष्यशरीरसे जब ऐसा उत्तम श्रम न होगा तो जान पडता है कि, रोगादिकसे शरीरके नाश होनेसे पीछे फिर जब पशुका जन्म होगा तब कुछ ईश्वरके जाननेमें श्रम करेंगे ॥ १७ ॥ मूलम्-यस्मिञ्ज्ञाते सर्वमिदं ज्ञातं भवति निश्चितम् ॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यः किमन्यच्छास्त्रभाषितम् ॥ १८ ॥
( ८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमता । टीका-निश्चय जिसके जाननेसे सब संसार जाना जाता है ऐसे योगशास्त्रके जाननेमें परिश्रम करना अवश्य उ- चितहै फिर अन्य शास्त्र जो कहेहैं उनका क्या प्रयोजन है अर्थात् कुछ प्रयोजन नहीं तात्पर्य यह है कि, पंडित लोग वृथा विवाद करके जो लोग सुमार्गमें जानेकी इच्छा करतेहैं उनको भी भ्रष्ट कर देते हैं ॥ १८ ॥ मूलम्-योगशास्त्रमिदं गोप्यमस्माभिः परि- भाषितम् ॥ सुभक्ताय प्रदातव्यं त्रैलोक्ये च महात्मने ॥ १९ ॥ टीका-यह योगशास्त्र जो हमने कहाहै सो परम गोपनीय है यह त्रैलोक्यमें महात्मा और अच्छे भक्त जनोंको दे- ना उचित है तात्पर्य यह है कि, विना ईश्वर- के भक्तिके यह शुभकर्म सिद्ध नहीं होता न उधर चित्तकी वृत्ति जातीहै इस हेतुसे अभक्तजनोंको देना उचित नहींहै ॥ १९ ॥ मूलम्-कर्मकाण्डं ज्ञानकाण्डमिति वेदो द्वि- धा मतः ॥ भवति द्विविधो भेदो ज्ञानका- ण्डस्य कर्मणः ॥ २० ॥ द्विविधः कर्म काण्डः स्यान्निषेधविधिपूर्वकः ॥ निषिद्ध- कर्मकरणे पापं भवति निश्चितम् ॥ विधि- .
प्रथमपटलः । ( ९ ) ना कर्मकरणे पुण्यं भवति निश्चितम्॥२१॥ टीका-कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड वेदके दो मत हैं इसमेंभी दो दो भेद कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डमें भये हैं ॥ २० ॥ उस कर्मकाण्डमें दो प्रकार हैं एक निषेध दूसरा विधि तहां निषेध कर्म करनेसे निश्चय पाप होता है विहित कर्म करनेसे निश्चय करके पुण्य होताहै ॥२१॥ मूलम्-त्रिविधो विधिकूटःस्यान्नित्यनैमित्ति- काम्यतः॥नित्येऽकृते किल्बिषं स्यात्का- म्ये नैमित्तिके फलम् ॥ २२ ॥ टीका-विधि कर्ममें तीन प्रकारका भेद कहाहै नित्य १ नैमित्तिक २ सकाम ३ नित्यकर्म संध्या देवार्चन आदि न करनेसे पाप होता है सकाम अर्थात् जो कर्म फलके इच्छासे किया जाताहै और नैमित्तिक जो तीर्थों में पर्वादिकमें स्नानादिक करते हैं इनके न करनेसे पाप नहीं होता परन्तु करनेसे फल होताहै ॥ २२ ॥ मूलं-द्विविधन्तु फलं ज्ञेयं स्वर्गो नरक एव च ॥ स्वर्गो नानाविधश्चैव नरकोपि तथा भवेत् ॥ २३ ॥ टीका-फल दो प्रकारका होताहै स्वर्ग और नरक स्वर्ग नानाप्रकारका है ऐसेही नरकभी बहुत प्रकारका
( १० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । है तात्पर्य यह है कि, जैसा जो मनुष्य शुभाशुभ कर्म करता है वैसेही नरक वा स्वर्गमें जाताहै ॥ २३ ॥ मूलम्-पुण्यकर्माणि वै स्वर्गो नरकः पापक- र्मणि ॥ कर्मबंधमयी सृष्टिर्नान्यथा भव- ति ध्रुवम् ॥ २४ ॥ टीका-पुण्यकर्म करनेसे स्वर्गमें जाताहै और पापक- र्मसे नरकमें जाताहै. संसार कर्मसे निश्चय करके बंधाहै दूसरा हेतु नहीं है तात्पर्य यह है कि, जो ईश्वरको जानके कर्माकर्मसे अपनेको रहित समझेगा वह इस बंधसे छूटजायगा ॥ २४ ॥ मूलम्-जन्तुभिश्चानुभूयंते स्वर्गे नानासुखा- नि च ॥ नानाविधानि दुःखानि नरके दुः- सहानि वै ॥ २५ ॥ टीका-प्राणी स्वर्गमें नानाप्रकारके सुखका अनुभव करता है ऐसेही बहुत प्रकारके दुःसह दुःख नरकमें भी भोगता है ॥ २५ ॥ मूलम्-पापकर्मवशाद्दुःखंपुण्यकर्मवशात्सुखं तस्मात्सुखार्थी विविधं पुण्यं प्रकरुते ध्रुवं २६ टीका-पापकर्म करनेसे दुःख होता है और पुण्यकर्म करनेसे सुख होताहै इस हेतुसे निश्चय करके सुखार्थी पुरुष नानाप्रकारके पुण्य करते हैं ॥ २६ ॥
प्रथमपटलः । ( ११ ) मूलम्-पापभोगावसाने तु पुनर्जन्म भवे- त्खलु ॥ पुण्यभोगावसाने तु नान्यथा भवति ध्रुवम् ॥ २७ ॥ टीका-पापका फल भोगनेके पीछे अवश्य फिर जन्म होताहै ऐसेही पुण्यफल भोगनेके अंतमें निश्चय फिर जन्म होता है अन्यथा नहीं होता ॥ २७ ॥ मूलम्-स्वर्गेऽपि दुःखसंभोगः परस्त्रीदर्शना- द्ध्रुवम् ॥ ततो दुःखमिदं सर्वं भवेन्नास्त्यत्र संशयः ॥ २८ ॥ टीका-स्वर्गमेंभी दुःखहैं इस कारणसे कि, उस स्था- नमें परस्त्रीका दर्शन अवश्य होताहै उसकी अप्राप्तिमें मानसिक व्यथा उत्पन्न होती है अन्य भी राग द्वेषादि बहुतसे कारण हैं कि, प्राणीके चित्तको स्वर्गमें भी स्थिर नहीं रहने देते इस हेतुसे संसारमें सिवाय दुःखके सुख नहीं है ॥ २८ ॥ मूलम्-तत्कर्मकल्पकैः प्रोक्तं पुण्यंपापमि- ति द्विधा ॥ पुण्यपापमयो बन्धो देहिनां भवति क्रमात् ॥ २९ ॥ टीका-बुद्धिमान् लोगोंने पुण्य और पाप दोप्रकारक
( १२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कर्म कहाहै इसी पुण्य पापसे शरीर बंधायमान है अर्थात् बारंबार शरीरधारण करनेका कारण है ॥ २९ ॥ मूलम्-इहामुत्र फलद्वेषी सफलं कर्म सं- त्यजेत् ॥ नित्यनैमित्तिके संगं त्यक्त्वा योगे प्रवर्त्तते ॥ ३० ॥ टीका-इस लोकका भोग वा परलोकके फलकी इच्छा और नित्य नैमित्तिक आदि कर्मोंको फलसहित त्यागके योगाभ्यास अर्थात् परब्रह्मके विचारमें महात्मा जनोंके तत्पर रहना उचित है ॥ ३० ॥ मूलं-कर्मकाण्डस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा यो- गी त्यजेत्सुधीः ॥ पुण्यपापद्वयं त्यक्त्वा ज्ञानकाण्डे प्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥ टीका- कर्मकाण्डके माहात्म्यको जानके योगीको उचितहै कि, पुण्य पाप दोनोंको तृणवत् विचारके त्याग दे और ज्ञानकाण्डमें तत्पर होरहै ॥ ३१ ॥ मूलम्--आत्मा वारे च श्रोतव्यो मंतव्य इति यच्छ्रुतिः ॥ सा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हेतुदायिनी ॥ ३२.॥ टीका- यह श्रुतिका वाक्य है कि, आत्माको सुनो और आत्माको मनन करो अर्थात् जो कुछ
प्रथमपटलः । ( १३ ) है सो आत्माही है सो श्रुति मुक्तिकी देनेवाली है यत्न करके सेवनके योग्य है ॥ ३२ ॥ मूलम्-दुरितेषु च पुण्येषु यो धीवृत्तिं प्रचा- दयात् ॥ सोऽहं प्रवर्तते मत्तो जगत्सर्वं चराचरम् ॥ ३३ ॥ सर्वं च दृश्यते मत्तः सर्वं च मयि लीयते ॥ न तद्भिन्नोऽ- हमस्मीह मद्भिन्नो न तु किंचन ॥ ३४ ॥ टीका-पाप पुण्य दोनोंमें समानरूपकी बुद्धिको जो वृत्ति प्रेरणा करती है सो हम हैं और हमसेही सब जगत् चराचर उत्पन्न है ॥ ३३ ॥ और जो देख पड़ताहै वह सब हम हैं हममेंही सब लीन होताहै न वह हमसे भिन्न है न हम उससे किंचित्मात्र भिन्न हैं ता- त्पर्य यह है कि, वह आत्मा जिससे यह जगत् उत्पन्नहै हमसे भिन्न नहीं है इस हेतुसे इस संसारके स्थिति संहार कर्त्ता हम हैं ऐसी वृत्ति योगीकी रहती है ॥३४॥ मूलम्--जलपूर्णेष्वसंख्येषु शरावेषु यथा- भवेत् ॥ एकस्य भात्यसंख्यत्वं तद्भेदोऽत्र न दृश्यते ॥ ३५ ॥ उपाधिषु शरावेषु या संख्या वर्तते परा ॥ सा संख्या भवति यथा रवौ चात्मनि तत्तथा ॥ ३६ ॥
(१४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जलसे भरा असंख्य शराव अर्थात् मृत्तिका आदिके पात्रमें एक सूर्यका अनेक प्रतिबिंब देख- पडता है वास्तवमें भेद नहीं है जो भेद देख- पडता है वह शरावके संख्याका भेद है ॥ ३६ ॥ जिस प्रकारसे शरावके संख्यासे सूर्यमें भेद जान पडता है उसी प्रकार मायाकी उपाधिसे संसार भिन्न भिन्न जान पडता है वस्तुतः केवल एक ब्रह्म है ॥३६॥ मूलम्-यथैकः कल्पकः स्वप्ने नानावि- धतयेष्यते ॥ जागरोपि तथाप्येकस्तथैव बहुधा जगत् ॥ ३७ ॥ टीका-जैसे स्वप्न अवस्थामें एकसे अनेक कल्पना होतीहै निद्राच्युत होजानेपर कुछ नहीं रहता उसी प्रकार मायाके आवरणसे अनेक संसार जान पडता है जब ज्ञानरूपी खङ्गसे मायाका पटल कटजाता है तब शिवाय शुद्धब्रह्मके और कुछ नहीं रहजाता ॥ ३७ ॥ मूलम्-सर्पबुद्धिर्यथा रज्जौशुक्तौवा रजतभ्र- मः ॥३८॥ तद्वदेवमिदं विश्वं विवृतं पर- मात्मनि ॥ रज्जुज्ञानाद्यथा सर्पो मिथ्या रूपो निवर्तते ॥ ३९ ॥ आत्मज्ञानात्तथा याति मिथ्याभूतमिदं जगत् ॥ रौप्यभ्रा- न्तिरियं याति शुक्तिज्ञानाद्यथा खलु ४०
प्रथमपटलः । (१५) टीका-रस्सीमें सर्पकी भ्रान्ति और सीपीमें चाँदीकी भ्रान्ति होतीहै ॥३८॥उसी प्रकार शुद्धब्रह्ममें संसारकी झूठी भ्रान्ति होती है रस्सीके ज्ञान होनेसे झूठे सर्पका अभाव होजाता है॥३९॥ उसी तरह आत्मज्ञान होनेसे यह संसार नहीं रहजाता सीपीकोभी अच्छी तरह निश्चय जानलेनेसे चाँदीकी भ्रांति दूर होती है ॥ ४० ॥ मूलम्-जगद्भ्रान्तिरियं याति चात्मज्ञानाद्य- था तथा ॥ यथा रज्जूरगभ्रान्तिर्भवेद्भे- दवशाज्जगत् ॥ ४१ ॥ तथा जगदिदं भ्रांतिरध्यासकल्पनाज्जगत् ॥ आत्मज्ञा- नाद्यथा नास्ति रज्जुज्ञानाद्भुजङ्गमः ॥४२॥ टीका-वैसेही आत्मज्ञान होनेसे जगत्की भ्रान्ति दूर होती है जैसे रस्सीमें सर्पकी भ्रांति होतीहै ॥ ४१ ॥ उसी तरह आत्मामें अध्यास कल्पनामात्र जगत्की भ्रांति है रज्जुवत् ज्ञान होनेसे फिर जगत्का तीनों कालसे अभाव हो जाताहै ॥ ४२ ॥ मूलम्-यथा दोषवशाच्छुक्लःपीतोभवति ना- न्यथा ॥ अज्ञानदोषादात्मापि जगद्भवति दुस्त्यजम् ॥ ४३ ॥ दोषनाशे यथा शुक्लो
( १६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ...दृष्टे रोगिणा त्वयम्॥ शुद्धज्ञानात्तथाऽ- ज्ञाननाशादात्मा तथा कृतः ॥ ४४ ॥ टीका-जैसे मनुष्यको कवलकी व्याधि अर्थात् पित्तादिकके दोषसे सब वस्तु निश्चय पीतवर्ण देख पड़ती हैं उसी प्रकार अज्ञानरूपी दोषसे शुद्ध आत्मा नहीं प्रतीत होताहै परन्तु यह झूठा संसार देख पड़ता है ऐसा अज्ञान बड़े कष्टसे दूर होताहै जैसे पित्तादिक दोषके नाश होनेसे फिर यथार्थ देखपड़ता है उसी प्रकार अज्ञान दूर होनेसे शुद्धब्रह्म निर्विकार जानप- डता है तात्पर्य यह है कि, मनुष्यके पीछे एक अज्ञान की व्याधि बहुत बडी लगी है इसकी औषधि आत्म- ज्ञान है यह बात निश्चय है कि, व्याधि बिना औषधिके दूर नहीं होती ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ मूलम्-कालत्रयेऽपिन यथा रज्जुःसर्पो भवे- दिति ॥ तथात्मा न भवेद्विश्वं गुणातीतो निरञ्जनः ॥ ४५ ॥ टीका-जिस तरह रस्सी तीनों कालमें सर्प नहीं हो सकती उसी तरह आत्माभी तीनों कालमें कदापि सं- सार नहीं हो सक्ता अर्थात् नहीं है इस हेतुसे कि, आ- त्मा गुणातीत है अर्थात् गुणसे रहित है ॥ ४५ ॥
प्रथमपटलः । ( १७ ) मूलम्-आगमाऽपायिनोऽनित्यानाश्यत्वेने- श्वरादयः ॥ आत्मबोधेन केनापि शास्त्रा- देतद्विनिश्चितम् ॥ ४६ ॥ टीका-वह शास्त्र जिसमें आत्मबोधका निरूपण किया है उससे निश्चय है कि, इंद्रादि देवताभी जो ईश्वर कहे जाते हैं नित्यभावसे रहित हैं अर्थात् उनकाभी जनन मरण होताहै ॥ ४६ ॥ मूलम्-यथा वातवशात्सिन्धावुत्पन्नाः फेन- बुद्बुदाः ॥ तथात्मनि समुद्भूतं संसारं क्षणभंगुरम् ॥ ४७ ॥ टीका-जैसे वायुकी उपाधिसे समुद्रमें फेन और बुद्बुदे उत्पन्न होते हैं क्षणभरमें फिर उसीमें लय हो- जाते हैं तैसेही आत्मासे संसार मायाकी उपाधिसे क्षण- भंगी उत्पन्न होताहै फिर उसीमें लय होजाताहै ॥ ४७ ॥ मूलम्-अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदो न भासते ॥ द्विधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमत्वे पर्यवस्यति ॥ ४८ ॥ टीका-परमात्माका संसारसे सदा अभेद है और किसी वस्तुमें भेद नहीं है एक दो तीन ऐसा जो वस्तु का भेद जानपड़ताहै वह भ्रमका कारण है ॥ ४८ ॥
( १८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-यद्भूतं यच्च भाव्यं वै मूर्तामूर्त्तं तथैव च ॥ सर्वमेव जगदिदं विवृतं परमा- त्मनि ॥ ४९ ॥ टीका- जो भया है और जो होगा मूर्त्तिमान् वा अमूर्त्तिमान् यह सब जगत् आत्मासे मिलाहै अर्थात् उससे भिन्न नहीं है ॥ ४९ ॥ मूलम्-कल्पकैः कल्पिता विद्या मिथ्या जाता मृषात्मिका ॥ एतन्मूलं जगदिदं कथं सत्यं भविष्यति ॥ ५० ॥ टीका-यह संसार मिथ्याभूत अविद्याकल्पनासे कल्पित भया है बडे आश्चर्यकी बात है कि, जिसकी जड मिथ्या है वह आप कब सत्य होसक्ता है अर्थात् सब झूठ है ॥ ५० ॥ मूलं-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम् ॥ तस्मात्सर्वं परित्यज्य चैतन्यं त समाश्रयेत् ॥ ५१ ॥ टीका-केवल एक चैतन्य ब्रह्मसे जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज आदि सकल चराचर संसार उत्पन्न भया है इस हेतुस सबको त्यागिके केवल उसी एक
प्रथमपटलः । (१९) चैतन्य आत्माके आसरे होना उचित है क्यों कि वही चैतन्य सबका कारण है ॥५१॥ मूलम्-घटस्याभ्यंतरे बाह्ये यथाकाशं प्रव- र्तते ॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्तते ॥ ५२ ॥ टीका-जैसे घटके भीतर बाहर आकाश व्याप्त है तैसेही इस ब्रह्माण्डके भीतर बाहर आत्मा परिपूर्ण व्याप्त है ॥ ५२ ॥ मूलम्-सततं सर्वभूतेषु यथाकाशं प्रवर्तते॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्त- ते ॥ ५३ ॥ वर्तते सर्वभूतेषु यथाकाशं स- मंततः ॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये कार्यवर्गेषु नित्यशः ॥ ५४ ॥ टीका-जिसप्रकार आकाश सब चराचरमें व्याप्त है उसीतरह आत्माभी इस जगत्में व्याप्त है अर्थात् आका- शवत् सब वस्तुमें आत्मा परिपूर्ण व्याप्त है॥५३॥ ५४॥ मूलम्-असंलग्नं यथाकाशं मिथ्याभूतेषु पं चसु ॥ असंलग्नस्तथाऽत्मा तु कार्यवर्गेषु नान्यथा ॥ ५५ ॥
( २० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जिसतरह आकाश सब वस्तुमें मिला है और सबसे अलग है उसीतरह परमात्मा सब वस्तु चराचरमें व्याप्त है और सबसे अलग है ॥ ५५ ॥ मूलम्-ईश्वरादिजगत्सर्वमात्मव्याप्यं सम- न्ततः ॥ एकोऽस्ति सच्चिदानंदः पूर्णो द्वैतविवर्जितः ॥ ५६ ॥ टीका-ब्रह्मा आदि सब जगत्में वही एक आत्मा परि- पूर्ण व्याप्त है वह एक सच्चिदानन्दपरिपूर्ण द्वैतरहित है अर्थात् दूसरा कुछ नहीं है ॥ ५६ ॥ मूलम्-यस्मात्प्रकाशको नास्ति स्वप्रकाशो भवेत्ततः ॥ स्वप्रकाशो यतस्तस्मादात्मा ज्योतिःस्वरूपकः ॥ ५७ ॥ टीका-जिसका कोई प्रकाशक नहीं है वह आपही प्रकाशमान है जो आपही प्रकाशमान है वह आत्मा ज्योतिःस्वरूप है ॥ ५७ ॥ मूलम्-अवच्छिन्नो यतो नास्ति देशकाल- स्वरूपतः ॥ आत्मनः सर्वथा तस्मा- दात्मा पूर्णो भवेत्खलु ॥ ५८ ॥ टीका-देश करके वा कालके प्रमाणसे वह परि- च्छिन्न नहीं है अर्थात् उसका इयत्तापरिमाण नहीं है न
प्रथमपटलः । (२१) उसमें कालका नियम है इस हेतुसे आत्मा सर्वथा निश्चय परिपूर्ण है ॥ ५८ ॥ मूलम्-यस्मान्न विद्यते नाशः पंचभूतैर्वृथा- त्मकैः॥ तस्मादात्मा भवेन्नित्यस्तन्नाशो न भवेत्खलु ॥ ५९॥ टीका-यह जो मिथ्या पंचभूत हैं इनसे उसका नाश नहीं है इस कारणसे आत्मा नित्य है और यह निश्चय है कि उसका कभी नाश नहीं होता ॥ ५९ ॥ मूलम्-यस्मात्तदन्यो नास्तीह तस्मादेकोऽ- स्ति सर्वदा॥यस्मात्तदन्यो मिथ्या स्या- दात्मा सत्यो भवेत्खलु ॥६० ॥ टीका-जब दूसरा कुछ नहीं है तो एक वही सर्वदा अद्वैत है जब उसके सिवाय अर्थात् उससे अन्य सब मिथ्या है तो वही एक शुद्ध आत्मा सत्य है ॥ ६० ॥ मूलम्-अविद्याभूते संसारे दुःखनाशे सुखं यतः ॥ ज्ञानादाद्यंतशून्यं स्यात्तस्मा- दात्मा भवेत्सुखम् ॥ ६१ ॥ टीका-यह संसार अविद्यासे उत्पन्न भया है इस- में दुःखका नाश होनेपर सुख होता है और ज्ञानसे
१. प्रथम पटल: अद्वैत ज्ञान, सृष्टि-क्रम व माया विचार
( २२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । दुःखका आदि अंत शून्य है इस हेतुसे निश्चय आत्मा सुखस्वरूप है ॥ ६१ ॥ मूलम्-यस्मान्नाशितमज्ञानं ज्ञानेन विश्व- कारणम् ॥ तस्मादात्मा भवेज्ज्ञानं ज्ञानं तस्मात्सनातनम् ॥ ६२ ॥ टीका-जिसकरके अज्ञान नाश होताहै और यह जान पडताहै कि अज्ञानही संसारका कारण है सोई आत्मज्ञान है और ज्ञानही नित्य है ॥ ६२ ॥ मूलम्-कालतो विविधं विश्वं यदा चैव भवे- दिदम् ॥ तदेकोऽस्ति स एवात्मा कल्प- नापथवर्जितः ॥ ६३ ॥ टीका-काल पायके अनेक प्रकारका संसार उत्पन्न होताहै, सो वह एक आत्मा है वह कल्पनापथवर्जित है अर्थात् कल्पना नहीं होसक्ती ॥ ६३ ॥ मूलम्-बाह्यानि सर्वभूतानि विनाशं यान्ति कालतः ॥ यतो वाचो निवर्त्तन्ते आत्मा द्वैतविवर्जितः ॥ ६४ ॥ टीका-आत्मासे जो अतिरिक्त वस्तु उत्पन्न है वह काल पायके नाश होजाती हैं आत्मा द्वैतरहित ॰ है,
प्रथमपटलः । ( २३ ) अर्थात् एक है इसका वर्णन नहीं होसक्ता तात्पर्य यह है कि यावत् वस्तु उत्पन्न होती है उसको काल खाजा- ताहै परन्तु आत्मामें कालकाभी नाश होजाताहै ॥६४॥ मूलम्--न खं वायुर्न चाग्निश्च न जलं पृथिवी न च ॥ नैतत्कार्यं नेश्वरादि पूर्णैकात्मा भवेत्खलु ॥ ६५ ॥ टीका-वह आकाश नहीं है इस हेतुसे कि उसमें शब्द नहीं है वायु नहीं है क्यों कि उसमें स्पर्श नहीं है अग्नि नहीं है काहेसे कि उसमें तेजभाव नहीं है जल नहीं है क्यों कि उसमें रस नहीं है वह पृथिवी नहीं है क्यों कि गन्धरहित है वह कार्य नहीं है क्यों कि उसका कारण नहीं है वह ब्रह्मा इंद्र आदि ईश्वर नहीं है इस हेतुसे कि उसका नाश नहीं होता अर्थात् वह आत्मा न आकाश न वायु न अग्नि न जल न पृथ्वी कुछ नहीं है निश्चय केवल एक परिपूर्णब्रह्म है ॥ ६५ ॥ मूलम्--आत्मानमात्मनो योगी पश्यत्या- त्मनि निश्चितम्॥ सर्वसंकल्पसंन्यासी त्यक्तमिथ्याभवग्रहः ॥ ६६ ॥ टीका-यह मिथ्यासंसाररूपी गृहको त्यागके सर्व