भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 23

प्रथमपटलः । (१९) चैतन्य आत्माके आसरे होना उचित है क्यों कि वही चैतन्य सबका कारण है ॥५१॥ मूलम्-घटस्याभ्यंतरे बाह्ये यथाकाशं प्रव- र्तते ॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्तते ॥ ५२ ॥ टीका-जैसे घटके भीतर बाहर आकाश व्याप्त है तैसेही इस ब्रह्माण्डके भीतर बाहर आत्मा परिपूर्ण व्याप्त है ॥ ५२ ॥ मूलम्-सततं सर्वभूतेषु यथाकाशं प्रवर्तते॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्त- ते ॥ ५३ ॥ वर्तते सर्वभूतेषु यथाकाशं स- मंततः ॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये कार्यवर्गेषु नित्यशः ॥ ५४ ॥ टीका-जिसप्रकार आकाश सब चराचरमें व्याप्त है उसीतरह आत्माभी इस जगत्में व्याप्त है अर्थात् आका- शवत् सब वस्तुमें आत्मा परिपूर्ण व्याप्त है॥५३॥ ५४॥ मूलम्-असंलग्नं यथाकाशं मिथ्याभूतेषु पं चसु ॥ असंलग्नस्तथाऽत्मा तु कार्यवर्गेषु नान्यथा ॥ ५५ ॥