भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

( १६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ...दृष्टे रोगिणा त्वयम्॥ शुद्धज्ञानात्तथाऽ- ज्ञाननाशादात्मा तथा कृतः ॥ ४४ ॥ टीका-जैसे मनुष्यको कवलकी व्याधि अर्थात् पित्तादिकके दोषसे सब वस्तु निश्चय पीतवर्ण देख पड़ती हैं उसी प्रकार अज्ञानरूपी दोषसे शुद्ध आत्मा नहीं प्रतीत होताहै परन्तु यह झूठा संसार देख पड़ता है ऐसा अज्ञान बड़े कष्टसे दूर होताहै जैसे पित्तादिक दोषके नाश होनेसे फिर यथार्थ देखपड़ता है उसी प्रकार अज्ञान दूर होनेसे शुद्धब्रह्म निर्विकार जानप- डता है तात्पर्य यह है कि, मनुष्यके पीछे एक अज्ञान की व्याधि बहुत बडी लगी है इसकी औषधि आत्म- ज्ञान है यह बात निश्चय है कि, व्याधि बिना औषधिके दूर नहीं होती ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ मूलम्-कालत्रयेऽपिन यथा रज्जुःसर्पो भवे- दिति ॥ तथात्मा न भवेद्विश्वं गुणातीतो निरञ्जनः ॥ ४५ ॥ टीका-जिस तरह रस्सी तीनों कालमें सर्प नहीं हो सकती उसी तरह आत्माभी तीनों कालमें कदापि सं- सार नहीं हो सक्ता अर्थात् नहीं है इस हेतुसे कि, आ- त्मा गुणातीत है अर्थात् गुणसे रहित है ॥ ४५ ॥