शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । ( १७ ) मूलम्-आगमाऽपायिनोऽनित्यानाश्यत्वेने- श्वरादयः ॥ आत्मबोधेन केनापि शास्त्रा- देतद्विनिश्चितम् ॥ ४६ ॥ टीका-वह शास्त्र जिसमें आत्मबोधका निरूपण किया है उससे निश्चय है कि, इंद्रादि देवताभी जो ईश्वर कहे जाते हैं नित्यभावसे रहित हैं अर्थात् उनकाभी जनन मरण होताहै ॥ ४६ ॥ मूलम्-यथा वातवशात्सिन्धावुत्पन्नाः फेन- बुद्बुदाः ॥ तथात्मनि समुद्भूतं संसारं क्षणभंगुरम् ॥ ४७ ॥ टीका-जैसे वायुकी उपाधिसे समुद्रमें फेन और बुद्बुदे उत्पन्न होते हैं क्षणभरमें फिर उसीमें लय हो- जाते हैं तैसेही आत्मासे संसार मायाकी उपाधिसे क्षण- भंगी उत्पन्न होताहै फिर उसीमें लय होजाताहै ॥ ४७ ॥ मूलम्-अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदो न भासते ॥ द्विधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमत्वे पर्यवस्यति ॥ ४८ ॥ टीका-परमात्माका संसारसे सदा अभेद है और किसी वस्तुमें भेद नहीं है एक दो तीन ऐसा जो वस्तु का भेद जानपड़ताहै वह भ्रमका कारण है ॥ ४८ ॥