शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । (१५) टीका-रस्सीमें सर्पकी भ्रान्ति और सीपीमें चाँदीकी भ्रान्ति होतीहै ॥३८॥उसी प्रकार शुद्धब्रह्ममें संसारकी झूठी भ्रान्ति होती है रस्सीके ज्ञान होनेसे झूठे सर्पका अभाव होजाता है॥३९॥ उसी तरह आत्मज्ञान होनेसे यह संसार नहीं रहजाता सीपीकोभी अच्छी तरह निश्चय जानलेनेसे चाँदीकी भ्रांति दूर होती है ॥ ४० ॥ मूलम्-जगद्भ्रान्तिरियं याति चात्मज्ञानाद्य- था तथा ॥ यथा रज्जूरगभ्रान्तिर्भवेद्भे- दवशाज्जगत् ॥ ४१ ॥ तथा जगदिदं भ्रांतिरध्यासकल्पनाज्जगत् ॥ आत्मज्ञा- नाद्यथा नास्ति रज्जुज्ञानाद्भुजङ्गमः ॥४२॥ टीका-वैसेही आत्मज्ञान होनेसे जगत्की भ्रान्ति दूर होती है जैसे रस्सीमें सर्पकी भ्रांति होतीहै ॥ ४१ ॥ उसी तरह आत्मामें अध्यास कल्पनामात्र जगत्की भ्रांति है रज्जुवत् ज्ञान होनेसे फिर जगत्का तीनों कालसे अभाव हो जाताहै ॥ ४२ ॥ मूलम्-यथा दोषवशाच्छुक्लःपीतोभवति ना- न्यथा ॥ अज्ञानदोषादात्मापि जगद्भवति दुस्त्यजम् ॥ ४३ ॥ दोषनाशे यथा शुक्लो