शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
प्रथमपटलः । (१५) टीका-रस्सीमें सर्पकी भ्रान्ति और सीपीमें चाँदीकी भ्रान्ति होतीहै ॥३८॥उसी प्रकार शुद्धब्रह्ममें संसारकी झूठी भ्रान्ति होती है रस्सीके ज्ञान होनेसे झूठे सर्पका अभाव होजाता है॥३९॥ उसी तरह आत्मज्ञान होनेसे यह संसार नहीं रहजाता सीपीकोभी अच्छी तरह निश्चय जानलेनेसे चाँदीकी भ्रांति दूर होती है ॥ ४० ॥ मूलम्-जगद्भ्रान्तिरियं याति चात्मज्ञानाद्य- था तथा ॥ यथा रज्जूरगभ्रान्तिर्भवेद्भे- दवशाज्जगत् ॥ ४१ ॥ तथा जगदिदं भ्रांतिरध्यासकल्पनाज्जगत् ॥ आत्मज्ञा- नाद्यथा नास्ति रज्जुज्ञानाद्भुजङ्गमः ॥४२॥ टीका-वैसेही आत्मज्ञान होनेसे जगत्की भ्रान्ति दूर होती है जैसे रस्सीमें सर्पकी भ्रांति होतीहै ॥ ४१ ॥ उसी तरह आत्मामें अध्यास कल्पनामात्र जगत्की भ्रांति है रज्जुवत् ज्ञान होनेसे फिर जगत्का तीनों कालसे अभाव हो जाताहै ॥ ४२ ॥ मूलम्-यथा दोषवशाच्छुक्लःपीतोभवति ना- न्यथा ॥ अज्ञानदोषादात्मापि जगद्भवति दुस्त्यजम् ॥ ४३ ॥ दोषनाशे यथा शुक्लो
( १६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ...दृष्टे रोगिणा त्वयम्॥ शुद्धज्ञानात्तथाऽ- ज्ञाननाशादात्मा तथा कृतः ॥ ४४ ॥ टीका-जैसे मनुष्यको कवलकी व्याधि अर्थात् पित्तादिकके दोषसे सब वस्तु निश्चय पीतवर्ण देख पड़ती हैं उसी प्रकार अज्ञानरूपी दोषसे शुद्ध आत्मा नहीं प्रतीत होताहै परन्तु यह झूठा संसार देख पड़ता है ऐसा अज्ञान बड़े कष्टसे दूर होताहै जैसे पित्तादिक दोषके नाश होनेसे फिर यथार्थ देखपड़ता है उसी प्रकार अज्ञान दूर होनेसे शुद्धब्रह्म निर्विकार जानप- डता है तात्पर्य यह है कि, मनुष्यके पीछे एक अज्ञान की व्याधि बहुत बडी लगी है इसकी औषधि आत्म- ज्ञान है यह बात निश्चय है कि, व्याधि बिना औषधिके दूर नहीं होती ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ मूलम्-कालत्रयेऽपिन यथा रज्जुःसर्पो भवे- दिति ॥ तथात्मा न भवेद्विश्वं गुणातीतो निरञ्जनः ॥ ४५ ॥ टीका-जिस तरह रस्सी तीनों कालमें सर्प नहीं हो सकती उसी तरह आत्माभी तीनों कालमें कदापि सं- सार नहीं हो सक्ता अर्थात् नहीं है इस हेतुसे कि, आ- त्मा गुणातीत है अर्थात् गुणसे रहित है ॥ ४५ ॥
प्रथमपटलः । ( १७ ) मूलम्-आगमाऽपायिनोऽनित्यानाश्यत्वेने- श्वरादयः ॥ आत्मबोधेन केनापि शास्त्रा- देतद्विनिश्चितम् ॥ ४६ ॥ टीका-वह शास्त्र जिसमें आत्मबोधका निरूपण किया है उससे निश्चय है कि, इंद्रादि देवताभी जो ईश्वर कहे जाते हैं नित्यभावसे रहित हैं अर्थात् उनकाभी जनन मरण होताहै ॥ ४६ ॥ मूलम्-यथा वातवशात्सिन्धावुत्पन्नाः फेन- बुद्बुदाः ॥ तथात्मनि समुद्भूतं संसारं क्षणभंगुरम् ॥ ४७ ॥ टीका-जैसे वायुकी उपाधिसे समुद्रमें फेन और बुद्बुदे उत्पन्न होते हैं क्षणभरमें फिर उसीमें लय हो- जाते हैं तैसेही आत्मासे संसार मायाकी उपाधिसे क्षण- भंगी उत्पन्न होताहै फिर उसीमें लय होजाताहै ॥ ४७ ॥ मूलम्-अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदो न भासते ॥ द्विधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमत्वे पर्यवस्यति ॥ ४८ ॥ टीका-परमात्माका संसारसे सदा अभेद है और किसी वस्तुमें भेद नहीं है एक दो तीन ऐसा जो वस्तु का भेद जानपड़ताहै वह भ्रमका कारण है ॥ ४८ ॥
( १८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-यद्भूतं यच्च भाव्यं वै मूर्तामूर्त्तं तथैव च ॥ सर्वमेव जगदिदं विवृतं परमा- त्मनि ॥ ४९ ॥ टीका- जो भया है और जो होगा मूर्त्तिमान् वा अमूर्त्तिमान् यह सब जगत् आत्मासे मिलाहै अर्थात् उससे भिन्न नहीं है ॥ ४९ ॥ मूलम्-कल्पकैः कल्पिता विद्या मिथ्या जाता मृषात्मिका ॥ एतन्मूलं जगदिदं कथं सत्यं भविष्यति ॥ ५० ॥ टीका-यह संसार मिथ्याभूत अविद्याकल्पनासे कल्पित भया है बडे आश्चर्यकी बात है कि, जिसकी जड मिथ्या है वह आप कब सत्य होसक्ता है अर्थात् सब झूठ है ॥ ५० ॥ मूलं-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम् ॥ तस्मात्सर्वं परित्यज्य चैतन्यं त समाश्रयेत् ॥ ५१ ॥ टीका-केवल एक चैतन्य ब्रह्मसे जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज आदि सकल चराचर संसार उत्पन्न भया है इस हेतुस सबको त्यागिके केवल उसी एक
प्रथमपटलः । (१९) चैतन्य आत्माके आसरे होना उचित है क्यों कि वही चैतन्य सबका कारण है ॥५१॥ मूलम्-घटस्याभ्यंतरे बाह्ये यथाकाशं प्रव- र्तते ॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्तते ॥ ५२ ॥ टीका-जैसे घटके भीतर बाहर आकाश व्याप्त है तैसेही इस ब्रह्माण्डके भीतर बाहर आत्मा परिपूर्ण व्याप्त है ॥ ५२ ॥ मूलम्-सततं सर्वभूतेषु यथाकाशं प्रवर्तते॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये ब्रह्मांडस्य प्रवर्त- ते ॥ ५३ ॥ वर्तते सर्वभूतेषु यथाकाशं स- मंततः ॥ तथात्माभ्यंतरे बाह्ये कार्यवर्गेषु नित्यशः ॥ ५४ ॥ टीका-जिसप्रकार आकाश सब चराचरमें व्याप्त है उसीतरह आत्माभी इस जगत्में व्याप्त है अर्थात् आका- शवत् सब वस्तुमें आत्मा परिपूर्ण व्याप्त है॥५३॥ ५४॥ मूलम्-असंलग्नं यथाकाशं मिथ्याभूतेषु पं चसु ॥ असंलग्नस्तथाऽत्मा तु कार्यवर्गेषु नान्यथा ॥ ५५ ॥
( २० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जिसतरह आकाश सब वस्तुमें मिला है और सबसे अलग है उसीतरह परमात्मा सब वस्तु चराचरमें व्याप्त है और सबसे अलग है ॥ ५५ ॥ मूलम्-ईश्वरादिजगत्सर्वमात्मव्याप्यं सम- न्ततः ॥ एकोऽस्ति सच्चिदानंदः पूर्णो द्वैतविवर्जितः ॥ ५६ ॥ टीका-ब्रह्मा आदि सब जगत्में वही एक आत्मा परि- पूर्ण व्याप्त है वह एक सच्चिदानन्दपरिपूर्ण द्वैतरहित है अर्थात् दूसरा कुछ नहीं है ॥ ५६ ॥ मूलम्-यस्मात्प्रकाशको नास्ति स्वप्रकाशो भवेत्ततः ॥ स्वप्रकाशो यतस्तस्मादात्मा ज्योतिःस्वरूपकः ॥ ५७ ॥ टीका-जिसका कोई प्रकाशक नहीं है वह आपही प्रकाशमान है जो आपही प्रकाशमान है वह आत्मा ज्योतिःस्वरूप है ॥ ५७ ॥ मूलम्-अवच्छिन्नो यतो नास्ति देशकाल- स्वरूपतः ॥ आत्मनः सर्वथा तस्मा- दात्मा पूर्णो भवेत्खलु ॥ ५८ ॥ टीका-देश करके वा कालके प्रमाणसे वह परि- च्छिन्न नहीं है अर्थात् उसका इयत्तापरिमाण नहीं है न
प्रथमपटलः । (२१) उसमें कालका नियम है इस हेतुसे आत्मा सर्वथा निश्चय परिपूर्ण है ॥ ५८ ॥ मूलम्-यस्मान्न विद्यते नाशः पंचभूतैर्वृथा- त्मकैः॥ तस्मादात्मा भवेन्नित्यस्तन्नाशो न भवेत्खलु ॥ ५९॥ टीका-यह जो मिथ्या पंचभूत हैं इनसे उसका नाश नहीं है इस कारणसे आत्मा नित्य है और यह निश्चय है कि उसका कभी नाश नहीं होता ॥ ५९ ॥ मूलम्-यस्मात्तदन्यो नास्तीह तस्मादेकोऽ- स्ति सर्वदा॥यस्मात्तदन्यो मिथ्या स्या- दात्मा सत्यो भवेत्खलु ॥६० ॥ टीका-जब दूसरा कुछ नहीं है तो एक वही सर्वदा अद्वैत है जब उसके सिवाय अर्थात् उससे अन्य सब मिथ्या है तो वही एक शुद्ध आत्मा सत्य है ॥ ६० ॥ मूलम्-अविद्याभूते संसारे दुःखनाशे सुखं यतः ॥ ज्ञानादाद्यंतशून्यं स्यात्तस्मा- दात्मा भवेत्सुखम् ॥ ६१ ॥ टीका-यह संसार अविद्यासे उत्पन्न भया है इस- में दुःखका नाश होनेपर सुख होता है और ज्ञानसे
१. प्रथम पटल: अद्वैत ज्ञान, सृष्टि-क्रम व माया विचार
( २२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । दुःखका आदि अंत शून्य है इस हेतुसे निश्चय आत्मा सुखस्वरूप है ॥ ६१ ॥ मूलम्-यस्मान्नाशितमज्ञानं ज्ञानेन विश्व- कारणम् ॥ तस्मादात्मा भवेज्ज्ञानं ज्ञानं तस्मात्सनातनम् ॥ ६२ ॥ टीका-जिसकरके अज्ञान नाश होताहै और यह जान पडताहै कि अज्ञानही संसारका कारण है सोई आत्मज्ञान है और ज्ञानही नित्य है ॥ ६२ ॥ मूलम्-कालतो विविधं विश्वं यदा चैव भवे- दिदम् ॥ तदेकोऽस्ति स एवात्मा कल्प- नापथवर्जितः ॥ ६३ ॥ टीका-काल पायके अनेक प्रकारका संसार उत्पन्न होताहै, सो वह एक आत्मा है वह कल्पनापथवर्जित है अर्थात् कल्पना नहीं होसक्ती ॥ ६३ ॥ मूलम्-बाह्यानि सर्वभूतानि विनाशं यान्ति कालतः ॥ यतो वाचो निवर्त्तन्ते आत्मा द्वैतविवर्जितः ॥ ६४ ॥ टीका-आत्मासे जो अतिरिक्त वस्तु उत्पन्न है वह काल पायके नाश होजाती हैं आत्मा द्वैतरहित ॰ है,
प्रथमपटलः । ( २३ ) अर्थात् एक है इसका वर्णन नहीं होसक्ता तात्पर्य यह है कि यावत् वस्तु उत्पन्न होती है उसको काल खाजा- ताहै परन्तु आत्मामें कालकाभी नाश होजाताहै ॥६४॥ मूलम्--न खं वायुर्न चाग्निश्च न जलं पृथिवी न च ॥ नैतत्कार्यं नेश्वरादि पूर्णैकात्मा भवेत्खलु ॥ ६५ ॥ टीका-वह आकाश नहीं है इस हेतुसे कि उसमें शब्द नहीं है वायु नहीं है क्यों कि उसमें स्पर्श नहीं है अग्नि नहीं है काहेसे कि उसमें तेजभाव नहीं है जल नहीं है क्यों कि उसमें रस नहीं है वह पृथिवी नहीं है क्यों कि गन्धरहित है वह कार्य नहीं है क्यों कि उसका कारण नहीं है वह ब्रह्मा इंद्र आदि ईश्वर नहीं है इस हेतुसे कि उसका नाश नहीं होता अर्थात् वह आत्मा न आकाश न वायु न अग्नि न जल न पृथ्वी कुछ नहीं है निश्चय केवल एक परिपूर्णब्रह्म है ॥ ६५ ॥ मूलम्--आत्मानमात्मनो योगी पश्यत्या- त्मनि निश्चितम्॥ सर्वसंकल्पसंन्यासी त्यक्तमिथ्याभवग्रहः ॥ ६६ ॥ टीका-यह मिथ्यासंसाररूपी गृहको त्यागके सर्व
( २४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । संकल्पसे रहित होके योगी आत्मासे आत्माको आत्मामें देखता है ॥ ६६ ॥ मूलम्-आत्मनात्मनि चात्मानं दृष्ट्वानन्तं सुखात्मकम्॥ विस्मृत्य विश्वं रमते समा- धेस्तीव्रतस्तथा ॥ ६७ ॥ टीका-संसार विस्मृति करके अर्थात् भुलाके आत्मासे आत्माको आत्मारूप होके देखता और आत्माके आनन्द सुखरूपी तीव्रसमाधिमें योगी रम- ण करता है ॥ ६७ ॥ मूलम्-मायैव विश्वजननी नान्या तत्त्वधिया परा ॥ यदा नाशं समायाति विश्वं नास्ति तदा खलु ॥ ६८ ॥ टीका-माया संसारकी माता है अर्थात् मायासेही संसार उत्पन्न भयाहै यह निश्चय है कि दूसरा हेतु इस जगत्के उत्पत्तिका नहीं है ज्ञान करके इस मायाके नाश होनेसे संसारका अभाव निश्चय जानपडताहै॥६८॥ मूलम्-हेयं सर्वमिदं यस्य मायाविलसितं यतः ॥ ततो न प्रीतिविषयस्तनुवित्तसु- खात्मकः ॥ ६९ ॥
प्रथमपटलः । (२५) टीका-यह झूठा मायाका प्रपंच विषयसुख धन शरीर है इनमें प्रीति करना उचित नहीं है यह सब त्यागनेके योग्य है ॥ ६९ ॥ मूलम्-अरिर्मित्रमुदासीनस्त्रिविधं स्यादिदं जगत् ॥ व्यवहारेषु नियतं दृश्यते नान्यथा पुनः ॥ ७० ॥ टीका-शत्रु मित्र उदासीनता यही तीन प्रकारके व्यवहारका प्रवाह इस संसारमें निश्चय देखपड़ता है॥७०॥ मूलम्-प्रियाप्रियादिभेदस्तु वस्तुषु नियतः स्फुटम् ॥ आत्मोपाधिवशादेवं भवेत्पुत्रा- दि नान्यथा ॥७१॥ मायाविलसितं विश्वं ज्ञात्वैवं श्रुतियुक्तितः ॥ अध्यारोपापवा- दाभ्यां लयं कुर्वन्ति योगिनः ॥ ७२ ॥ टीका-और प्रिय अप्रिय यही दो भेदसे जगत् बँधा है ॥ आत्माके उपाधिसे पिता पुत्रादि होतेहैं यह जगत् मायासे विलसितहै यह श्रुति प्रमाणसे जानके योगी लोग अध्यारोप अपवादसे आत्मामें लय करतेहैं अ- र्थात् शुद्धचैतन्यका मनन करते हैं ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ मूलम्-कर्मजन्यं विश्वमिदं नत्वकर्मणि २
( २६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वेदना ॥ निखिलोपाधिहीनो वै यदा भवति पूरुषः ॥ ७३ ॥ टीका-इस जगत्की स्थिति कर्मसे है अर्थात् सुख दुःख जन्म मरण आदि क्लेशोंका कारण कर्मही है अकर्म होजानेसे फिर कुछ दुःख नहीं है यावत् मायाके उपाधिको जब पुरुष जीतके उससे रहित होजाताहै ॥ ७३ ॥ मूलम्-तदा विजयतेऽखंडज्ञानरूपी निरं- जनः॥ स हि कामयते पुरुषः सृजते च प्रजाः स्वयम् ॥ ७४ ॥ टीका--तब अखंडज्ञानरूपी निरंजनका भान हो- ताहै ॥ आत्मा अपने इच्छासे जगत् सृजता अर्थात् उत्पन्न करता है ॥ ७४ ॥ मूलम्-अविद्या भासते यस्मात्तस्मान्मि- थ्या स्वभावतः॥ शुद्धे ब्रह्मणि संबद्धो विद्यया सहजो भवेत् ॥ ७५ ॥ टीका-यह इच्छा अविद्याका कार्य है अविद्या नाम मिथ्याका है तो जब इच्छाही मिथ्या मायासे उत्पन्न है तो उस इच्छाका कार्य कब सत्य होसक्ताहै तात्पर्य यह है कि, मायाके उपाधिसे आत्माका यह इच्छाभूत
प्रथमपटलः । ( २७ ) संसार मनोराज्यवत् है. जैसे मनुष्यका मनोराज्य मि- थ्या है, उसी प्रकार आत्माका इच्छाभूत यह जगत्भी मिथ्याहै शुद्धब्रह्ममें ज्ञानरूपी विद्याका संबन्ध है ॥७५॥ मूलम्-ब्रह्मतेजोंऽशतो याति तत आभास ते नभः ॥ तस्मात्प्रकाशते वायुर्वायोर- ग्निस्ततो जलम् ॥ ७६ ॥ प्रकाशते ततः पृथ्वी कल्पनेयं स्थिता सति ॥ आकाशा- द्वायुराकाशपवनादग्निसंभवः ॥ ७७ ॥ टीका-उस ब्रह्मके तेजअंशसे आकाश उत्पन्नभया, आकाशसे वायु उत्पन्न भया, वायुसे अग्नि उत्पन्न भया अग्निसे जल भया, जलसे पृथ्बी उत्पन्न भई, यह कल्प- ना है आकाशसे वायु उत्पन्न भया और आकाश वायुसे तेज उत्पन्न भया ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ मूलम्-खवाताग्नेर्जलं व्योमवाताग्निवारि तोमही ॥ खंशब्दलक्षणं वायुश्चंचलः स्प- र्शलक्षणः ॥ ७८ ॥ स्याद्रूपलक्षणं तेजः सलिलं रसलक्षणम् ॥ गन्धलक्षणिका पृथ्बी नान्यथा भवति ध्रुवम् ॥ ७९ ॥
(२८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विशेषगुणाः प्रस्फुरंति यतः शास्त्रादि- निर्णयः ॥ शब्दैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते॥ ८० ॥ तथैव त्रिगुणं तेजो भ- वन्त्यापश्चतुर्गुणाः ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥८१॥ एतत्पंच- गुणा पृथ्वि कल्पकैः कल्प्यतेऽधुना॥ चक्षु- षा गृह्यते रूपं गन्धो घ्राणेन गृह्यते॥८२॥ टीका-और आकाश वायु अग्निसे जल उत्पन्न भया और इन चारोंसे पृथ्वि उत्पन्न भई, शब्दगुण आकाश- काहै और स्पर्श गुण वायुका है, रूपगुण तेजका है, रसगुण जलका है और पृथ्विका गुण गंध है. इन पांच तत्त्वोंमें यह गुण जो ऊपर कहा है विशेष है यह शास्त्रसे निर्णय भयाहै अन्यथा नहीं है निश्चय है कि, आकाशमें एक शब्द गुणहै, वायुमें दो गुण हैं, अग्निमें तीन गुण हैं और जलमें चार गुण हैं, पृथ्विमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, यह पांचों गुण कल्पित हैं नेत्र रूपको ग्रहण करताहै और नासिका गंध ग्रहण करती है ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ ८० ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ मूलम्-रसो रसनयां स्पर्शस्त्वचा संगृह्यते
प्रथमपटलः । ( २९ ) परम्॥श्रोत्रेण गृह्यते शब्दो नियतं भाति नान्यथा ॥ ८३ ॥ टीका-और जिह्वासे रस ग्रहण होताहै और स्पर्श त्वचा अर्थात् शरीरके चर्मसे ग्रहण होताहै वा बोध होताहै और शब्द कर्णसे ग्रहण होता है यह निश्चयहै इसमें अन्यथा नहीं है ॥ ८३ ॥ मूलम्-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम् ॥ अस्तिचेत्कल्पनेयं स्यान्नास्ति चेदस्ति चिन्मयम् ॥ ८४ ॥ टीका-सब जगत् चराचर उसी एक चैतन्यसे उत्पन्न भयाहै यदि संसार सत्य मानाजाय तो इस प्रका- रसे कल्पना भईहै और जो संसारका अभावहै अर्थात् नहीं है तो वही एक चैतन्य आत्माहै और कुछ नहीं है ॥ ८४ ॥ मूलम्-पृथ्वी शीर्णा जले मग्ना जलं मग्नञ्च तेजसि ॥ लीनं वायौ तथा तेजो व्योम्नि वातो लयं ययौ ॥ ८५ ॥ टीका-पृथ्वी जलमें मग्न अर्थात् लय होजाती है जला
( ३० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । अग्निमें लयभावको प्राप्त होताहै और अग्नि वायुमें लय होजाताहै और वायु आकाशमें लीन होजाताहै ॥ ८५ ॥ मूलम्-अविद्यायां महाकाशो लीयते परमे पदे ॥ विक्षेपावरणाशक्तिर्दुरन्ता दुःख- रूपिणी॥८६॥जडरूपा महामाया रजः- सत्त्वतमोगुणा ॥ सा मायावरणाशक्त्या- वृताविज्ञानरूपिणी ॥ ८७॥ टीका-और आकाश अविद्यामें लयभावको प्राप्त होजाताहै और यह अविद्या मायाभी परमपदको पहुँच जाती है अर्थात् आत्मामें लय होजातीहै. तात्पर्य यह है कि, जो उत्पन्न भयाहै उसका अवश्य नाशहै. ईश्वरकी यह दो शक्ति विक्षेप और आवरण हैं, इनका अंत नहींहैं यह महामाया दुःखरूपिणीमें रज, सत्त्व, तम, तीनों गुण हैं समय समयपर इन गुणोंको धारण कर लेतीहैं सो माया आवरणशक्ति ज्ञानको आवृत्त करके अर्थात् छिपाके अज्ञानरूपिणी होजा- तीहै ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ मूलम्-दर्शयेज्जगदाकारं तं विक्षेपस्वभाव- तः॥तमोगुणाधिकाविद्या या सा दुर्गा भवे- त्स्वयम्॥८८॥ईश्वरं तदुपहितं चैतन्यं तद-
प्रथमपटलः । (३१) भूर्भुवम्॥ सत्त्वाधिका च या विद्या लक्ष्मीः स्याद्दिव्यरूपिणी॥८९॥चैतन्यं तदुपहितं विष्णुर्भवति नान्यथा ॥ रजोगुणाधिका विद्या ज्ञेया सा वै सरस्वती ॥ यश्चि- त्स्वरूपो भवति ब्रह्मातदुपधारकः॥९०॥ टीका-और संसारके आकारको देखातीहै यह विक्षेप करना उसका स्वभाव है माया जब तमोगुण धारण करतीहै तब दुर्गारूप होके चैतन्य ईश्वरको उत्पन्न कर- तीहै और जब सतोगुणको धारण करतीहै तब लक्ष्मी रूप होके चैतन्य जो विष्णु हैं उनको उत्पन्न करतीहै जब रजोगुणको धारण करतीहै तब सरस्वतीरूप होके चैतन्य जो ब्रह्मा हैं उनको उत्पन्न करतीहै अर्थात् सबके उत्पत्तिका कारण यही जगन्माता महा- माया है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ ९० ॥ मूलम्-ईशाद्याः सकला देवा दृश्यन्ते पर- मात्मनि ॥ शरीरादिजडं सर्वं सा विद्या तत्तथा तथा॥९१॥एवंरूपेण कल्पन्ते क- ल्पका विश्वसम्भवम्॥तत्त्वात्तत्त्वं भवंती हकल्पनान्येन मोदिता ॥ ९२ ॥
( ३२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हमारे आदि सकल देवता उसी एक परमा- त्मामें देख पड़ते हैं और शरीरआदि सब जड पदार्थ उसी एक विद्या अर्थात् आत्मामें भिन्न भिन्न जान पड़तेहैं इसी तरह बुद्धिमान् लोगोंने संसारके स्थितिकी कल्पना कियाहै कि, तत्त्व अतत्त्व दोनों भयाहै अर्थात् आत्मासेही सब सृष्टिकी उत्पत्ति केवल कल्पनामा- त्रहै और कुछ किसीने कहा नहीं है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ मूलम्-प्रमेयत्वादिरूपेण सर्वं वस्तु प्रका- श्यते॥ तथैव वस्तुनास्त्येव भासको वर्त- कः परः ॥९३॥स्वरूपत्वेन रूपेण स्वरूपं वस्तु भाष्यते ॥ विशेषशब्दोपादाने भेदो भवति नान्यथा ॥ ९४ ॥ टीका-प्रमेयरूप . अर्थात् यावत् वस्तु संसारमें दृश्यमान हैं वह सबके प्रकाशका कारण वही एक आत्मा है उपाधिभेदसे भिन्न भिन्न स्वरूपदे खपड़ता है विशेष करके नामभेदसे भेद है अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों वहीहै और कुछ नहीं है ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ मूलम्-एकः सत्तापूरितानन्दरूपः पूर्णो व्यापी वर्त्तते नास्ति किञ्चित्॥एतज्ज्ञानं
प्रथमपटलः । ( ३३ ) यः करोत्येव नित्यं मुक्तः स स्यान्मृत्युसं- सारदुःखात् ॥ ९५ ॥ टीका-एक सत्तामात्र पूरित आनन्दस्वरूप परि- पूर्ण व्यापी सर्वदा वर्तमानहै और दूसरा कुछ नहीं है ऐसा ज्ञान जिसको है और सर्वदा वह यही मनन कर- ताहै सो मुक्त है अर्थात् संसारके जन्ममरणआदि दुःखसे वह रहित है ॥ ९५ ॥ मूलम्-यस्यारोपापवादाभ्यां यत्र सर्वे लयं गताः॥ स एको वर्तते नान्यत्तच्चितेना- वधार्यते ॥ ९६ ॥ टीका-जहां ज्ञानद्वारा संसारके कार्योंका लय होजाता है अर्थात् उससे अभेद होजाते हैं उसी एक सर्वदा वर्तमान आत्मामें मनको लय करे अर्थात् आत्माकाही ध्यान धारण करे ॥९६॥ मूलम्-पितुरन्नमयात्कोशाज्जायते पूर्वक- र्मणः ॥ शरीरं वै जडं दुःखं स्वप्राग्भोगाय सुन्दरम् ॥ ९७ ॥ टीका-पूर्वकर्मके अनुसार प्राणी पिताके अन्न- मय कोशसे दुःख भोगनेके कारण जड शरीर सुन्दर भोमरूप उत्पन्न होताहै ॥ ९७॥
( ३४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-मांसास्थिस्नायुमज्जादिनिर्मितं भो- गमन्दिरम् ॥ केवलं दुःखभोगाय नाडीसं- ततिगुंफितम् ॥ ९८॥ टीका-मांस अस्थि स्नायु मज्जा आदि नाडियोंसे बँधाहूआ यह भोगमन्दिर अर्थात् शरीर केवल दुःखका कारण है, तात्पर्य यह है कि, ऐसा शरीर जिसके उत्पत्ति स्थितिके स्मरण करनेसे घृणा होती है उसमें व्यर्थ मनु- ष्य मायामें फँसके मोह और अभिमान करताहै ॥९८॥ मूलम्--पारमेष्ठ्यमिदं गात्रं पंचभूतविनि- र्मितम्॥ब्रह्माण्डसंज्ञकं दुःखसुखभोगाय कल्पितम् ॥ ९९ ॥ टीका--यह शरीर ब्रह्माके द्वारा पंचभूतसे निर्मित ब्रह्मांडसंज्ञा सुख दुःख भोगनेके हेतु कल्पितहै ॥९९ ॥ मूलम्--बिन्दुः शिवो रजः शक्तिरुभयोर्मि- लनात्स्वयम् ॥ स्वप्रभूतानि जायन्ते स्वशक्त्या जडरूपया ॥ १०० ॥ टीका-शिवरूप बिन्दु और शक्तिरूप रज इन दो- नोंके संबन्धसे ईश्वरकी शक्ति जडरूपा महामाया अ- पनी प्रभुतास शरीरोंको उत्पन्न करती है ॥ १०० ॥