शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हमारे आदि सकल देवता उसी एक परमा- त्मामें देख पड़ते हैं और शरीरआदि सब जड पदार्थ उसी एक विद्या अर्थात् आत्मामें भिन्न भिन्न जान पड़तेहैं इसी तरह बुद्धिमान् लोगोंने संसारके स्थितिकी कल्पना कियाहै कि, तत्त्व अतत्त्व दोनों भयाहै अर्थात् आत्मासेही सब सृष्टिकी उत्पत्ति केवल कल्पनामा- त्रहै और कुछ किसीने कहा नहीं है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ मूलम्-प्रमेयत्वादिरूपेण सर्वं वस्तु प्रका- श्यते॥ तथैव वस्तुनास्त्येव भासको वर्त- कः परः ॥९३॥स्वरूपत्वेन रूपेण स्वरूपं वस्तु भाष्यते ॥ विशेषशब्दोपादाने भेदो भवति नान्यथा ॥ ९४ ॥ टीका-प्रमेयरूप . अर्थात् यावत् वस्तु संसारमें दृश्यमान हैं वह सबके प्रकाशका कारण वही एक आत्मा है उपाधिभेदसे भिन्न भिन्न स्वरूपदे खपड़ता है विशेष करके नामभेदसे भेद है अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों वहीहै और कुछ नहीं है ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ मूलम्-एकः सत्तापूरितानन्दरूपः पूर्णो व्यापी वर्त्तते नास्ति किञ्चित्॥एतज्ज्ञानं