भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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प्रथमपटलः । ( ३३ ) यः करोत्येव नित्यं मुक्तः स स्यान्मृत्युसं- सारदुःखात् ॥ ९५ ॥ टीका-एक सत्तामात्र पूरित आनन्दस्वरूप परि- पूर्ण व्यापी सर्वदा वर्तमानहै और दूसरा कुछ नहीं है ऐसा ज्ञान जिसको है और सर्वदा वह यही मनन कर- ताहै सो मुक्त है अर्थात् संसारके जन्ममरणआदि दुःखसे वह रहित है ॥ ९५ ॥ मूलम्-यस्यारोपापवादाभ्यां यत्र सर्वे लयं गताः॥ स एको वर्तते नान्यत्तच्चितेना- वधार्यते ॥ ९६ ॥ टीका-जहां ज्ञानद्वारा संसारके कार्योंका लय होजाता है अर्थात् उससे अभेद होजाते हैं उसी एक सर्वदा वर्तमान आत्मामें मनको लय करे अर्थात् आत्माकाही ध्यान धारण करे ॥९६॥ मूलम्-पितुरन्नमयात्कोशाज्जायते पूर्वक- र्मणः ॥ शरीरं वै जडं दुःखं स्वप्राग्भोगाय सुन्दरम् ॥ ९७ ॥ टीका-पूर्वकर्मके अनुसार प्राणी पिताके अन्न- मय कोशसे दुःख भोगनेके कारण जड शरीर सुन्दर भोमरूप उत्पन्न होताहै ॥ ९७॥