शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । (३१) भूर्भुवम्॥ सत्त्वाधिका च या विद्या लक्ष्मीः स्याद्दिव्यरूपिणी॥८९॥चैतन्यं तदुपहितं विष्णुर्भवति नान्यथा ॥ रजोगुणाधिका विद्या ज्ञेया सा वै सरस्वती ॥ यश्चि- त्स्वरूपो भवति ब्रह्मातदुपधारकः॥९०॥ टीका-और संसारके आकारको देखातीहै यह विक्षेप करना उसका स्वभाव है माया जब तमोगुण धारण करतीहै तब दुर्गारूप होके चैतन्य ईश्वरको उत्पन्न कर- तीहै और जब सतोगुणको धारण करतीहै तब लक्ष्मी रूप होके चैतन्य जो विष्णु हैं उनको उत्पन्न करतीहै जब रजोगुणको धारण करतीहै तब सरस्वतीरूप होके चैतन्य जो ब्रह्मा हैं उनको उत्पन्न करतीहै अर्थात् सबके उत्पत्तिका कारण यही जगन्माता महा- माया है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ ९० ॥ मूलम्-ईशाद्याः सकला देवा दृश्यन्ते पर- मात्मनि ॥ शरीरादिजडं सर्वं सा विद्या तत्तथा तथा॥९१॥एवंरूपेण कल्पन्ते क- ल्पका विश्वसम्भवम्॥तत्त्वात्तत्त्वं भवंती हकल्पनान्येन मोदिता ॥ ९२ ॥