शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । अग्निमें लयभावको प्राप्त होताहै और अग्नि वायुमें लय होजाताहै और वायु आकाशमें लीन होजाताहै ॥ ८५ ॥ मूलम्-अविद्यायां महाकाशो लीयते परमे पदे ॥ विक्षेपावरणाशक्तिर्दुरन्ता दुःख- रूपिणी॥८६॥जडरूपा महामाया रजः- सत्त्वतमोगुणा ॥ सा मायावरणाशक्त्या- वृताविज्ञानरूपिणी ॥ ८७॥ टीका-और आकाश अविद्यामें लयभावको प्राप्त होजाताहै और यह अविद्या मायाभी परमपदको पहुँच जाती है अर्थात् आत्मामें लय होजातीहै. तात्पर्य यह है कि, जो उत्पन्न भयाहै उसका अवश्य नाशहै. ईश्वरकी यह दो शक्ति विक्षेप और आवरण हैं, इनका अंत नहींहैं यह महामाया दुःखरूपिणीमें रज, सत्त्व, तम, तीनों गुण हैं समय समयपर इन गुणोंको धारण कर लेतीहैं सो माया आवरणशक्ति ज्ञानको आवृत्त करके अर्थात् छिपाके अज्ञानरूपिणी होजा- तीहै ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ मूलम्-दर्शयेज्जगदाकारं तं विक्षेपस्वभाव- तः॥तमोगुणाधिकाविद्या या सा दुर्गा भवे- त्स्वयम्॥८८॥ईश्वरं तदुपहितं चैतन्यं तद-