शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ
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प्रथमपटलः । ( २९ ) परम्॥श्रोत्रेण गृह्यते शब्दो नियतं भाति नान्यथा ॥ ८३ ॥ टीका-और जिह्वासे रस ग्रहण होताहै और स्पर्श त्वचा अर्थात् शरीरके चर्मसे ग्रहण होताहै वा बोध होताहै और शब्द कर्णसे ग्रहण होता है यह निश्चयहै इसमें अन्यथा नहीं है ॥ ८३ ॥ मूलम्-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम् ॥ अस्तिचेत्कल्पनेयं स्यान्नास्ति चेदस्ति चिन्मयम् ॥ ८४ ॥ टीका-सब जगत् चराचर उसी एक चैतन्यसे उत्पन्न भयाहै यदि संसार सत्य मानाजाय तो इस प्रका- रसे कल्पना भईहै और जो संसारका अभावहै अर्थात् नहीं है तो वही एक चैतन्य आत्माहै और कुछ नहीं है ॥ ८४ ॥ मूलम्-पृथ्वी शीर्णा जले मग्ना जलं मग्नञ्च तेजसि ॥ लीनं वायौ तथा तेजो व्योम्नि वातो लयं ययौ ॥ ८५ ॥ टीका-पृथ्वी जलमें मग्न अर्थात् लय होजाती है जला