शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विशेषगुणाः प्रस्फुरंति यतः शास्त्रादि- निर्णयः ॥ शब्दैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते॥ ८० ॥ तथैव त्रिगुणं तेजो भ- वन्त्यापश्चतुर्गुणाः ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥८१॥ एतत्पंच- गुणा पृथ्वि कल्पकैः कल्प्यतेऽधुना॥ चक्षु- षा गृह्यते रूपं गन्धो घ्राणेन गृह्यते॥८२॥ टीका-और आकाश वायु अग्निसे जल उत्पन्न भया और इन चारोंसे पृथ्वि उत्पन्न भई, शब्दगुण आकाश- काहै और स्पर्श गुण वायुका है, रूपगुण तेजका है, रसगुण जलका है और पृथ्विका गुण गंध है. इन पांच तत्त्वोंमें यह गुण जो ऊपर कहा है विशेष है यह शास्त्रसे निर्णय भयाहै अन्यथा नहीं है निश्चय है कि, आकाशमें एक शब्द गुणहै, वायुमें दो गुण हैं, अग्निमें तीन गुण हैं और जलमें चार गुण हैं, पृथ्विमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, यह पांचों गुण कल्पित हैं नेत्र रूपको ग्रहण करताहै और नासिका गंध ग्रहण करती है ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ ८० ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ मूलम्-रसो रसनयां स्पर्शस्त्वचा संगृह्यते