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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

( ३० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । अग्निमें लयभावको प्राप्त होताहै और अग्नि वायुमें लय होजाताहै और वायु आकाशमें लीन होजाताहै ॥ ८५ ॥ मूलम्-अविद्यायां महाकाशो लीयते परमे पदे ॥ विक्षेपावरणाशक्तिर्दुरन्ता दुःख- रूपिणी॥८६॥जडरूपा महामाया रजः- सत्त्वतमोगुणा ॥ सा मायावरणाशक्त्या- वृताविज्ञानरूपिणी ॥ ८७॥ टीका-और आकाश अविद्यामें लयभावको प्राप्त होजाताहै और यह अविद्या मायाभी परमपदको पहुँच जाती है अर्थात् आत्मामें लय होजातीहै. तात्पर्य यह है कि, जो उत्पन्न भयाहै उसका अवश्य नाशहै. ईश्वरकी यह दो शक्ति विक्षेप और आवरण हैं, इनका अंत नहींहैं यह महामाया दुःखरूपिणीमें रज, सत्त्व, तम, तीनों गुण हैं समय समयपर इन गुणोंको धारण कर लेतीहैं सो माया आवरणशक्ति ज्ञानको आवृत्त करके अर्थात् छिपाके अज्ञानरूपिणी होजा- तीहै ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ मूलम्-दर्शयेज्जगदाकारं तं विक्षेपस्वभाव- तः॥तमोगुणाधिकाविद्या या सा दुर्गा भवे- त्स्वयम्॥८८॥ईश्वरं तदुपहितं चैतन्यं तद-

प्रथमपटलः । (३१) भूर्भुवम्॥ सत्त्वाधिका च या विद्या लक्ष्मीः स्याद्दिव्यरूपिणी॥८९॥चैतन्यं तदुपहितं विष्णुर्भवति नान्यथा ॥ रजोगुणाधिका विद्या ज्ञेया सा वै सरस्वती ॥ यश्चि- त्स्वरूपो भवति ब्रह्मातदुपधारकः॥९०॥ टीका-और संसारके आकारको देखातीहै यह विक्षेप करना उसका स्वभाव है माया जब तमोगुण धारण करतीहै तब दुर्गारूप होके चैतन्य ईश्वरको उत्पन्न कर- तीहै और जब सतोगुणको धारण करतीहै तब लक्ष्मी रूप होके चैतन्य जो विष्णु हैं उनको उत्पन्न करतीहै जब रजोगुणको धारण करतीहै तब सरस्वतीरूप होके चैतन्य जो ब्रह्मा हैं उनको उत्पन्न करतीहै अर्थात् सबके उत्पत्तिका कारण यही जगन्माता महा- माया है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ ९० ॥ मूलम्-ईशाद्याः सकला देवा दृश्यन्ते पर- मात्मनि ॥ शरीरादिजडं सर्वं सा विद्या तत्तथा तथा॥९१॥एवंरूपेण कल्पन्ते क- ल्पका विश्वसम्भवम्॥तत्त्वात्तत्त्वं भवंती हकल्पनान्येन मोदिता ॥ ९२ ॥

( ३२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हमारे आदि सकल देवता उसी एक परमा- त्मामें देख पड़ते हैं और शरीरआदि सब जड पदार्थ उसी एक विद्या अर्थात् आत्मामें भिन्न भिन्न जान पड़तेहैं इसी तरह बुद्धिमान् लोगोंने संसारके स्थितिकी कल्पना कियाहै कि, तत्त्व अतत्त्व दोनों भयाहै अर्थात् आत्मासेही सब सृष्टिकी उत्पत्ति केवल कल्पनामा- त्रहै और कुछ किसीने कहा नहीं है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ मूलम्-प्रमेयत्वादिरूपेण सर्वं वस्तु प्रका- श्यते॥ तथैव वस्तुनास्त्येव भासको वर्त- कः परः ॥९३॥स्वरूपत्वेन रूपेण स्वरूपं वस्तु भाष्यते ॥ विशेषशब्दोपादाने भेदो भवति नान्यथा ॥ ९४ ॥ टीका-प्रमेयरूप . अर्थात् यावत् वस्तु संसारमें दृश्यमान हैं वह सबके प्रकाशका कारण वही एक आत्मा है उपाधिभेदसे भिन्न भिन्न स्वरूपदे खपड़ता है विशेष करके नामभेदसे भेद है अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों वहीहै और कुछ नहीं है ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ मूलम्-एकः सत्तापूरितानन्दरूपः पूर्णो व्यापी वर्त्तते नास्ति किञ्चित्॥एतज्ज्ञानं

प्रथमपटलः । ( ३३ ) यः करोत्येव नित्यं मुक्तः स स्यान्मृत्युसं- सारदुःखात् ॥ ९५ ॥ टीका-एक सत्तामात्र पूरित आनन्दस्वरूप परि- पूर्ण व्यापी सर्वदा वर्तमानहै और दूसरा कुछ नहीं है ऐसा ज्ञान जिसको है और सर्वदा वह यही मनन कर- ताहै सो मुक्त है अर्थात् संसारके जन्ममरणआदि दुःखसे वह रहित है ॥ ९५ ॥ मूलम्-यस्यारोपापवादाभ्यां यत्र सर्वे लयं गताः॥ स एको वर्तते नान्यत्तच्चितेना- वधार्यते ॥ ९६ ॥ टीका-जहां ज्ञानद्वारा संसारके कार्योंका लय होजाता है अर्थात् उससे अभेद होजाते हैं उसी एक सर्वदा वर्तमान आत्मामें मनको लय करे अर्थात् आत्माकाही ध्यान धारण करे ॥९६॥ मूलम्-पितुरन्नमयात्कोशाज्जायते पूर्वक- र्मणः ॥ शरीरं वै जडं दुःखं स्वप्राग्भोगाय सुन्दरम् ॥ ९७ ॥ टीका-पूर्वकर्मके अनुसार प्राणी पिताके अन्न- मय कोशसे दुःख भोगनेके कारण जड शरीर सुन्दर भोमरूप उत्पन्न होताहै ॥ ९७॥

( ३४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-मांसास्थिस्नायुमज्जादिनिर्मितं भो- गमन्दिरम् ॥ केवलं दुःखभोगाय नाडीसं- ततिगुंफितम् ॥ ९८॥ टीका-मांस अस्थि स्नायु मज्जा आदि नाडियोंसे बँधाहूआ यह भोगमन्दिर अर्थात् शरीर केवल दुःखका कारण है, तात्पर्य यह है कि, ऐसा शरीर जिसके उत्पत्ति स्थितिके स्मरण करनेसे घृणा होती है उसमें व्यर्थ मनु- ष्य मायामें फँसके मोह और अभिमान करताहै ॥९८॥ मूलम्--पारमेष्ठ्यमिदं गात्रं पंचभूतविनि- र्मितम्॥ब्रह्माण्डसंज्ञकं दुःखसुखभोगाय कल्पितम् ॥ ९९ ॥ टीका--यह शरीर ब्रह्माके द्वारा पंचभूतसे निर्मित ब्रह्मांडसंज्ञा सुख दुःख भोगनेके हेतु कल्पितहै ॥९९ ॥ मूलम्--बिन्दुः शिवो रजः शक्तिरुभयोर्मि- लनात्स्वयम् ॥ स्वप्रभूतानि जायन्ते स्वशक्त्या जडरूपया ॥ १०० ॥ टीका-शिवरूप बिन्दु और शक्तिरूप रज इन दो- नोंके संबन्धसे ईश्वरकी शक्ति जडरूपा महामाया अ- पनी प्रभुतास शरीरोंको उत्पन्न करती है ॥ १०० ॥

प्रथमपटलः । (३५) मूलम्-तत्पञ्चीकरणात्स्थूलान्यसंख्यानि चराचरम् ॥ ब्रह्मांडस्थानि वस्तूनि यत्र जीवोऽस्तिकर्मभिः ॥ १०१ ॥ तद्भूतपञ्च- कात्सर्व भोगाय जीवसंज्ञिता ॥ १०२ ॥ टीका-उसी पंचीकरणसे अनेक स्थूल वस्तु इस संसारमें चराचर उत्पन्न होती हैं यह जीवभी अपने कर्मके अनुसार भोग भोगनेके हेतु उसी पांच भूतसे जीवसंज्ञा करके प्रगट होता है ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ मूलम्--पूर्वकर्मानुरोधेन करोमि घटनामहं॥ अजडः सर्वभूतान्वै जडस्थित्या भुनक्ति तान् ॥ १०३ ॥ टीका-ईश्वर कहते हैं कि, प्राणीको पूर्व कर्मके अनु- सार हम उत्पन्न करतेहैं और सर्व, भूतोंसे हम अजड अर्थात् भिन्न और अविनाशी हैं परंतु जडरूप होके सब- को हम खाजाते हैं अर्थात् सबका नाश करतेहैं ॥१०३॥ मूलम्-जडात्स्वकर्मभिर्बद्धो जीवाख्यो वि- विधो भवेत् ॥ भोगायोत्पद्यते कर्म ब्रह्मां- डाख्ये पुनः पुनः॥ जीवश्च लीयते भोगाव- साने च स्वकर्मणः ॥ १०४ ॥

३६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जीव अपने कर्ममें बंधके नाना प्रकारके जड शरीर धारण करता है और अपने कर्मके फल भोगनेके हेतु संसारमें वारंवार उत्पन्न होता है और सब कर्मोंके अवसानमें अर्थात् जब ज्ञानद्वारा सब कर्मोंसे रहित होजाता है तब उसी ज्ञानस्वरूप आ- त्मामें लय होजाताहै ॥ १०४ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे लयप्रकरणे भाषाटीकायां प्रथमः पटलः ॥ १ ॥ अथ द्वितीयपटलः । मूलम्-देहेऽस्मिन्वर्तते मेरुःसप्तद्वीपसमन्वि- तः॥सरितःसागराः शैलाःक्षेत्राणि क्षेत्रपा- लकाः॥१॥ऋषयो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥ पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्त- न्ते पीठदेवताः ॥ २ ॥ टीका-प्राणीके इस शरीरमें सप्तद्वीपसहित सुमेरु है और नदी समुद्रआदि पर्वत और क्षेत्र क्षेत्रपाल ऋषि मुनि और सब नक्षत्र ग्रह पुण्यतीर्थ और पीठ देवता आदि सब इसी शरीरमें वर्तमान हैं। तात्पर्य यह है कि, मनुष्य तीर्थोंमें स्नान दर्शनके हेतु भटकता फिरता है, परंतु इस शरीरस्थ तीर्थ और देवताको नहीं जानता न

द्वितीयपटलः । ( ३७ ) मनको शुद्ध करके उनके जाननेमें प्रयास करताहै॥१॥२॥ मूलम्-सृष्टिसंहारकर्त्तारौ भ्रमन्तौ शशि- भास्करौ॥नभो वायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी तथैव च ॥ ३ ॥ टीका-सृष्टिके स्थिति संहारके कर्ता चन्द्रमा और सूर्य इस शरीरमें भ्रमण करते हैं और आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, अर्थात् पांचों तत्त्व सर्वदा शरीरमें वर्तमान रहतेहैं. तात्पर्य यह है कि, सब इसी शरीरमें हैं परंतु विना गुरुकी कृपाके देख नहींपड़ते ॥ ३ ॥ मूलम्-त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वा- णि देहतः ॥ मेरुं संवेष्ट्य सर्वत्र व्यवहारः प्रवर्तते ॥ जानाति यः सर्वमिदं स योगी नात्र संशयः ॥ ४ ॥ टीका-जो त्रैलोक्यमें चराचर वस्तु हैं सो सब इसी शरीरमें मेरुके आश्रय होके सर्वत्र अपने २ व्यवहार को वर्तते हैं जो मनुष्य यह सब जानताहै सो योगी है इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥ मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यव- स्थितः ॥ मेरुशृंगे सुधारश्मिर्बहिरष्टक- लायुतः ॥ ५ ॥

( ३८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।

टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञकहै जिस तरह संसा- रमें सब देश और सुमेरु पर्वतहै उसी तरह शरीरमें मेरु है उसके ऊपर सुधाकर अर्थात् चन्द्रमा आठ क- लासे स्थितहै ॥ ५ ॥ मूलम्-वर्ततेऽहर्निशं सोऽपि सुधांवर्षत्य- धोमुखः ॥ ६॥ ततोऽमृतं द्विधाभूतं याति सूक्ष्मं यथा च वै ॥ इडामार्गेण पुष्ट्यर्थं याति मन्दाकिनीजलम् ॥ पुष्णाति सकलं देहमिडामार्गेण निश्चितम् ॥ ७ ॥ टीका-सोई चन्द्रमा रात्रि दिवस अधोमुख होके अमृतकी वर्षा करते हैं वह अमृत सूक्ष्म दो भाग हो- जाता है सो मन्दाकिनीके जलके समान देहके रक्षार्थ इडा जो वामनाडी है उसके रन्ध्रसे सकल शरीरको पोषण करता है ॥ ६ ॥ ७ ॥ मूलम्-एष पीयूषरश्मिर्हि वामपार्श्वे व्य- वस्थितः ॥ ८ ॥ अपरः शुद्धदुग्धाभो ह- ठात्कर्षति मण्डलात् ॥ रन्ध्रमार्गेण सृ- ष्ट्यर्थं मेरौ संयाति चन्द्रमाः ॥ ९ ॥ टीका-वही सुधाकिरण संयुक्त इडा नाडीकी स्थिति वामभागमें है और शुद्ध दूधके समान मेरुमें चन्द्रम

द्वितीयपटलः । ( ३९ ) प्रसन्नतापूर्वक अपने मण्डलसे इडाके रन्ध्रमार्गसे आ- यके देहीका पोषण करते हैं॥ ८ ॥ ९ ॥ मूलम्-मेरुमूले स्थितः सूर्यः कलाद्वादशसं- युतः॥ दक्षिणे पथि रश्मिभिर्वहत्यूर्ध्वं प्र- जापतिः ॥ १० ॥ टीका-मेरुदण्डके मूलमें अर्थात् नीचे बारह कला- संयुक्त सूर्य स्थित हैं दक्षिणपथ अर्थात् पिङ्गलानाडी द्वारा प्रजापति स्वरूपकी गति ऊपरको है ॥ १० ॥ मूलम्-पीयूषरश्मिनिर्यासं धातूंश्च ग्रसति ध्रुवम् ॥ समीरमण्डले सूर्यो भ्रमते सर्व- विग्रहे ॥ ११ ॥ टीका-सूर्य अमृतधातुको अपने किरण शक्तिसे ग्रास करजातेहैं और वायुमण्डलके साथ सब शरीरमें भ्रमण करतेहैं ॥ ११ ॥ मूलम्-एषा सूर्यपरामूर्तिर्निर्वाणं दक्षिणे प- थि ॥ वहते लग्नयोगेन सृष्टिसंहारका- रकः ॥ १२ ॥ टीका-यह सूर्यकी अपर निर्वाण मूर्ति है अर्थात् पिङ्गलानाडी दक्षिणभागमें स्थितहै सूर्य सृष्टिसंहार करता लग्नयोगसे नाडीद्वारा प्रवाह करतेहैं ॥ १२ ॥

( ४० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-सार्धलक्षत्रयं नाड्यः सन्ति देहान्तरे नृणाम् ॥ प्रधानभूता नाड्यस्तु तासु मु- ख्याश्चतुर्दश ॥ १३ ॥ सुषुम्नेडा पिंगला च गांधारी हस्तिजिह्विका ॥ कुहूः सरस्व- ती पूषा शंखिनी च पयस्विनी ॥१४॥ वा- रुणालम्बुसा चैव विश्वोदरी यशस्विनी ॥ एतासु तिस्रो मुख्याः स्युः पिङ्गलेडा सु- षुम्निका ॥ १५ ॥ टीका-शरीरमें बहुत नाडी हैं परंतु उनमें प्रधान नाडी साढेतीन लक्षहैं उनमेंसे मुख्य यह चौदह ना- डी हैं १ सुषुम्णा २ इडा ३ पिङ्गला ४ गान्धारी ५ हस्ति- जिह्वा ६ कुहू ७ सरस्वती ८ पूषा ९ शंखिनी १० पय- स्विनी ११ वारुणा १२ अलंबुसा १३ विश्वोदरी १४ यश- स्विनी इन चौदहमें भी तीन नाडी मुख्यहैं इडा, पिङ्ग- ला, सुषुम्णा ॥ १३ ॥१४ ॥ १५ ॥ मूलम्-तिसृष्वेका सुषुम्नैव मुख्या सा योगिवल्लभा ॥ अन्यास्तदाश्रयं कृत्वा नाड्यः सन्ति हि देहिनाम् ॥ १६ ॥ टीका-इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा इन तीन नाडियोंमें

द्वितीयपटलः । (४१) भी एकही सुषुम्णा मुख्य है इस कारणसे कि, परमपदकी दाताहै योगी लोगोंको हितकारी है अन्य नाडी उसके आश्रय शरीरमें रहती हैं ॥ १६ ॥ मूलम्--नाड्यस्तु ता अधोवदनाःपद्मतन्तु- निभाः स्थिताः ॥ पृष्ठवंशं समाश्रित्य सोमसूर्याग्निरूपिणी ॥ १७ ॥ टीका-यह तीनों नाडी अधोवदनाहैं अर्थात् नीचेको मुख कमलतन्तुके सदृश है और चन्द्र सूर्य अग्निके समान हैं अर्थात् इडा चन्द्ररूप और पिङ्गला सूर्यरूप और सुषुम्णा अग्निरूप है यह तीनों नाडी मेरुदंडके आश्रय स्थित हैं ॥ १७ ॥ मूलम्-तासां मध्ये गता नाडी चित्रा सा मम वल्लभा ॥ ब्रह्मरन्ध्रञ्च तत्रैव सूक्ष्मा- त्सूक्ष्मतरं शुभम् ॥ १८ ॥ टीका-उन तीनों नाडियोंके मध्यमें जो चित्रा नाडी है वह हमको प्रिय है उसी स्थानमें बहुत सूक्ष्म ब्रह्मरंध्र शोभायमान है ॥ १८ ॥ मूलम्-पञ्चवर्णोज्ज्वला शुद्धा सुषुम्णा मध्यचारिणी ॥ देहस्योपाधिरूपा सा सुषुम्णा मध्यरूपिणी ॥ १९ ॥

( ४२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-वह चित्रानाडी पंचवर्ण अतिउज्ज्वल शुद्ध है और देहके उपाधिका कारणभी वही सुषुम्णान्त- र्गता अर्थात् चित्रा नाडी है. तात्पर्य यह है कि, आत्म- स्वरूप वही है ॥ १९ ॥ मूलम्-दिव्यमार्गमिनं प्रोक्तममृतानन्द- कारकम् ॥ ध्यानमात्रेण योगींद्रो दुरि- तौघं विनाशयेत् ॥ २० ॥ टीका-यह मार्ग बहुत श्रेष्ठ अमृतानन्दकारक मु- क्तिका दाता हमने कहा है जिसके ध्यानमात्रसे योगी लोगोंके पापका समूह नाश होजाताहै ॥ २० ॥ मूलम्--गुदात्तु द्व्यंगुलादूर्ध्वं मेढ्रात्तु द्व्यंगुला- दधः ॥ चतुरंगुलविस्तारमाधारं वर्तते समम् ॥ २१ ॥ टीका-गुदासे दो अंगुल ऊपर और मेढ्रसे दो अं- गुल नीचे मध्यमें चार अंगुल विस्तार आधारपद्म है॥ २१॥ मूलम्-तस्मिन्नाधारपद्मे च कर्णिकायां सु- शोभना ॥ त्रिकोणा वर्त्तते योनिः सर्वतं- त्रेषु गोपिता ॥ २२ ॥ टीका-उस आधारपद्मके कर्णिकामें अर्थात् डंडीमें

द्वितीयपटलः। ( ४३ ) त्रिकोण योनि है यह योनि सब तंत्रों करके गोपित है अर्थात् इसके प्रकाशकरनेकी आज्ञा किसी शास्त्रमें नहीं है ॥ २२ ॥ मूलम्-तत्र विद्युल्लताकारा कुण्डली परदे- वता॥सार्द्धत्रिकरा कुटिला सुषुम्णा मार्ग संस्थिता ॥ २३ ॥ टीका-उसी स्थानमें कुण्डलिनी देवता साढेतीन हात कुटिला अर्थात् टेढी जिसकी प्रभा विद्युतके समान है सुषुम्णाके मार्गमें स्थित है ॥ २३ ॥ मूलम्-जगत्संसृष्टिरूपा सा निर्माणे सत- तोद्यता ॥ वाचामवाच्या वाग्देवी सदा देवैर्नमस्कृता ॥ २४ ॥ टीका-सोई कुण्डलिनी जगत्के बहुत प्रकारसे उत्साहपूर्वक रचना करनेकी रूप है और वाग्देवी है अर्थात् उसीसे वाक्यका उच्चारण होताहै इस कुण्डलि- नी देवीको देवतालोग नमस्कार करते हैं ॥ २४ ॥ मूलम्-इडानाम्नी तु या नाडी वाममार्गे व्यवस्थिता ॥ सुषुम्णायां समाश्लिष्य दक्षनासापुटे गता ॥ २५ ॥ • टीका-जो इडा नाम नाड़ी वामभागमें है वह सु-

( ४४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । षुमणाको आवृत्त करती हुई अर्थात् उससे मिलीहुई नासिकाके दक्षिणद्वारको गई है ॥ २५ ॥ मूलम्-पिङ्गला नाम या नाडी दक्षमार्गे व्यवस्थिता ॥ सुषुम्णा सा समाश्लिष्य वामनासापुटे गता ॥२६ ॥ टीका-दक्षिणमार्गमें जो पिङ्गला नाडी है वह सुषु- म्णाके आसरे होके नासिकाके वामद्वारको गई है॥२६॥ मूलम्-इडापिंगलयोर्मध्ये सुषुम्णा या भ- वेत्खलु ॥ षट्स्थानेषु च षट्शक्तिं षट्- पद्मं योगिनो विदुः ॥ २७ ॥ टीका-इडा पिङ्गलाके मध्यमें सुषुम्णा है इस सुषु- म्णाके छः स्थानमें छः शक्ति हैं इनके नाम यह हैं डा- किनी, हाकिनी, काकिनी, लाकिनी; राकिनी, शाकिनी, और इन्हीं छः स्थानोंमें छः पद्म हैं उनके नाम यह हैं आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा यह अपने ज्ञानसे योगी लोग जानते हैं ॥ २७ ॥ मूलम्-पंचस्थानं सुषुम्णाया नामानि स्युर्बहूनि च ॥ प्रयोजनवशात्तानि ज्ञात- ानीह शास्त्रतः ॥ २८ ॥

द्वितीयपटलः । ( ४५ ) टीका--सुषुम्णाके पांच स्थान हैं उनके नाम बहुत हैं प्रयोजनसे शास्त्रकरके जाना जाताहै ॥ २८ ॥ मूलम्--अन्या याऽस्त्यपरा नाडी मूलाधा- रात्समुत्थिताः॥रसनामेढ्रनयनं पादांगुष्ठे च श्रोत्रकम् ॥ २९ ॥ कुक्षिकक्षांगुष्ठकर्ण सर्वांगं पायुकुक्षिकम्॥लब्ध्वातां वै निव- र्त्तन्ते यथादेशसमुद्भवाः ॥ ३० ॥ टीका--और अन्य नाडी मूलाधारसे उठीहैं और जिह्वा, मेढ्र, नेत्र, पादका अङ्गुष्ठ, कर्ण, कुक्षि, कक्ष, हस्ताङ्गुष्ठ, पायु, उपस्थ, इन सब अङ्गोंमें इनका अन्त भयाहै अर्थात् मूलाधारसे उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें जाके निवृत्त होगई हैं ॥ २९ ॥ ३० ॥ मूलम्--एताभ्य एव नाडीभ्यः शाखोपशा- खतः क्रमात् ॥ सार्धलक्षत्रयं जातं यथा- भागं व्यवस्थितम् ॥३१॥ एता भोगवहा नाड्यो वायुसञ्चारदक्षकाः ॥ ओतप्रोताः सुसं व्याप्य तिष्ठन्त्यस्मिन्कलेवरे ॥ ३२ ॥ टीका-इन्हीं नाडियोंमेंसे शाखोपशाख क्रमसे साढेतीनलक्ष नाडी उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें स्थित हैं यह सब भोगवहानाडी वायुके संचारमें

( ४६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । दक्षहैं ओतप्रोत अर्थात् संयोग वियोगसे इस शरीरमें व्याप्त हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ मूलम्--सूर्य्यमण्डलमध्यस्थः कलाद्वादश- संयुतः॥वस्तिदेशे ज्वलद्वह्निर्वर्तते चान्न- पाचकः॥ ३३ ॥ वैश्वानराग्निरेषो वै मम तेजोंशसम्भवः ॥ करोति विविधं पाकं प्राणिनां देहमास्थितः ॥ ३४ ॥ टीका-द्वादशकलासंयुक्त सूर्यमण्डलके मध्यमें प्रज्वलित अग्नि है सो बस्तिदेशमें अन्नका पाचन करती है वह वैश्वानर अग्नि हमारे तेजसे उत्पन्न है प्राणीके शरीरमें स्थित होकर नाना प्रकारका पाक करती है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ मूलम्-- आयुःप्रदायको वह्निर्बलं पुष्टिं द- दाति सः ॥ शरीरपाटवञ्चापि ध्वस्तरोग समुद्भवः ॥ ३५ ॥ टीका-सो वैश्वानर अग्नि आयु, बल और पुष्टता और शरीरमें कान्तिका देनेवाला है और यावत् रोगोंको नाश करनेवाला है ॥ ३५ ॥ मूलम्-तस्माद्वैश्वानराग्निश्च प्रज्वाल्य वि-

द्वितीयपटलः । ( ४७ ) धिवत्सुधीः ॥ तस्मिन्नन्नं हुनेद्योगी प्रत्य- हं गुरुशिक्षया ॥ ३६ ॥ टीका-इस वैश्वानर अग्निको गुरुके शिक्षापूर्वक प्रज्वलित करके नित्य उसमें अन्नका होम करै अर्थात् भोजन करै ॥ ३६ ॥ मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे स्थानानि स्युर्ब- हूनि च ॥ मयोक्तानि प्रधानानि ज्ञात- व्यानीह शास्त्रके ॥३७॥ नानाप्रकारना- मानि स्थानानि विविधानि च ॥ वर्तन्ते विग्रहे तानि कथितुं नैव शक्यते ॥ ३८॥ टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञक है इसमें बहुत स्थान हैं हमने प्रधान प्रधान स्थान कहे हैं ये शास्त्रसे जाने जाते हैं बहुत प्रकारके स्थान और नाम उन स्थानोंके हैं जो इस शरीरमें वर्तमानहैं उनके वर्णन करनेको हम शक्य नहींहै अर्थात् बहुत विस्तारहै उसके कहनेमें व्यर्थ परिश्रम है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ मूलम्-इत्थं प्रकल्पिते देहे जीवो वसति सर्व्वगः ॥ अनादिवासनामालाऽलंकृतः कर्मशृङ्गलः ॥ ३९ ॥ टीका-इसी तरह शरीर कल्पित है और जीव पूर्व-

( ४८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वासनारूपी बेडीमें फँसके मालाके तरह घूमा करता है ॥ ३९ ॥ मूलम्--नानाविधगुणोपेतः सर्वव्यापारका- रकः ॥ पूर्वार्जितानि कर्माणि भुनक्ति विविधानि च ॥ ४० ॥ टीका-सोई जीव नानाप्रकारके गुण ग्रहण करताहै और संसारमें बहुत प्रकारके व्यापार करताहै यह सब पूर्वार्जित शुभाशुभ कर्मके फल भोगताहै ॥ ४० ॥ मूलम्--यद्यत्संदृश्यते लोके सर्वं तत्कर्मस- म्भवम् ॥ सर्वः कर्मानुसारेण जन्तुर्भोगा- न्भुनक्ति वै ॥ ४१ ॥ टीका-जो जो शुभाशुभ कर्म संसारमें देखपड- ताहै वह सबका आदिकारण कर्मही है प्राणीमात्र अपने कर्मके अनुसार भोग भोगता है ॥ ४१ ॥ मूलम्--ये ये कामादयो दोषाः सुखदुःख- प्रदायकाः॥ ते ते सर्वे प्रवर्तन्ते जीवकर्मा- नुसारतः ॥ ४२ ॥ टीका-जो जो काम क्रोध आदिसे सुख दुःख होताहै सो सब जीवके कर्महीके अनुसार वर्तताहै ॥ ४२ ॥

द्वितीयपटलः । ( ४९ ) मूलम्--पुण्योपरक्तचैतन्ये प्राणान्प्रीणाति केवलम् ॥ बाह्ये पुण्यमयं प्राप्य भोज्यव- स्तु स्वयम्भवेत् ॥ ४३ ॥ टीका-पुण्यकर्मके अनुष्ठान करनेसे प्राणीको सुख होता है और बाह्य वस्तु श्रेष्ठ भोजनआदि नानाप्र- कारकी वस्तु आपही मिल जातीहै ॥ ४३ ॥ मूलम्--ततः कर्मबलात्पुंसः सुखं वा दुःखमे- व च ॥ पापोपरक्तचैतन्यं नैव तिष्ठति नि- श्रितम् ॥४४॥ न तद्भिन्नो भवेत्सोऽपि त- द्भिन्नो न तु किञ्चन ॥ मायोपहितचैत- न्यात्सर्वं वस्तु प्रजायते ॥ ४५ ॥ टीका-यह प्राणी अपने कर्मके बलसे सुख वा दुःख भोगताहै, जीव जब पापमें आसक्त होताहै तब दुःख भोगताहै, फिर उसको सुखलाभ नहीं होता. जीव अपने कर्मके अनुसार सुख वा दुःख भोगताहै इसमें भिन्नता नहीं है अर्थात् कर्त्ता भोक्तामें भेद नहीं. चैतन्य आत्मा जब मायोपहित होताहै तब सब वस्तु-उत्पन्न होताहै ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ मूलम्--यथाकालेपि भोगाय जन्तूनां विवि-