शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयपटलः । ( ३९ ) प्रसन्नतापूर्वक अपने मण्डलसे इडाके रन्ध्रमार्गसे आ- यके देहीका पोषण करते हैं॥ ८ ॥ ९ ॥ मूलम्-मेरुमूले स्थितः सूर्यः कलाद्वादशसं- युतः॥ दक्षिणे पथि रश्मिभिर्वहत्यूर्ध्वं प्र- जापतिः ॥ १० ॥ टीका-मेरुदण्डके मूलमें अर्थात् नीचे बारह कला- संयुक्त सूर्य स्थित हैं दक्षिणपथ अर्थात् पिङ्गलानाडी द्वारा प्रजापति स्वरूपकी गति ऊपरको है ॥ १० ॥ मूलम्-पीयूषरश्मिनिर्यासं धातूंश्च ग्रसति ध्रुवम् ॥ समीरमण्डले सूर्यो भ्रमते सर्व- विग्रहे ॥ ११ ॥ टीका-सूर्य अमृतधातुको अपने किरण शक्तिसे ग्रास करजातेहैं और वायुमण्डलके साथ सब शरीरमें भ्रमण करतेहैं ॥ ११ ॥ मूलम्-एषा सूर्यपरामूर्तिर्निर्वाणं दक्षिणे प- थि ॥ वहते लग्नयोगेन सृष्टिसंहारका- रकः ॥ १२ ॥ टीका-यह सूर्यकी अपर निर्वाण मूर्ति है अर्थात् पिङ्गलानाडी दक्षिणभागमें स्थितहै सूर्य सृष्टिसंहार करता लग्नयोगसे नाडीद्वारा प्रवाह करतेहैं ॥ १२ ॥