शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जीव अपने कर्ममें बंधके नाना प्रकारके जड शरीर धारण करता है और अपने कर्मके फल भोगनेके हेतु संसारमें वारंवार उत्पन्न होता है और सब कर्मोंके अवसानमें अर्थात् जब ज्ञानद्वारा सब कर्मोंसे रहित होजाता है तब उसी ज्ञानस्वरूप आ- त्मामें लय होजाताहै ॥ १०४ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे लयप्रकरणे भाषाटीकायां प्रथमः पटलः ॥ १ ॥ अथ द्वितीयपटलः । मूलम्-देहेऽस्मिन्वर्तते मेरुःसप्तद्वीपसमन्वि- तः॥सरितःसागराः शैलाःक्षेत्राणि क्षेत्रपा- लकाः॥१॥ऋषयो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥ पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्त- न्ते पीठदेवताः ॥ २ ॥ टीका-प्राणीके इस शरीरमें सप्तद्वीपसहित सुमेरु है और नदी समुद्रआदि पर्वत और क्षेत्र क्षेत्रपाल ऋषि मुनि और सब नक्षत्र ग्रह पुण्यतीर्थ और पीठ देवता आदि सब इसी शरीरमें वर्तमान हैं। तात्पर्य यह है कि, मनुष्य तीर्थोंमें स्नान दर्शनके हेतु भटकता फिरता है, परंतु इस शरीरस्थ तीर्थ और देवताको नहीं जानता न