शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयपटलः । ( ३७ ) मनको शुद्ध करके उनके जाननेमें प्रयास करताहै॥१॥२॥ मूलम्-सृष्टिसंहारकर्त्तारौ भ्रमन्तौ शशि- भास्करौ॥नभो वायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी तथैव च ॥ ३ ॥ टीका-सृष्टिके स्थिति संहारके कर्ता चन्द्रमा और सूर्य इस शरीरमें भ्रमण करते हैं और आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, अर्थात् पांचों तत्त्व सर्वदा शरीरमें वर्तमान रहतेहैं. तात्पर्य यह है कि, सब इसी शरीरमें हैं परंतु विना गुरुकी कृपाके देख नहींपड़ते ॥ ३ ॥ मूलम्-त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वा- णि देहतः ॥ मेरुं संवेष्ट्य सर्वत्र व्यवहारः प्रवर्तते ॥ जानाति यः सर्वमिदं स योगी नात्र संशयः ॥ ४ ॥ टीका-जो त्रैलोक्यमें चराचर वस्तु हैं सो सब इसी शरीरमें मेरुके आश्रय होके सर्वत्र अपने २ व्यवहार को वर्तते हैं जो मनुष्य यह सब जानताहै सो योगी है इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥ मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यव- स्थितः ॥ मेरुशृंगे सुधारश्मिर्बहिरष्टक- लायुतः ॥ ५ ॥