भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( ४६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । दक्षहैं ओतप्रोत अर्थात् संयोग वियोगसे इस शरीरमें व्याप्त हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ मूलम्--सूर्य्यमण्डलमध्यस्थः कलाद्वादश- संयुतः॥वस्तिदेशे ज्वलद्वह्निर्वर्तते चान्न- पाचकः॥ ३३ ॥ वैश्वानराग्निरेषो वै मम तेजोंशसम्भवः ॥ करोति विविधं पाकं प्राणिनां देहमास्थितः ॥ ३४ ॥ टीका-द्वादशकलासंयुक्त सूर्यमण्डलके मध्यमें प्रज्वलित अग्नि है सो बस्तिदेशमें अन्नका पाचन करती है वह वैश्वानर अग्नि हमारे तेजसे उत्पन्न है प्राणीके शरीरमें स्थित होकर नाना प्रकारका पाक करती है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ मूलम्-- आयुःप्रदायको वह्निर्बलं पुष्टिं द- दाति सः ॥ शरीरपाटवञ्चापि ध्वस्तरोग समुद्भवः ॥ ३५ ॥ टीका-सो वैश्वानर अग्नि आयु, बल और पुष्टता और शरीरमें कान्तिका देनेवाला है और यावत् रोगोंको नाश करनेवाला है ॥ ३५ ॥ मूलम्-तस्माद्वैश्वानराग्निश्च प्रज्वाल्य वि-

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