भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 216 में से

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द्वितीयपटलः । ( ४५ ) टीका--सुषुम्णाके पांच स्थान हैं उनके नाम बहुत हैं प्रयोजनसे शास्त्रकरके जाना जाताहै ॥ २८ ॥ मूलम्--अन्या याऽस्त्यपरा नाडी मूलाधा- रात्समुत्थिताः॥रसनामेढ्रनयनं पादांगुष्ठे च श्रोत्रकम् ॥ २९ ॥ कुक्षिकक्षांगुष्ठकर्ण सर्वांगं पायुकुक्षिकम्॥लब्ध्वातां वै निव- र्त्तन्ते यथादेशसमुद्भवाः ॥ ३० ॥ टीका--और अन्य नाडी मूलाधारसे उठीहैं और जिह्वा, मेढ्र, नेत्र, पादका अङ्गुष्ठ, कर्ण, कुक्षि, कक्ष, हस्ताङ्गुष्ठ, पायु, उपस्थ, इन सब अङ्गोंमें इनका अन्त भयाहै अर्थात् मूलाधारसे उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें जाके निवृत्त होगई हैं ॥ २९ ॥ ३० ॥ मूलम्--एताभ्य एव नाडीभ्यः शाखोपशा- खतः क्रमात् ॥ सार्धलक्षत्रयं जातं यथा- भागं व्यवस्थितम् ॥३१॥ एता भोगवहा नाड्यो वायुसञ्चारदक्षकाः ॥ ओतप्रोताः सुसं व्याप्य तिष्ठन्त्यस्मिन्कलेवरे ॥ ३२ ॥ टीका-इन्हीं नाडियोंमेंसे शाखोपशाख क्रमसे साढेतीनलक्ष नाडी उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें स्थित हैं यह सब भोगवहानाडी वायुके संचारमें

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