शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयपटलः । ( ४९ ) मूलम्--पुण्योपरक्तचैतन्ये प्राणान्प्रीणाति केवलम् ॥ बाह्ये पुण्यमयं प्राप्य भोज्यव- स्तु स्वयम्भवेत् ॥ ४३ ॥ टीका-पुण्यकर्मके अनुष्ठान करनेसे प्राणीको सुख होता है और बाह्य वस्तु श्रेष्ठ भोजनआदि नानाप्र- कारकी वस्तु आपही मिल जातीहै ॥ ४३ ॥ मूलम्--ततः कर्मबलात्पुंसः सुखं वा दुःखमे- व च ॥ पापोपरक्तचैतन्यं नैव तिष्ठति नि- श्रितम् ॥४४॥ न तद्भिन्नो भवेत्सोऽपि त- द्भिन्नो न तु किञ्चन ॥ मायोपहितचैत- न्यात्सर्वं वस्तु प्रजायते ॥ ४५ ॥ टीका-यह प्राणी अपने कर्मके बलसे सुख वा दुःख भोगताहै, जीव जब पापमें आसक्त होताहै तब दुःख भोगताहै, फिर उसको सुखलाभ नहीं होता. जीव अपने कर्मके अनुसार सुख वा दुःख भोगताहै इसमें भिन्नता नहीं है अर्थात् कर्त्ता भोक्तामें भेद नहीं. चैतन्य आत्मा जब मायोपहित होताहै तब सब वस्तु-उत्पन्न होताहै ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ मूलम्--यथाकालेपि भोगाय जन्तूनां विवि-