भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

( ५० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । धोद्भवः ॥ यथा दोषवशाच्छुक्तौ रजता- रोपणं भवेत् ॥ तथा स्वकर्मदोषार्द्धै ब्रह्म- ण्यारोप्यते जगत् ॥ ४६ ॥ टीका-जैसा काल भोगके हेतु निश्चय रहता है उसमें प्राणी नानाप्रकारसे भोग भोगनेके लिये उत्पन्न होताहै जैसे नेत्रके विकारके कारणसे सीपीमें चाँदीका आरोप होताहै वैसेही अपने कर्मके दोषसे प्राणी ब्र- ह्ममें मिथ्या जगत्का आरोप करताहै ॥ ४६ ॥ मूलम्-सवासनाभ्रमोत्पन्नोन्मूलनातिस- मर्थनम् ॥ उत्पन्नञ्चेदीदृशं स्याज्ज्ञानं मोक्षप्रसाधनम् ॥ ४७ ॥ टीका-वासनासे भ्रम उत्पन्न होताहै जबतक वासनाकी जड नहीं जाती तबतक कदापि भ्रम दूर नहीं होता इसी तरह जब ज्ञान उत्पन्न होताहै तब कुछ नहीं रह जाता इस हेतुसे ज्ञानही मोक्षका साधन है ॥ ४७ ॥ मूलम्-साक्षाद्वैशेषदृष्टिस्तु साक्षात्कारिणि विभ्रमे ॥ करणं नान्यथा युक्त्या सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ४८ ॥ टीका-विशेष करके दृष्टिसे साक्षात् जो देखपड-