भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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द्वितीयपटलः । ( ५१ ) ताहै वही साक्षात् भ्रमका कारणहै अर्थात् इसी साक्षा- त्में मनुष्य फँसाहै मायाके आवरणसे बुद्धि आगे नहीं जाती और दूसरा कारण कुछ नहीं है यह हम सत्य कहते हैं ॥ ४८ ॥ मूलम्-साक्षात्कारिभ्रमे साक्षात्साक्षा- त्कारिणि नाशयेत् ॥ सो हि नास्तीति संसारे भ्रमो नैव निवर्तते ॥ ४९ ॥ टीका-यह साक्षात् घटपट आदिका भ्रम ब्रह्मके प्रत्यक्ष होनेसे नाश होताहै बिना आत्माके प्रत्यक्ष भये ब्रह्म संसारमें नहीं है यह भ्रम निवृत्त नहीं होता ॥ ४९ ॥ मूलम्-मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तु विशेषदर्शना- द्भवेत् ॥ अन्यथा न निवृत्तिः स्याद्दृश्य- ते रजतभ्रमः ॥ ५० ॥ टीका-यह मिथ्या संसारका ज्ञान आत्माका विशे- ष दर्शन होनेसे निवृत्त होता है और किसीप्रकार इस अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती. जैसे सीपीमें चाँदीका भ्रम विना सीपीके निश्चय भये दूर नहीं होता ॥ ५० ॥ मूलम्-यावन्नोत्पद्यते ज्ञानं साक्षात्कारे निरञ्जने ॥ तावत्सर्वाणि भूतानि दृश्य- न्ते विविधानि च ॥ ५१ ॥