शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(५२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जबतक आत्माका साक्षात्कार ज्ञान नहीं होता तबतक सब प्राणी संसार आदि नाना प्रकारके देखपडते हैं ॥ ५१ ॥ मूलम्-यदा कर्मार्जितं देहं निर्वाणे साधनं भवेत् ॥ तदा शरीरवहनं सफलं स्यान्न चान्यथा ॥ ५२ ॥ टीका-जो यह कर्मार्जित शरीर है इससे निर्वाण अर्थात् आत्मज्ञानका साधन होयतब इसका जन्म और स्थिति सुफल है नहीं तो व्यर्थ है. तात्पर्य यह है कि, जिस मनुष्यको आत्मज्ञान नहीं हुआ या इस वि- षयका उसने साधन नहीं किया उसका जन्म केवल माताके दुःख देने और पृथ्वीपर भारके हेतु भया॥५२॥ मूलम्-यादृशी वासना मूला वर्त्तते जीवसं- गिनी ॥ तादृशं वहते जन्तुः कृत्याकृत्य- विधौ भ्रमम् ॥ ५३ ॥ टीका-जैसी वासना जीवके संग रहती है वैसेही प्राणी शुभाशुभ कर्म भ्रमके वश होके करताहै और उ- सी वासनासे उत्पन्न और नाश होता रहताहै ॥ ५३ ॥ मूलम्-संसारसागरं तर्तुं यदीच्छेद्योगसा- धकः ॥ कृत्वा वर्णाश्रमं कर्म फलवर्जं तदाचरेत् ॥ ५४ ॥